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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

५० नामदेव की हिन्दी कविता
दरिया ने लिखा है¹ 'मन के पीछे सारा जगत् भ्रमित है, जो मन के रहस्य को समझ
लेता है वही बुद्धिमान है।' एक अन्य स्थान पर उन्होंने फिर लिखा है²—'मन ही
नियम और आचारों का पालन कराता है और मन ही मन को पूजा चढ़ाता है।'
इस प्रकार संतों ने मन के महत्त्व और उसके पवित्रीकरण का उपदेश दिया है।
संतों पर नाथ पंथी भाषा और अभिव्यक्ति का भी बड़ा व्यापक प्रभाव पड़ा है।
कबीर आदि संत तो उससे इतना अधिक प्रभावित हुए कि कहीं-कहीं पर उन्होंने शब्द,
वाक्यांश, वाक्य यहाँ तक कि पूरे पद पुनरुद्धृत किये हैं। यह साख गोरख और कबीर
में समान रूप से पाई जाती है।³
संतों की पारिभाषिक शब्दावली लगभग पच्चीस प्रतिशत नाथ पंथियों से ही ली
गई है। संतों के किसी शब्द का अर्थ यदि समझ में न आये तो उसकी खोज सबसे
पहले नाथ पंथी साहित्य में करनी चाहिये।
संत लोग नाथ पंथी योगियों के स्वरूप से भी पूर्णतया परिचित थे। कबीर आदि
संतों ने उस स्वरूप का वर्णन विविध पंथों के साधुओं के वेषाडम्बर की आलोचना के
प्रसंग में किया है। कबीर ने नाथ पंथी साधु के वेषाडम्बर के प्रति उपेक्षा भाव प्रकट
किया है।⁴
सच तो यह है कि नाथ संप्रदाय का पूरा ज्ञान हुए बिना निर्गुण विचारधारा
को समझना यदि असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य ही है।
इन विवरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि निर्गुण काव्यधारा का प्रारम्भ बौद्ध
तन्त्र तथा उनकी अनेक शाखाओं के द्वारा पाँचवीं-छठवीं शताब्दी से ही हो गया था।
तान्त्रिकों की ये रचनाएँ संस्कृत में हैं। आगे चलकर दसवीं शताब्दी के आस पास देशी

१. मन के पीछे सब जगत् भुलाना, मन चीन्हे सो चतुर सुजाना।
—दरिया सागर, पृ० ६।
२. मन ही नेम अचार करावे, मन ही मन के पूजा चढ़ावे।
—दरिया सागर, पृ० ३०।
३. यहु मन सक्ती, यहु मन सीव, यहु मन पाँच तत्व को जीव।
यहु मन ले उन्मनि रहै तो तीन लोक की बाता कहै ॥
—गोरख बानी संग्रह, पृ० १८ तथा संत कबीर, पृ० ८२।
४. बाबा जोगी एक अकेला जाके तीरथ बरत न मेला।
झोली पत्र विभूतिन बटुआ अनहद बेन बजावे ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० १५८।

५१
भाषा में रचनाएँ होने लगी। सिद्धो और नाथो की ऐसी रचनाएँ पर्याप्त मात्रा में पाई
जाती है। निगुंण काव्य के रचयिता नाथ और सिद्ध पूरे भारत में फैले हुए थे। इस
प्रकार निगुंण काव्य की धारा का प्रवाह नामदेव के पूर्व से चला आ रहा था और
नामदेव ने इसको वही से ग्रहण किया। जिस धारा के नाथ और सिद्ध कवि अपनी
रचनाओ से समाज में प्रसिद्धि प्राप्त कर रहे थे उसी धारा को अपनाकर अपनी वाणी
द्वारा समाज को जाग्रत करना नामदेव को अधिक उपयुक्त जान पड़ा। इसलिए उन्होंने
तत्कालीन स्थितियो को ध्यान में रखते हुए अपने हिन्दी पदो की रचना की।
☐ ☐

द्वितीय अध्याय
संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ
चरित्र विषयक सामग्री—कई नामदेव
हिंदी में रचना करने वाले नामदेव ज्ञानेश्वरकालीन
महाराष्ट्रीय संत नामदेव हैं अथवा कोई अन्य ?
जन्म काल
नामदेव का अयोनि—संभव होना
नामदेव चरित्र के प्राचीन स्रोत—गाथा
ज्ञानेश्वर और नामदेव का समकालीनत्व
डॉ० रा० गो० भांडारकर का मत
डॉ० मोहनसिंह का मत—मेकालिफ का मत
जनम साखी
महाराष्ट्रीय विद्वानों के मत
हिंदी के विद्वानों के मत—निष्कर्ष
जन्म स्थान
हिंदी तथा मराठी के विद्वानों के मत
माता पिता एवं परिवार, जाति तथा व्यवसाय
क्या बालभक्त नामदेव डाकू थे ?—गुरु, नामदेव की यात्राएं
नामदेव की समाधि—नामदेव का व्यक्तित्व
रचनाएँ—मराठी गाथा की प्रतियां
मराठी अभंगों का वर्गीकरण
हिंदी रचनाएँ
हिंदी की रचनाओं का विषयानुसार विभाजन

संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ
संतो के वैयक्तिक जीवन और उनकी काव्य रचना का घनिष्ठ सम्बन्ध है ।
उनके लिए परमार्थ साधना ही जीवन का आदर्श था और काव्य रचना इस साधना
का आविष्कार । उनका साहित्य व्यक्तिनिष्ठ है अथवा विषयनिष्ठ, इस विषय पर वाद-
विवाद की गुंजाइश ही नही है क्योकि संतों के भाव-जीवन तथा उनकी काव्य सृष्टि में
अधिकांश में एकरूपता है । इसीलिए उनके भाव जगत् और इहलोक के चरित्र में
अन्तर नही खोजा जा सकता । फिर भी उनके जीवन कार्य तथा उनके काव्य का
अन्वयार्थ लगाने के पहले उनका जीवन परिचय प्राप्त कर लेना आवश्यक हो जाता है ।
नामदेव ने अपनी आत्मकथा भी लिखी है । उनके आत्म-चरित्र-परक अभंगों
की सहायता से हम उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं का ढाँचा खड़ा कर सकते हैं
यद्यपि इसमें भी अनेक कठिनाइयाँ हैं । इन आत्म-चरित्र-परक अभंगों में कई प्रक्षिप्त हैं
तथा बहुत से अभंगों में पाठभेद भी पाया जाता है । इन अभंगों की प्रामाणिकता में
भी सन्देह है क्योकि स्वयं नामदेव के हाथ की लिखी अधिकृत गाथा अभी तक किसी
को भी प्राप्त नही हुई है ।
नामदेव के समकालीन संतो ने उनका जो परिचय दिया है उसको कहाँ तक
ग्राह्य अथवा अग्राह्य समझा जाय यह भी एक समस्या है । डॉ० भांडारकर, पं० पांडुरंग
शर्मा, श्री भिंगारकर बुवा, श्री आजगावकर, प्रो० प्रियोलकर, डॉ० वि० भि० कोलते,
प्राचार्य दांडेकर आदि अनुसंधान-कर्ताओं ने नामदेव-चरित्र की चर्चा की है । इस प्रकार
की सामग्री विपुल है । परन्तु कहा नहीं जा सकता कि इस सामग्री से उनका संपूर्ण
तथा विश्वसनीय चरित्र उपलब्ध होगा ही । नामदेव के चरित्र के इन अध्येताओं द्वारा
दी गई जानकारी कही अधूरी है तो कही सदोष । कुछ स्थलों पर तो उसकी पुनरुक्ति
भी हुई है । इन कारणों से नामदेव की विस्तृत तथा विश्वासार्ह जीवनी का अभाव
बहुत खटकता है । अतः नामदेव विषयक उपलब्ध सभी सामग्री का अध्ययन और
विश्लेषण कर उनका जीवन चरित्र प्रस्तुत करने का प्रयत्न यहाँ किया गया है ।
अब प्रश्न यह है कि हिंदी में रचना करने वाले नामदेव ज्ञानेश्वर कालीन

