सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 66, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ६६
"The fact that there is a difference of language between Jnane-
shwari and the Abhangs of Namdev is not an arguement to
prove any difference of time between the two great saints.
The originals of Namdev’s Abhangs are not presreved. They
have undergone successive change, as they were recited and
have been handed over from mouth to mouth All these
facts account for the modern-ness of Namdeva's style "¹
(२) हिंदी कवि चंद और संत नामदेव—डॉ० भांडारकर नामदेव की हिंदी को
अर्वाचीन तथा १३ वीं शताब्दी के हिंदी कवि चंद की भाषा को पुरानी बताते हैं। इस
संदर्भ में यह ध्यान में रखना होगा कि एक मराठी भाषी संत ( नामदेव ) ने हिंदी में
रचना की है। उनकी भाषा अर्वाचीन न होकर मराठी-सदृश है। प्रत्युत चंद की
मातृभाषा हिंदी होने से उसकी हिंदी शुद्ध हिंदी है वह प्राचीन नहीं।
एक ही कालखण्ड के परंतु विभिन्न मातृभाषी दो कवियों की भाषा शैली की
तुलना समीचीन नहीं जान पड़ती है।
(३) विष्णु स्वामी की परंपरा—विष्णु स्वामी पंथ की परंपरा देते
हुए नाभादास ने अपने 'भक्तमाल' में ज्ञानेश्वर के पश्चात् नामदेव का उल्लेख किया
है। डॉ० भांडारकर ने इसे इन दोनों के समकालीन न होने का प्रमाण प्रस्तुत किया है।
परंतु 'भक्तमाल' में इस प्रकार का कोई उल्लेख नहीं है।² अलबत्ता प्रियादास विरचित
'भक्तमाल' की रसबोधिनी टीका में 'भये उभे शिष्य नामदेव धी त्रिलोचनजू' ऐसा
उल्लेख है जो ज्ञानेश्वर को संबोधित कर किया गया है। प्रियादास को यही कहना
अभिप्रेत है कि नामदेव ज्ञानेश्वर के शिष्य थे। ऐसी परिस्थिति में यह सिद्ध होता है कि
ज्ञानेश्वर तथा नामदेव समकालीन थे।
(४) विसोबा खेचर का मूर्ति-पूजा विरोध—'पाषाण की प्रतिमा बोलती नहीं'
यह बात कम से कम हिंदू धर्म के लिए तो नवीन नहीं थी। इसके लिए विसोबा को
इस्लाम की शरण में जाने की आवश्यकता न थी। एक बात और यह कि मुसलमानों
का शासन दक्षिण में शक १२४० में अविरोध दृढ़मूल हुआ। इसके लिए १४वीं शताब्दी
तक ठहरने की आवश्यकता न थी।
(५) तुर्कों का निर्देश—नामदेव ने मूर्तिभंजन के संदर्भ में तुर्कों का उल्लेख किया
- Mysticism in Maharashtra : R. D. Ranade P. 184.
२. श्री नामदेव चरित्र , पृ० ३८
प्रस्तावना व समीक्षण—रं० ह० मायंगकर