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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 332 में से

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पृष्ठ 67

है। डॉ० भांडारकर का कथन है कि The Mohamedans were often
called Turkas i e Turkas by the Hindus in the early times ' परंतु
तुर्कों ने यह मूर्ति भंजन दक्षिण में ही किया ऐसा नामदेव ने नहीं कहा है। संभव है कि शके
१२१२ में नामदेव ने ज्ञानेश्वर के साथ जो तीर्थयात्रा की उस समय की उत्तर भारत की
परिस्थिति की ओर उन्होंने संकेत किया हो। दक्षिण में रहते हुए भी उत्तर में मुसलमानों
के आक्रमणों का इस अभंग में वर्णन करने की संभावना है।
कुछ अंग्रेज ग्रंथकारो जैसे डा० निकाल मैकिनकाल १ आदि ने डॉ० भांडार-
कर द्वारा निर्धारित नामदेव के जन्म काल को ही ग्राह्य माना है अत उनके मत के
परीक्षण की आवश्यकता नहीं।
डॉ० जे० एन० फ़र्कुहर २ ने नामदेव का काल ई० स० १४३० के आस पास
निर्धारित कर उसके आधार पर रामानंद का काल निश्चित किया है।
डा० मोहनसिंह का मत
डा० मोहनसिंह 'दीवाना ३ ने नामदेव का काल सन् १३६० और १४५० ई०
के बीच माना है। इसका आधार उन्होंने नामदेव का मृत गाय जिलानेवाला पद४
माना है, जिसके नामदेव रचित होने में डॉ० राजनारायण मौर्य को संदेह है। ५
डॉ० मोहनसिंह ने फीरोजशाह बह्मनी को ही वह सुलतान माना है जिस ने
नामदेव को मृत गाय जिलाने की आज्ञा दी थी। वह दक्षिण में था और उसका काल
सन् १३६७ से १४२२ ई० के मध्य का है। अन्य फीरोज सुलतान फीरोजशाह खिलजी
( राज्यकाल सन् १२८२ ई० से १२६६ तक ) के साथ नामदेव के काल का
मेल नहीं बैठता और फिरोजशाह तुगलक ( राज्यकाल सन् १३५१ ई० से १३८८ ई०
तक ) के साथ स्थान का मेल नहीं बैठता क्योंकि फीरोजशाह न तो दक्षिण में आया
था और न संत नामदेव दिल्ली ही गये थे। इसी आधार पर डा० मोहनसिंह ने नाम-
1 Psalms of Maratha Saints ( 1919 )
2 Historical Position of Ramanand
—J R A S of Great Britain & Ireland April 1920
३ भक्त शिरोमणि नामदेव की नई जीवनी नई पदावली, पृ० ३
४ सुलतानु पूछै सुनु वे नामा। देखऊ राम तुम्हारे कामा ॥
—गुरु ग्रंथसाहब नामदेव के हिंदी पद, ४७ वाँ
५ हिंदुस्तानी ( जनवरी-मार्च १६६२ ) पृ० ११२