५६ नामदेव की हिन्दी कविता
महाराष्ट्रीय सत नामदेव हे अथवा कोई अन्य ? आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने अपनी
"उत्तरी भारत की सत परपरा" में कई नामदेवो का उल्लेख किया है। ध्यान देने की
बात यह है कि "नामदेव" नाम के चार या पाँच तो महाराष्ट्रीय संत थे। उत्तरी
भारत में भी दो से अधिक नामदेव नामधारी संतो का किसी न किसी समय वर्तमान
होना कहा गया है। अत संत नामदेव—जिनके पद "गुरु ग्रंथ साहिब" में संग्रहीत है—
के विषय में निश्चित रूप से कुछ कहना अथवा उनकी जीवनी तथा रचनाओ का
प्रामाणिक परिचय देना सदेह से रहित नही कहा जा सकता ।
यहाँ उन संतो और कवियो का परिचय देना आवश्यक है जो नामदेव के नाम
से प्रसिद्ध हैं।
(१) ज्ञानेश्वर के समकालीन नामदेव
इनका उल्लेख निवृत्तिनाथ के अभंगो में आता है। अन्य नामदेवो की अपेक्षा
इनकी रचनाएँ बहुत ही सरस एवं भावुकतापूर्ण है। कुछ अभंगो में ये अपने नाम का
उल्लेख केवल "नामा" शब्द से करते है। कुछ अभंगो में "केशवाचा नामा" (केशव
का नामा) तथा विष्णुदास नामा आदि मुद्राओं द्वारा ये अपना परिचय देते हैं।
(२) विष्णुदास नामा
नामदेव के मराठी अभंगो तथा हिंदी पदो में विष्णुदास नामा का नाम बार-
बार आया है। उनका काल सन् १५८०-१६३३ ई० के मध्य का है। उनकी प्रामाणिक
रचना "शुकाख्यान" है जिसकी अतिम ओवी में उसका रचनाकाल इस प्रकार दिया
है। "शालिवाहन शक के मन्मथनाम संवत्सर को पौष्य अमावस्या सोमवार को, ग्रथ
पूर्ण हुआ, श्रोता गण सावधान होकर उसका श्रवण करें।"१ यह काल शालिवाहन शक
का १५१७ है और नामदेव का प्रयाण काल शक १२७२ है। दोनों के काल में लगभग
ढाई सौ वर्ष का अंतर है। अत विष्णुदास नामा सत नामदेव से निश्चित ही भिन्न हैं।
श्रीमती सरोजिनी शेंडे ने अपने शोध प्रबन्ध में २ विष्णुदास नामा सबंधी सभी
१. उत्तरी भारत की सत परपरा पृ० १०५
१. मन्मथ नाम सवत्सरे पौष्य मासीं ।
सोमवार अमावास्येच्या दिवशीं ।
पूर्णता आली प्रयासी ।
श्रोते सावकासो परिसोजे ।
—सकल संत गाथा, अभंग २२५३
२. विष्णुदास नाम्याच्या महाभारताचा विवेचनात्मक अभ्यास
— (अप्रकाशित प्रबंध) मुंबई विद्यापीठ ग्रंथालय, १९६०

संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ५७
बातें विस्तार के साथ लिखी हैं। उन्होंने "कमलाकर संताचे आख्यान" का एक अभंग
प्रस्तुत किया है जिसमें विष्णुदास नामा ने अपने पूर्ववर्ती संतों के साथ नामदेव का भी
नाम दिया है।¹ इससे इतना तो स्पष्ट हो ही जाता है कि नामदेव और विष्णुदास
नामा दो भिन्न व्यक्ति हैं। परन्तु यह संभव है कि नामदेव ने अपने अभंगों में "विष्णु
दास नामा" की मुद्रा लगाई हो ।
विष्णुदास नामा की 'बावन अक्षरी' की एक प्रति इतिहासाचार्य राजवाडे को
मिली थी जिसमें स्वयं विष्णुदास नामा ने नामदेव की वंदना की है। 'नामदेव के
पवित्र नाम के उच्चारण से वह हरि-हर का भक्त हो जाता है क्योंकि गोविंद को नाम
प्रिय है।'२
श्री पांगारकर के अनुसार विष्णुदास नामा जाति का ब्राह्मण न होकर 'शिंपी'
(दर्जी) था। इसके लिए वे उन्हीं की रचना से उदाहरण देते हैं। विष्णुदास नामा का
कथन है—तुलसी का पौधा यदि अपवित्र भूमिपर उगा हो उसे अपवित्र न समझा
जाय। विष्णुदास नामा विट्ठल के भजन में तल्लीन हो गया, उसे शिंपी (दर्जी) न
कहा जाय।³ श्री पांगारकर विष्णुदास नामा को संत एकनाथ का समकालीन तथा
मुक्तेश्वर का पूर्ववर्ती बताते हैं। 'ओवी' उसका प्रिय छंद है।
इसके अतिरिक्त विष्णुदास नामा की रचनाओं में आचार धर्म पर अधिक बल
दिया गया है। उनकी कुछ रचनाएँ कूट समस्यात्मक भी हैं। विष्णुदास नामा अधिक-
१. कोण्ही एके अवसरी । सकल संत मिलोनी अवधारी ।
कीर्तन करितां गजरी । पंढरपुरा चालिले ॥
ज्ञानदेव सोपानदेव । चांगा मुक्ताई नामदेव
कबीर रोहिदास भक्त राय । ब्रह्मानंदे चालले ॥
—विष्णुदास नामा कृत महाभारत (कमलाकर संताचे आख्यान), मुंबई
मराठी ग्रंथ संग्रहालय
२. नामदेवाचे पवित्र । नाम उच्चरिता अखंडित ।
नामें होय हरि हर भक्त । नाम प्रिय गोविंदा ॥
—मराठी वाङ्मयाचा इतिहास (खंड पहिला) पृ० ५५४
३. अमंगळु भूमीसी उगवल्या तुलसी । अपवित्र तयासी म्हणो नये ।
विष्णुदास नामा विट्ठली मिळाला । शिंपी शिंपी त्याला म्हण नये ।
—मराठी वाङ्मयाचा इतिहास (खंड दूसरा) पृ० ५७८

