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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 332 में से

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पृष्ठ 59

६२ नामदेव की हिन्दी कविता
मराठी के कुछ विशिष्ट शब्दों का प्रयोग । यदि प्रत्यय आदि को हम पुरानी हिन्दी का
ही एक रूप मान लें तो भी हम विशिष्ट मराठी शब्दों को, जो प्राचीन काल में विशिष्ट
अर्थ में ही प्रयुक्त होते थे, या आज होते हैं, किसी भी प्रकार हिन्दी का नहीं मान
सकते । 'गुरु ग्रन्थ साहब' में आई हुई एक पंक्ति है :—
पाप पुंनि जाके डांगिया द्वारे चित्र गुपुत लेखिया ।
धरमराय पोली प्रतिहार ऐसो राजा श्रीगोपाल ॥
( पाप पुण्य जिसके चौकीदार ( डांगिया ) है, द्वार पर चित्रगुप्त लेखक हैं,
धर्मराज जिसकी ड्योढ़ी पर प्रतिहार है, ऐसा राजा वह श्रीगोपाल है । )
'डांगिया' मराठी एक विशिष्ट है, जो विशिष्ट अर्थ में प्रयुक्त होता है । पंढरपुर
के विट्ठल मन्दिर के दरवाजे पर दोनों तरफ जो जय विजय के प्रतिहारी खड़े हैं, उन्हें
'डांगिया' कहा जाता है ।
उसी पद में दूसरी पंक्ति है—
'जाचे घरा दिग दसा सराइवा बैकुंठसो चित्रसारी ।'
( जिस घर में दसो दिशाएँ समाप्त होती हैं और बैकुंठ के समान जिसकी
चित्रशाला है । )
'सराइचा' शब्द मराठी के 'सरणे' क्रिया से बना है, जिसका अर्थ होता है
समाप्त होना ।१ एक और विशिष्ट शब्द देखिए—
'आनिले कसरि सुगडि समसरि, बाल गोविंद हि पोलि रचौं ।'
( सुगड़ भर कर केसर ले आया ताकि बाल गोविन्द को चंदन लगा सकूँ । )
'सुगड़ि' शब्द मराठी के 'सुगड़' शब्द का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ होता है, मिट्टी का
छोटा बर्तन । इस प्रकार ओलपे ओलखे (पहचानना), दीवड़ा (दीपक), सम्बर-सम्भर
( सौ ) आदि शब्द भी हैं । मराठी के इन विशिष्ट शब्दों का प्रयोग यह प्रमाणित
करता है कि गुरु ग्रन्थ साहब के नामदेव और ज्ञानेश्वरकालीन महाराष्ट्रीय नामदेव एक
ही हैं ।
यद्यपि दोनों नामदेवों के एक होने का ऐतिहासिक उल्लेख कही प्राप्त नहीं होता
किन्तु परम्परागत किंवदन्तियाँ भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं हैं । जो बात किसी व्यक्ति के
संबंध में शताब्दियों तक चलती आती है उसमें थोड़ा बहुत सत्य का अंश अवश्य होता
है । नामदेव का महाराष्ट्र से पंजाब में जाना प्रचलित तो है ही किन्तु एक और बात
से इसकी सत्यता नि संदिग्ध बन जाती है । नामदेव के प्रारंभिक जीवन के संबंध में
१. महाराष्ट्र शब्दकोश ( चौथा विभाग ) पृ० १४२१ ।
२. महाराष्ट्र शब्दकोश ( सातवाँ विभाग ) पृ० ३०४२ ।