५८ नामदेव की हिन्दी कविता

तर विषय-निष्ठ और बहिर्मुख है। उनकी रचना में वर्णनात्मकता अधिक है। संत
नामदेव एकान्तिक विट्ठल भक्त और भावुक हैं। इनकी रचनाओं में अनुभूति की सच्चाई
और मामिकता है।
इन प्रमाणों के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि विष्णुदास नामा और
संत नामदेव दो भिन्न व्यक्ति हैं।
(३) नामा पाठक
संत एकनाथ कृत 'संत माला' में इनका उल्लेख आता है। चित्राव शास्त्री ने¹
इनका काल ई० स० १३७८ माना है। डॉ० तुलपुले² के अनुसार नामा पाठक
ज्ञानेश्वर कालीन कान्हो पाठक का पोता है। इनका 'अश्वमेध पर्व' नामक एक ओवी-
बद्ध ग्रंथ मिलता है। इनकी रचना संत नामदेव की रचना से बिल्कुल अलग है इस
लिए इनका उनसे कोई सम्बन्ध भी नहीं है।
(४) नामदेव शिंपी
नामदेव शिंपी को ज्ञानेश्वर कालीन नामदेव का सम-सामयिक कहा गया है।
ये भी अपने आपको विष्णुदास नामा लिखते हैं। दामोदर पंडित ने शके ११८६ में
इस कवि को महानुभाव पंथ की दीक्षा दी।³ इस बात का 'स्मृति स्थल' में भी
उल्लेख है।⁴
(५) नेमदेव
महानुभाव पंथी एक अन्य व्यक्ति 'नेमदेव' भी प्रसिद्ध है जिसका उल्लेख महानु-
भाव पंथ के प्रसिद्ध ग्रन्थ 'लीला चरित्र'⁵ के 'विठ्ठल वीरु वचन' नामक प्रकरण में
आया है। इस ग्रन्थ के अनुसार यह 'कोली' (मछुआ) जाति का था और महानुभाव
पंथ में दीक्षित हुआ था। इसके काल का कुछ निश्चित पता नहीं। धो चांदोरकर ने
इसे ज्ञानेश्वरकालीन संत नामदेव के साथ जोड़ दिया पर इसका न तो वारकरी संप्रदाय
से कोई सम्बन्ध था न इसकी रचना का पता ही चलता है।
(६) बाल क्रीड़ा कर्ता नामदेव
इसके बाल लीला के अभंग बहुत ही मधुर हैं। परन्तु इन अभंगों की भाषा
अर्वाचीन प्रतीत होती है। उसने अपने एक अभंग में विसोबा खेचर का उल्लेख


१. मध्ययुगीन चरित्र कोश : सिद्धेश्वर शास्त्री चित्राव पृ० ४१२।
२. महाराष्ट्र सारस्वत (पुरवणी) : डॉ० शं० गो० तुलपुले पृ० ७५६।
३. महानुभावीय मराठी वाङ्मयः य० खु० देशपांडे।
४. स्मृति स्थलः संपादक : वा० ना० देशपांडे, पृ० ७४-७५।
५. लीला चरित्र (उत्तरार्द्ध) सम्पादक : ह० ना० नेने, पृ० ४२३।

संत नामदेव की हिन्दी कविता ५६
किया है ।१ उसने ग्रन्थ के प्रारम्भ में शालिवाहन शक के चौदहवी शताब्दी के 'बहिरा
पिसा' उर्फ बहिरा जातवेद (बहिरंभट) का उल्लेख किया है । ज्ञानेश्वर का समकालीन
तथा विसोवा खेचर का शिष्य नामदेव चौदहवी शती के कवि का उल्लेख अपनी रचना
में कैसे कर सकता है ?
एक ओर नामदेव का उल्लेख 'महिकावती की बखर' में पाया जाता है ।
इसके अतिरिक्त मारवाड़ में भी नामदेव नामक किसी संत का होना बताया
जाता है । पर उसकी जीवनी और रचना के कुछ ज्ञात न होने के कारण उसके विषय
में कुछ कहा नहीं जा सकता ।
सबसे अधिक विवाद इस बात को लेकर चला है कि महाराष्ट्रीय संत नामदेव
भिन्न है और पंजाबी (गुरु ग्रन्थ साहब के) नामदेव जिनकी रचना हिन्दी में भी मिलती
है, भिन्न है। इस संबंध में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किये गये है-
(क) जो नामदेव पंढरपुर के विट्ठल को एक क्षण भी छोड़ने के लिए तैयार नही
थे वे पंढरपुर छोड़कर लगभग २० वर्ष तक दूर रहे यह आश्चर्य की बात है जिस पर
विश्वास नही होता ।
(ख) जिन नामदेव ने ज्ञानेश्वर महाराज के साथ की यात्रा का अपने 'तीर्थावली'
के अभंगों में इतना विस्तृत और रोचक वर्णन किया है, वही इतनी दीर्घकालीन यात्रा
का वर्णन एक भी स्थान पर, न मराठी अभंगों, न हिन्दी पदों में करें, यह असंभव-सा
जान पड़ता है ।
(ग) महाराष्ट्रीय संत नामदेव की पंजाब यात्रा अथवा पंजाब निवास का उल्लेख
न तो महाराष्ट्र के इतिहास में प्राप्त होता है न पंजाब के इतिहास में ।
ऊपर के तर्कों के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि महाराष्ट्रीय संत नामदेव
का पंजाब जाना, गुरदासपुर जिले के घोमान गाँव में लंबी अवधि तक निवास करना
और हिन्दी में पद रचना करना अन्तः साक्ष्य तथा बहिःसाक्ष्य दोनों से रहित है । इस
संबंध में महाराष्ट्र के कुछ विवेचकों का यह अनुमान प्रस्तुत किया जाता है—'गुरु ग्रन्थ
साहब के पद-रचयिता नामदेव का महाराष्ट्र के ज्ञानदेव कालीन नामदेव से कोई संबंध
नही है । वह नामदेव की पंजाब यात्रा के समय उनका कोई शिष्य रहा होगा, जिसने
बाद में अपने गुरु का नाम धारण कर हिन्दी में पद रचे होंगे ।' डॉ० विनयमोहन शर्मा
ने इस अनुमान को निराधार सिद्ध किया है ।२
१. नामा मनी आठवी खेचर चरण । तयाचे कृपेने सिद्धी जावो ।।
श्री नामदेव महाराज आणि त्याचे समकालीन संत
—ज० र० आजगावकर, पृष्ठ ११
२. हिन्दी को मराठी संतो की देन, पृ० १०१।।

६० नामदेव की हिन्दी कविता
एक दूसरा अनुमान भी कुछ विवेचकों द्वारा प्रस्तुत किया गया है। उनका
कहना है कि नामदेव के किसी शिष्य ने अथवा अन्य संत ने महाराष्ट्रीय संत नामदेव
के मराठी अभंगों का हिन्दी में अनुवाद करने का प्रयत्न किया है। कई ऐसे पद भी हैं
जो हिन्दी मराठी में समान भाववाले हैं।
अब ऊपर दिये हुए तर्कों पर क्रमशः विचार किया जायगा। यह बात निर्विवाद
है कि संत नामदेव ज्ञानेश्वर के साथ उत्तर भारत की यात्रा के लिए गये थे। यह यात्रा
उन्होंने तब की थी जब विट्ठल के प्रति उनकी भक्ति अत्यन्त भावात्मक थी। वे विट्ठल
के बिना तड़पने लगते थे। यदि उन्होंने पंढरपुर छोड़कर उत्तर भारत की यात्रा की तो
प्रौढ़ावस्था में—जब उनमें परिपक्व ज्ञान और अनुभूति थी। ऐसी अवस्था में पंजाब की
यात्रा करना असंभव नहीं।
यह सही है कि 'तीर्थावली' का विस्तृत वर्णन करने वाले नामदेव ने पंजाब की
यात्रा का उल्लेख तक नहीं किया, पर अभी यह प्रमाणित करना शेष है कि 'तीर्थावली'
के अभंग नामदेव रचित हैं। डॉ० तुलपुले के अनुसार नामदेव की गाथा के २५-२६ सौ
अभंगों में से केवल ५-६ सौ अभंग ही वास्तव में नामदेव रचित हैं, शेष प्रक्षिप्त हैं।१
दूसरी बात यह भी है कि संत नामदेव ने पंजाब यात्रा अपने जीवन के उत्तरकाल में
(५० वर्ष की अवस्था के ऊपर) की, जब उनके पास ब्रह्म की अनुभूति, सांसारिकता
से वैराग्य आदि के अतिरिक्त अन्य कुछ कहने को नहीं था।
यह भी प्रसिद्ध है कि संतों ने सर्वदा ही अपने बारे में कम कहा है। इतिहास
में नामदेव का उल्लेख न आना कोई आश्चर्य की बात नहीं। पहले के इतिहास ग्रन्थों में
राजाओं की वंशावली, दरबारियों की सत्ता के लिये स्पर्धा, युद्धों के वर्णन आदि के
अतिरिक्त अन्य जानकारी बहुत ही कम मात्रा में आ पाती थी। न जाने कितने संतों
का वर्णन इतिहास में नहीं है। अतः संत नामदेव की पंजाब यात्रा का वर्णन इतिहास
में न होना यात्रा का अप्रमाण नहीं हो सकता।
महाराष्ट्रीय संत नामदेव के किसी शिष्य द्वारा हिन्दी पदों की रचना की जो
बात कही गई है, वह तो पिछले तर्क—हिन्दी मराठी पदों के साम्य से ही व्यर्थ सिद्ध हो
जाती है। यदि हिन्दी के पद उनके किसी शिष्य द्वारा रचे गये होते तो मराठी अभंगों
की शब्दावली का साम्य, भाव साम्य और महाराष्ट्र में प्रचलित यादवकालीन मराठी के
कुछ विशिष्ट प्रयोग न मिलते। हिन्दी के जो पद मराठी से साम्य रखते हैं उनकी संख्या
केवल ६-१० है। यदि हिन्दी पद मराठी के अनुवाद होते तो हिन्दी के सैकड़ों पदों की
छाया मराठी के अभंगों में कहीं-न-कहीं तो मिलती, पर ऐसा नहीं है।
१. पाँच संत कवि : डॉ० श० गो० तुलपुले, पृ० १३५।

संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ६१
गुरु ग्रन्थ साहब के पद महाराष्ट्रीय तथा ज्ञानदेव कालीन नामदेव के ही है। वे
अपने जीवन के उत्तर काल में पंजाब गये और वही लगभग २० वर्ष तक रहे। वास्तव
में बात यह है कि अपने परम मित्र ज्ञानेश्वर के समाधि लेने के पश्चात् पंढरपुर से
उनका मन उचट गया और कुछ दिनो के पश्चात् वे पंजाब की ओर चले गये। वहाँ
गुरदासपुर जिले के धोमान ग्राम में रह कर भजन-कीर्तन करते रहे। उनके समाधि-
स्थान के बारे मे दो मत हैं। पंजाबी परंपरा के अनुसार उन्होंने घोमान में ही समाधि
ली। पर नामदेव के शिष्य परिसा भागवत के एक अभंग¹ के अनुसार सन् १३५० ई०
में पंढरपुर में ही उनके समाधि लेने की बात पुष्ट होती है। आज भी घोमान में बाबा
नामदेवजी का गुरु द्वारा है और उनके अनुयायियों की संख्या भी बहुत बड़ी है।
महाराष्ट्रीय संत नामदेव और गुरु ग्रन्थ के नामदेव एक ही है, इस सम्बन्ध में
निम्नलिखित बातें विचारणीय है। सबसे पहली बात यह है कि नामदेव के जन्म स्थान
और वंश के सम्बन्ध में दोनों परम्पराओ में साम्य है। नामदेव के जीवन सम्बन्धी जो
घटनाएं तथा उनके चमत्कार महाराष्ट्र में प्रचलित है अथवा उनके अभंगो मे मिलते है,
वही घटनाएं और चमत्कार पंजाबी परम्परा मे भी प्रचलित हैं और हिन्दी के पदों में
भी प्राप्त हैं। मृत गाय को जिलाने, विट्ठल को दूध पिलाने, मन्दिर का द्वार फिराने
आदि की घटनाएं दोनों रचनाओ में समान रूप में प्राप्त होती हैं। पंजाबी परंपरा के
अनुसार गुरु ग्रन्थ के नामदेव भिन्न नही बल्कि महाराष्ट्रीय संत नामदेव ही है।²
दूसरी बात यह है कि हिन्दी पदो और मराठी अभंगों मे विट्ठल शब्द के उपयोग
के साथ साथ केशव, माधव, राम, गोविन्द, हरि आदि शब्दों का समान रूप से व्यवहार
हुआ है। हिन्दी के कवियो ने विट्ठल का प्रयोग कही नही किया है। विट्ठल महाराष्ट्र
के देवता है और सन्त नामदेव उन्हो के भक्त थे। इसलिए प्रधान रूप से विट्ठल शब्द
का प्रयोग हुआ है। इसके अतिरिक्त हिन्दी तथा मराठी पदो का वर्ण्य-विषय एक न होते
हुए भी सामान्य बातें—ईश्वर की सर्वव्यापकता, नाम और गुरु का महिमा वर्णन,
बाह्याडम्बरों की व्यर्थता तथा प्रह्लाद, ध्रुव, अजामिल आदि प्राचीन भक्तो के कथा सन्दर्भ
लगभग एक से ही हैं।
पंजाबी और महाराष्ट्रीय संत नामदेव के एक होने का सबसे बड़ा प्रमाण है
१. आषाढ़ शुक्ल एकादशी । नामा विनवी विठ्ठलासी ।
आज्ञा व्हावी हो मजसी । समाधि विश्रांति लागी ॥
—सकल संत गाथा
२. (अ) हिन्दी को मराठी संतो की देन, पृ० १०६ ।
(ब) भगत नामदेव जी जनम साखी : ज्ञानी करतार सिंह ।

६२ नामदेव की हिन्दी कविता
मराठी के कुछ विशिष्ट शब्दों का प्रयोग । यदि प्रत्यय आदि को हम पुरानी हिन्दी का
ही एक रूप मान लें तो भी हम विशिष्ट मराठी शब्दों को, जो प्राचीन काल में विशिष्ट
अर्थ में ही प्रयुक्त होते थे, या आज होते हैं, किसी भी प्रकार हिन्दी का नहीं मान
सकते । 'गुरु ग्रन्थ साहब' में आई हुई एक पंक्ति है :—
पाप पुंनि जाके डांगिया द्वारे चित्र गुपुत लेखिया ।
धरमराय पोली प्रतिहार ऐसो राजा श्रीगोपाल ॥
( पाप पुण्य जिसके चौकीदार ( डांगिया ) है, द्वार पर चित्रगुप्त लेखक हैं,
धर्मराज जिसकी ड्योढ़ी पर प्रतिहार है, ऐसा राजा वह श्रीगोपाल है । )
'डांगिया' मराठी एक विशिष्ट है, जो विशिष्ट अर्थ में प्रयुक्त होता है । पंढरपुर
के विट्ठल मन्दिर के दरवाजे पर दोनों तरफ जो जय विजय के प्रतिहारी खड़े हैं, उन्हें
'डांगिया' कहा जाता है ।
उसी पद में दूसरी पंक्ति है—
'जाचे घरा दिग दसा सराइवा बैकुंठसो चित्रसारी ।'
( जिस घर में दसो दिशाएँ समाप्त होती हैं और बैकुंठ के समान जिसकी
चित्रशाला है । )
'सराइचा' शब्द मराठी के 'सरणे' क्रिया से बना है, जिसका अर्थ होता है
समाप्त होना ।१ एक और विशिष्ट शब्द देखिए—
'आनिले कसरि सुगडि समसरि, बाल गोविंद हि पोलि रचौं ।'
( सुगड़ भर कर केसर ले आया ताकि बाल गोविन्द को चंदन लगा सकूँ । )
'सुगड़ि' शब्द मराठी के 'सुगड़' शब्द का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ होता है, मिट्टी का
छोटा बर्तन । इस प्रकार ओलपे ओलखे (पहचानना), दीवड़ा (दीपक), सम्बर-सम्भर
( सौ ) आदि शब्द भी हैं । मराठी के इन विशिष्ट शब्दों का प्रयोग यह प्रमाणित
करता है कि गुरु ग्रन्थ साहब के नामदेव और ज्ञानेश्वरकालीन महाराष्ट्रीय नामदेव एक
ही हैं ।
यद्यपि दोनों नामदेवों के एक होने का ऐतिहासिक उल्लेख कही प्राप्त नहीं होता
किन्तु परम्परागत किंवदन्तियाँ भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं हैं । जो बात किसी व्यक्ति के
संबंध में शताब्दियों तक चलती आती है उसमें थोड़ा बहुत सत्य का अंश अवश्य होता
है । नामदेव का महाराष्ट्र से पंजाब में जाना प्रचलित तो है ही किन्तु एक और बात
से इसकी सत्यता नि संदिग्ध बन जाती है । नामदेव के प्रारंभिक जीवन के संबंध में
१. महाराष्ट्र शब्दकोश ( चौथा विभाग ) पृ० १४२१ ।
२. महाराष्ट्र शब्दकोश ( सातवाँ विभाग ) पृ० ३०४२ ।

संत नामदेव की हिन्दी कविता ६३
तत्कालीन संतो और उत्तरकालीन संतो ने भी पर्याप्त मात्रा में लिया है। नामदेव के
बचपन से लेकर ज्ञानेश्वर की समाधि और उसके बाद एक तीर्थयात्रा का उल्लेख तो
मिलता ही है। ज्ञानेश्वर की समाधि (ई० सं० १२६४) के समय नामदेव (जन्म ई०
स० १२७०) २६ वर्ष के थे। उसके बाद वे तीर्थयात्रा के लिए गये। उसके बाद के
जीवन में नामदेव कहाँ रहे, क्या करते रहे, क्या चमत्कार किये आदि किसी भी एक
घटना का उल्लेख मराठी साहित्य और इतिहास में नही मिलता। मराठी का सारा संत
साहित्य भी नामदेव के उत्तरकालीन जीवन के बारे में बिलकुल मौन है। इस बात को
देखकर मुझे ऐसा लगता है कि नामदेव अपने जीवन के उत्तरकाल में महाराष्ट्र के
बाहर रहे। संभवत. इस काल में थे पंजाब में रहे हो। इसीलिए उनके उत्तरकालीन
जीवन का उल्लेख महाराष्ट्र में कही भी नही मिलता।
नामदेव रचित हिन्दी पदों के वर्ण्य विषय की बात अवश्य ही विचारणीय है।
वस्तुतः नामदेव ने जब बिसोबा खेचर से दीक्षा ली तभी उनमे एक प्रकार का परिवर्तन
आ गया जिसका संकेत मराठी अभंगों में १ भी कही-कही मिल जाता है। उसके बाद
उन्हे ईश्वर की सर्वव्यापकता का ज्ञान हुआ और धीरे-धीरे पंढरी के विट्ठल के प्रति उनका
मोह कम होने लगा। ज्ञानेश्वर की समाधि के पश्चात् शक १२५२ के आस पास वे जब
दूसरी बार तीर्थयात्रा के लिए गये थे तब उन्हे ईश्वर के विश्वरूप का ज्ञान हुआ और
वे सभी जगह विट्ठल को देखने लगे ।२ उत्तर भारत में उस समय नाथो और सिद्धो का
बड़ा प्रभाव था जिससे नामदेव बच नही सके। उन्होंने महाराष्ट्र से लेकर पंजाब तक
की साधना और भक्ति देखी थी अतः उनकी अनुभूति में एक परिपक्वता आ गई थी।
हिन्दी पदों में अनुभूति की यही परिपक्वता व्यक्त हुई है। कथन शैली, भाषा, छंद आदि
सब उत्तर भारत की परंपरा का है। उन्होंने तत्कालीन उत्तर भारत की साधना पद्धति
को आधार बनाकर भक्ति का प्रचार किया। इन बातो से स्पष्ट है कि मराठी अभंगो
का रचयिता नामदेव तथा हिन्दी पदों का रचयिता नामदेव दोनो एक ही हैं। अन्तर
१. सतसंगे माझा पालट झाला।
पाहता विठुला रूप तुझें ॥
—सकल संत गाथा, अभंग १६६८ ।
२. पाषाणाचा देव बोलत भलताते ।
सांगते ऐकते मूर्ख दोघे ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग १३६१ ।
ईभे बीठलु ऊभे बीठलु, बीठल बिनु संसारु नही।
थान थनंतरि नामा प्रणवे पूरि रहिउ तू सरब मही ॥
—पंजाबातील नामदेव, पृ० ८३ ।

६४ नामदेव की हिन्दी कविता
केवल इतना ही है कि मराठी अभंग उनके जीवन की किशोरावस्था में रचे गये, जिनमें
भक्ति की विह्वलता और वर्णनात्मकता है। हिन्दी पद जीवन के उत्तरकाल में रचे गये
जिनमें अनुभूति की परिपक्वता है।
जन्म काल
नामदेव का 'अयोनि-संभव होना—डॉ० इनामदार¹ 'भक्तमाल' में वर्णित कथा
तथा विष्णुदास नामाकृत 'आदि' प्रकरण के अभङ्ग में आई हुई पंक्तियों के आधार पर
नामदेव को 'अयोनि-संभव' मानने के पक्ष में नहीं है। इस संबंध में वे स्वर्गीय म० गो०
घारटक्के² के मत के समर्थक हैं तथा सीपी शब्द का अर्थ शुक्तिका मानकर नामदेव को
अयोनिज मानने वालों का खण्डन करते हैं। नामदेव गाथा, जनाबाई तथा विठाके अभंगों
के आधार पर भी उन्होंने नामदेव के नैसर्गिक जन्म की पुष्टि की है। इस प्रवाद के
पीछे अयोनिज व्यक्ति को अन्य व्यक्तियों से श्रेष्ठ घोषित करने की भावना को भी वे
कोई महत्त्व नहीं देते और ईश्वर-प्राप्ति से पूर्व सभी को अपूर्ण और अशुद्ध मानकर
इसका प्रतिवाद करते हैं। डॉ० भगीरथ मिश्र³ भी महीपति के कथन को केवल महत्ता-
प्रदर्शन के लिए किया गया तथा प्रियादास के कथन को अवैज्ञानिक मानते हैं।
नामदेव-चरित्र के प्राचीन स्रोत-गाथा—
नामदेव का जन्म काल निश्चित करने के लिए आज जो भी साधन उपलब्ध हैं
उनमें नामदेव के अभंगों की गाथा प्रमुख है। इस गाथा का 'नामदेव चरित्र' शीर्षक
प्रकरण नामदेव-विरचित होने में संदेह किया जाता है !⁴
'नामदेव-चरित्र' के निम्नलिखित अभंग के अनुसार नामदेव का जन्म रविवार
कार्तिक शुक्ल एकादशी शक ११९२ (तद्नुसार २६ अक्टूबर सन् १२७० ई०) को
हुआ था—
माझे जन्म पत्र बाबाजी ब्राह्मणे। लिहिले त्याची खूण सांगेन ऐका ॥
अधिक व्याण्णव गणित अकरा शतें। उगवता आदित्य रोहिणीसी ॥
शुक्ल एकादशी कार्तिकी रविवार। प्रभव संवत्सर शालिवाहन शके ॥
आवटे प्रत, अभंग १२५४
१. संत नामदेव : डॉ. हे. वि. इनामदार, पृ० १५।
२. विष्णुदास नामा कृत नामदेवांची 'आदि' 'लोकशिक्षण' (मराठी पत्रिका) मई
१९४०, पृ० ८१५।
३. संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पृ० ३३।
४. श्री नामदेव महाराज आणि त्यांचे समकालीन संत - ज. र. आजगांवकर, पृ० २।

संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ६५
इस अभंग में आये 'प्रभव' तथा 'प्रमोद' संवत्सरो के पाठ के संबंध मे काफी
ऊहापोह हुआ है । यद्यपि इस अभंग के नामदेव-कृत होने मे शंका की जाती है फिर
भी, यह भी सही है कि नामदेव की जन्म-तिथि निश्चित करने के लिये अन्य कोई
प्रमाण साधन के रूप में प्राप्त नही होता ।
डॉ० हे० वि० इनामदार के अनुसार 'इस अभंग में शालिवाहन शक ११९२ में
'प्रभव' संवत्सर का जो निर्देश किया गया है वह गलत है । उसके स्थान पर 'प्रमोद'
संवत्सर का उल्लेख आवश्यक था ।'१
श्री० शं० पु० जोशी ने शके ११८५ को नामदेव का जन्म शक मान कर एक
जन्म कुंडली दी है । यह कुंडली श्री० प्र० रा० मुंगे द्वारा तैयार की गई है । श्री जोशी
लिखते है—'उपर्युक्त अभंग में शक और संवत्सर का परस्पर मेल नही बैठता । शक
११८५ में 'प्रमोद' संवत्सर आता है । अतः कातिक शुक्ल एकादशी शक ११८५ को
नामदेव का जन्म काल मानकर उनकी कुंडली तैयार की गई है ।'२
अनंतदास कृत 'नामदेव की परिचयी':
'परिचयी' ग्रंथो से संतो के जीवन पर नया प्रकाश पड़ता है । इस दृष्टि से
अनंतदास कृत 'नामदेव की परिचयी' महत्वपूर्ण है । इस परिचयी का रचनाकाल सं०
१६४५ वि० है । बड़े खेद की बात है कि अनंतदास ने जहाँ नामदेव की मननशीलता,
उनका आध्यात्मिक उत्कर्ष और सहनशीलता के विषय मे इतना लिखा वहाँ उनकी
जन्मतिथि के विषय में कुछ भी नही कहा । अतः नामदेव की जन्मतिथि निश्चित करने
में यह परिचयी विशेष सहायता नहीं करती क्योकि इसमें नामदेव के जन्म और जन्म
काल का बिलकुल उल्लेख नही मिलता ।
नाभादास कृत 'भक्तमाल':
'भक्तमाल' के रचना-काल में पूर्ण मतैक्य नहीं है । डॉ० दीनदयालु गुप्त ने
इसका रचना काल संवत् १६८० वि० माना है ।३ नाभादास ने एक छप्पय में नामदेव
विषयक पाँच आश्चर्यजनक घटनाओं का वर्णन किया है परंतु उसमें नामदेव के जन्म
शक का कही उल्लेख नही है ।
प्रियादास ने भी 'भक्तमाल' की अपनी टीका में नामदेव का जन्मकाल नही
दिया है ।
१. संत नामदेवः डॉ० हे० वि० इनामदार पृ० ३०
२. पंजाबातील नामदेव पृ० १५
३. अष्टछाप और वल्लभ संप्रदाय ( पूर्वार्द्ध ) पृ० १०६ ।
५

६६ नामदेव की हिन्दी कविता
भक्तमाला राम रसिकावली में नामदेव की वे ही सब कथायें हैं जो प्रियादास
की 'भक्तमाल' की टीका में हैं। इसमें कोई नवीनता नहीं है।
ज्ञानेश्वर और नामदेव का समकालीनत्वः
ज्ञानेश्वर और नामदेव के समकालीनत्व के संबंध में निम्नलिखित मत प्रस्तुत
किये जाते हैं :-
(१) श्री० भारद्वाज तथा श्री भिंगारकर के परस्परविरोधी मत
'ज्ञानेश्वरी' तथा 'अमृतानुभव' के रचयिता ज्ञानदेव तथा अभंगो के रचयिता
ज्ञानदेव दो भिन्न व्यक्ति हैं तथा उनमें डेढ़ सौ, दो सौ साल का अंतर है। अपने इस मत
का श्री शिवरामबुवा एकनाथ भारदे उर्फ 'भारद्वाज' ने बड़े अभिनिवेश के साथ प्रति-
पादन किया ।¹ उन्होंने 'माझें जन्म पत्र बाबाजी ब्राह्मणें' अभंग के 'अधिक ब्याण्णव
गणित अकरा शतें' के स्थान पर 'अधिक नऊ गणित तेरा शते' ऐसा एक नया काल्प-
निक पाठ सुझाकर नामदेव का जन्मकाल शक १३०६ निश्चित किया । मराठी संत
साहित्य के अनेक अध्येताओ ने उनकी इस स्थापना का खण्डन किया । इनमें प्रमुख हैं
श्री धोपतोबुवा भिंगारकर² तथा पं० पांडुरंग शर्मा ।³ इन दोनो के अनुसार एक ही
ज्ञानेश्वर ने ज्ञानेश्वरी तथा स्फुट अभंगो की रचना की और संत नामदेव संत ज्ञानेश्वर
के समकालीन थे ।
१. 'ज्ञानदेव व नामदेव समकालीन होते काय ?': 'भारद्वाज'—'सुधारक' (मराठी पत्र)
( ५-१२-१८६८)
२. श्री महासाधु ज्ञानेश्वर महाराज याचा काल निर्णय व संक्षिप्त चरित्र : धोपतोबुवा
भिंगारकर, पृ० ३-४ ।
३. (अ) 'नामदेवाचा निर्णय' : श्री० पांडुरंग शर्मा
—भारत इतिहास संशोधक मण्डल (त्रैमासिक पत्रिका) वर्ष ५ वां, अंक १-४,
शक १८४६, पृ० ३०-५८ ।
(ब) 'वारकऱ्याच्या वसाहती'
—भा० इ० सं० मंडल त्रैमासिक पत्रिका, पृ० ३-१८ । वर्षं छठा, अंक
१-४, शक १८४७ ।
(क) ज्ञानदेव व नामदेव समकालीन होते काय ?
—'चित्रमयजगत्' (मराठी पत्रिका) पुणे, अगस्त १६२२ ।
(ख) Historical Position of Namdev P. 335-41
—Annals of the B. O. R. I. (Poona) 1926-27.

संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ६७
प्रा० वासुदेव बलवंत पटवर्धन ने नामदेव के अभंगों की भाषा को अर्वाचीन
बताकर भाषा विज्ञान के आधार पर नामदेव का काल ज्ञानेश्वर के पश्चात् एक शतक
अर्थात् १४ वीं शताब्दी माना है। वे लिखते हैं :—
‘The fact remains that whatever the vocabulary,
the grammar of the language of Nama’s work as it is
presented in the various Gathas, is far too modern to
admit of Nama’s being a contemporary of Dnyane-
shwar.’ १
डॉ० रा. गो. भांडारकर का मत
डॉ० भांडारकर के अनुसार नामदेव का काल ज्ञानेश्वर के काल के पश्चात्
कम से कम सौ वर्ष बाद का हो। वे सुभाते हैं कि 'नामदेव के हिंदी पदो की भाषा
तेरहवी शताब्दी के हिंदी कवि चंद की भाषा की अपेक्षा अर्वाचीन प्रतीत होती है।
उनके मराठी के अभंगों की भाषा का स्वरूप भी अर्वाचीन होने के कारण तथा उनके
गुरु बिसोबा खेचर का मूर्ति-पूजा विरोध मुसलमानो के मत के साथ साम्य रखने के
कारण नामदेव का काल मुसलमानो के शासन के प्रारंभ अर्थात् चौदहवी शताब्दी के
आसपास हो। वे लिखते हैं :—
‘The date assigned to the birth of Namdeo is Saka 1192 that
is 1270 A. D This makes him a contemporary of Jnandev, the
author of Jnandevi, which was finished in 1290 A. D. But the
Marathi of the latter work is decidedly archaic, while that of
Namdev’s writings has a considerably more modern appear-
ance. Nabhaji in naming the successors of Vishnuswamin
places Jnandev first and Namdev afterwards . a more direct
evidence for the fact that Namdev flourished after Moham-
madans had established themselves in the Maratha country,
is afford- ed by his mention in a song of the destruction of
the idols by the Turks. Namdev, therefore, probably lived
about or after the end of the 14 th Century.’ २

  1. ‘Influence of Saints of the Prakrit Bhakti School in the Forma-
    tion and Growth of Prakrit Language.’
    —Wilson Philological Lectures, Bombay, 1917.
  2. Vaishnavism Shaivism and Other
    Minor Religious Systems (1913) p. 97.

६८ नामदेव की हिन्दी कविता
डॉ० भांडारकर ने अपने मत की पुष्टि में निम्नलिखित प्रमाण दिये हैं—
(१) ज्ञानेश्वर की भाषा की तुलना में नामदेव की भाषा अर्वाचीन लगती है।
(२) यदि नामदेव का जन्म-काल ११६२-१२०२ माना जाय तो १३ वीं
शताब्दी के हिन्दी कवि चन्द की भाषा पुरानी प्रतीत होती है। उसकी अपेक्षा नामदेव
के हिंदी पदों की भाषा अर्वाचीन लगती है।
(३) नाभादास ने विष्णुस्वामी की जो परंपरा दी है उसमें ज्ञानेश्वर का नाम
प्रथम और नामदेव का बाद में दिया है।
(४) नामदेव के गुरु विसोबा खेचर मूर्ति-पूजा के विरोधी थे। उन्होंने कहा
है—'पाषाण की प्रतिमा कभी बोलती नहीं।' १ इस्लाम भी मूर्ति-पूजा का विरोधी है।
मुसलमानों का शासन १४ वीं शताब्दी में दक्षिण में दृढमूल हुआ। अतः विसोबा खेचर
का काल भी यही हो।
(५) मराठवाड़े में मुसलमानों के प्रवेश अर्थात् १४ वीं शताब्दी का अंत ही
नामदेव का काल हो। यह उनके अभंग की निम्नलिखित पंक्तियों से स्पष्ट होता है—
ऐसे देव हहि फोडिले तुरकीं।
घातले उदकीं बोभातिना ॥
(तुर्कों ने इस प्रकार मूर्ति-भंजन किया।)
अब डॉ० भांडारकर के इन तर्कों पर क्रमशः विचार करेंगे—
(१) भाषा का अर्वाचीनत्व
लोग नामदेव के मराठी अभंगों की भाषा की नवीनता (अर्वाचीनता) की
दृष्टि से उनका आविर्भाव काल ज्ञानदेव से सौ वर्ष बाद का मानते हैं। परन्तु आधुनिक
भाषाएँ उतनी नवीन नहीं हैं जितनी बहुधा समझी जाती हैं।
ज्ञानदेव नामदेव के समकालीन अवश्य थे परंतु उनकी भाषा की प्राचीनता का
यह कारण नहीं है कि उस समय तक आधुनिक मराठी का आविर्भाव नहीं हुआ था
बल्कि यह कि व्युत्पन्न होने के कारण परंपरागत साहित्यिक भाषा पर उनका अधिकार
था जिसे लिखने में साधारण पढ़े-लिखे होने के कारण नामदेव असमर्थ थे। स्वयं ज्ञान-
देव ने सीधी-सादी मराठी में अभंग रचना की थी।
नामदेव की भाषा की अर्वाचीनता के संबंध में डॉ० रा० द० रानडे का मत
दृष्टव्य है—
१. पाषाणाचा देव बोलेचिना कभी।
—सकल संत गाथा, अभंग १३६१

संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ६६
"The fact that there is a difference of language between Jnane-
shwari and the Abhangs of Namdev is not an arguement to
prove any difference of time between the two great saints.
The originals of Namdev’s Abhangs are not presreved. They
have undergone successive change, as they were recited and
have been handed over from mouth to mouth All these
facts account for the modern-ness of Namdeva's style "¹
(२) हिंदी कवि चंद और संत नामदेव—डॉ० भांडारकर नामदेव की हिंदी को
अर्वाचीन तथा १३ वीं शताब्दी के हिंदी कवि चंद की भाषा को पुरानी बताते हैं। इस
संदर्भ में यह ध्यान में रखना होगा कि एक मराठी भाषी संत ( नामदेव ) ने हिंदी में
रचना की है। उनकी भाषा अर्वाचीन न होकर मराठी-सदृश है। प्रत्युत चंद की
मातृभाषा हिंदी होने से उसकी हिंदी शुद्ध हिंदी है वह प्राचीन नहीं।
एक ही कालखण्ड के परंतु विभिन्न मातृभाषी दो कवियों की भाषा शैली की
तुलना समीचीन नहीं जान पड़ती है।
(३) विष्णु स्वामी की परंपरा—विष्णु स्वामी पंथ की परंपरा देते
हुए नाभादास ने अपने 'भक्तमाल' में ज्ञानेश्वर के पश्चात् नामदेव का उल्लेख किया
है। डॉ० भांडारकर ने इसे इन दोनों के समकालीन न होने का प्रमाण प्रस्तुत किया है।
परंतु 'भक्तमाल' में इस प्रकार का कोई उल्लेख नहीं है।² अलबत्ता प्रियादास विरचित
'भक्तमाल' की रसबोधिनी टीका में 'भये उभे शिष्य नामदेव धी त्रिलोचनजू' ऐसा
उल्लेख है जो ज्ञानेश्वर को संबोधित कर किया गया है। प्रियादास को यही कहना
अभिप्रेत है कि नामदेव ज्ञानेश्वर के शिष्य थे। ऐसी परिस्थिति में यह सिद्ध होता है कि
ज्ञानेश्वर तथा नामदेव समकालीन थे।
(४) विसोबा खेचर का मूर्ति-पूजा विरोध—'पाषाण की प्रतिमा बोलती नहीं'
यह बात कम से कम हिंदू धर्म के लिए तो नवीन नहीं थी। इसके लिए विसोबा को
इस्लाम की शरण में जाने की आवश्यकता न थी। एक बात और यह कि मुसलमानों
का शासन दक्षिण में शक १२४० में अविरोध दृढ़मूल हुआ। इसके लिए १४वीं शताब्दी
तक ठहरने की आवश्यकता न थी।
(५) तुर्कों का निर्देश—नामदेव ने मूर्तिभंजन के संदर्भ में तुर्कों का उल्लेख किया

  1. Mysticism in Maharashtra : R. D. Ranade P. 184.
    २. श्री नामदेव चरित्र , पृ० ३८
    प्रस्तावना व समीक्षण—रं० ह० मायंगकर

है। डॉ० भांडारकर का कथन है कि The Mohamedans were often
called Turkas i e Turkas by the Hindus in the early times ' परंतु
तुर्कों ने यह मूर्ति भंजन दक्षिण में ही किया ऐसा नामदेव ने नहीं कहा है। संभव है कि शके
१२१२ में नामदेव ने ज्ञानेश्वर के साथ जो तीर्थयात्रा की उस समय की उत्तर भारत की
परिस्थिति की ओर उन्होंने संकेत किया हो। दक्षिण में रहते हुए भी उत्तर में मुसलमानों
के आक्रमणों का इस अभंग में वर्णन करने की संभावना है।
कुछ अंग्रेज ग्रंथकारो जैसे डा० निकाल मैकिनकाल १ आदि ने डॉ० भांडार-
कर द्वारा निर्धारित नामदेव के जन्म काल को ही ग्राह्य माना है अत उनके मत के
परीक्षण की आवश्यकता नहीं।
डॉ० जे० एन० फ़र्कुहर २ ने नामदेव का काल ई० स० १४३० के आस पास
निर्धारित कर उसके आधार पर रामानंद का काल निश्चित किया है।
डा० मोहनसिंह का मत
डा० मोहनसिंह 'दीवाना ३ ने नामदेव का काल सन् १३६० और १४५० ई०
के बीच माना है। इसका आधार उन्होंने नामदेव का मृत गाय जिलानेवाला पद४
माना है, जिसके नामदेव रचित होने में डॉ० राजनारायण मौर्य को संदेह है। ५
डॉ० मोहनसिंह ने फीरोजशाह बह्मनी को ही वह सुलतान माना है जिस ने
नामदेव को मृत गाय जिलाने की आज्ञा दी थी। वह दक्षिण में था और उसका काल
सन् १३६७ से १४२२ ई० के मध्य का है। अन्य फीरोज सुलतान फीरोजशाह खिलजी
( राज्यकाल सन् १२८२ ई० से १२६६ तक ) के साथ नामदेव के काल का
मेल नहीं बैठता और फिरोजशाह तुगलक ( राज्यकाल सन् १३५१ ई० से १३८८ ई०
तक ) के साथ स्थान का मेल नहीं बैठता क्योंकि फीरोजशाह न तो दक्षिण में आया
था और न संत नामदेव दिल्ली ही गये थे। इसी आधार पर डा० मोहनसिंह ने नाम-
1 Psalms of Maratha Saints ( 1919 )
2 Historical Position of Ramanand
—J R A S of Great Britain & Ireland April 1920
३ भक्त शिरोमणि नामदेव की नई जीवनी नई पदावली, पृ० ३
४ सुलतानु पूछै सुनु वे नामा। देखऊ राम तुम्हारे कामा ॥
—गुरु ग्रंथसाहब नामदेव के हिंदी पद, ४७ वाँ
५ हिंदुस्तानी ( जनवरी-मार्च १६६२ ) पृ० ११२

संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ७१
देव का काल खींचकर आगे बढ़ा दिया है। उन्होंने एक और तर्क दिया है। वह है
संत नामदेव का रामानंद का शिष्य होना । वे रामानन्द का जन्म सन् १४२० और
३० ई० के बीच तथा कबीर का सन् १४५० और ६० के बीच मानते हैं।
डॉ० मोहनसिंह के इन दोनों तर्कों में कोई तथ्य नही है। इसका तो कही
उल्लेख भी नही है कि रामानन्द नामदेव के गुरु थे। मराठी और हिंदी साहित्य में भी
यह प्रचलित है कि संत ज्ञानेश्वर के पिता के गुरु रामानन्द थे । किन्तु श्री भावे¹ के
मत से उनके गुरु श्रीपाद स्वामी थे । रामानन्द का काल आज भी निश्चित नही है पर
इतना अवश्य निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि वे संत नामदेव के गुरु नही हो
सकते ।
आचार्य विनयमोहन शर्मा को इस घटना के घटित होने में ही संदेह है। यदि
इस पर विश्वास करें तो यह पद प्रक्षिप्त मानना पड़ेगा । उन्होंने स्पष्ट शब्दों में अपना
मत इस प्रकार व्यक्त किया है— 'यदि किसी सुलतान के दरबार में यह घटना घटी
होती तो वह अवश्य ही लेखबद्ध हुई होती । हो सकता है यह घटनावाला 'पद' भग-
वान विठ्ठल के नाम का चमत्कार प्रदर्शित करने के लिए रचा गया हो । उपर्युक्त
कारणों से नामदेव का फीरोजशाह वहमनी के समय रहना सिद्ध नही होता ।'²
इस घटना के आधार पर नामदेव के काल को सौ वर्ष आगे ले जाना किसी
तरह तर्क-संगत नही कहा जा सकता ।
मेकालिफ का मत
मेकालिफ ने नामदेव के असंग 'मार्के जन्मपत्र बाबाजी ब्राह्मणों' का आधार
लेकर शके ११९२ (तदनुसार स० १२७० ई०) को नामदेव का जन्म-शक माना है—
‘Namdeo was born on Sunday, the 11th day of the light half of
the month of Kartik in the Shaka year 1192 i, e. 1270 A. D.’³
जनम साखी
सं० १८६८ ई० में बाबा पूरणदास की लिखी 'जनम साखी श्री स्वामी नाम-
देव जी की, में वामदेव की बाल विधवा कन्या लक्षावती की कथा आई है। इस कथा में
कहा गया है कि अपनी १२ वर्ष की अवस्था में ही पुत्र प्राप्ति की अभिलाषा से उसके
पेट से जो बालक पैदा हुआ वही नामदेव है । इस बालक का जन्म रविवार फाल्गुन
१. महाराष्ट्र सारस्वतः वि० ल० भावे, पृ० १३३ ।
२. हिंदी को मराठी संतों की देन पृ० ३०
3. Sikh Religion Vol. VI : Mcauliffe