सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० नामदेव की हिन्दी कविता
एक दूसरा अनुमान भी कुछ विवेचकों द्वारा प्रस्तुत किया गया है। उनका
कहना है कि नामदेव के किसी शिष्य ने अथवा अन्य संत ने महाराष्ट्रीय संत नामदेव
के मराठी अभंगों का हिन्दी में अनुवाद करने का प्रयत्न किया है। कई ऐसे पद भी हैं
जो हिन्दी मराठी में समान भाववाले हैं।
अब ऊपर दिये हुए तर्कों पर क्रमशः विचार किया जायगा। यह बात निर्विवाद
है कि संत नामदेव ज्ञानेश्वर के साथ उत्तर भारत की यात्रा के लिए गये थे। यह यात्रा
उन्होंने तब की थी जब विट्ठल के प्रति उनकी भक्ति अत्यन्त भावात्मक थी। वे विट्ठल
के बिना तड़पने लगते थे। यदि उन्होंने पंढरपुर छोड़कर उत्तर भारत की यात्रा की तो
प्रौढ़ावस्था में—जब उनमें परिपक्व ज्ञान और अनुभूति थी। ऐसी अवस्था में पंजाब की
यात्रा करना असंभव नहीं।
यह सही है कि 'तीर्थावली' का विस्तृत वर्णन करने वाले नामदेव ने पंजाब की
यात्रा का उल्लेख तक नहीं किया, पर अभी यह प्रमाणित करना शेष है कि 'तीर्थावली'
के अभंग नामदेव रचित हैं। डॉ० तुलपुले के अनुसार नामदेव की गाथा के २५-२६ सौ
अभंगों में से केवल ५-६ सौ अभंग ही वास्तव में नामदेव रचित हैं, शेष प्रक्षिप्त हैं।१
दूसरी बात यह भी है कि संत नामदेव ने पंजाब यात्रा अपने जीवन के उत्तरकाल में
(५० वर्ष की अवस्था के ऊपर) की, जब उनके पास ब्रह्म की अनुभूति, सांसारिकता
से वैराग्य आदि के अतिरिक्त अन्य कुछ कहने को नहीं था।
यह भी प्रसिद्ध है कि संतों ने सर्वदा ही अपने बारे में कम कहा है। इतिहास
में नामदेव का उल्लेख न आना कोई आश्चर्य की बात नहीं। पहले के इतिहास ग्रन्थों में
राजाओं की वंशावली, दरबारियों की सत्ता के लिये स्पर्धा, युद्धों के वर्णन आदि के
अतिरिक्त अन्य जानकारी बहुत ही कम मात्रा में आ पाती थी। न जाने कितने संतों
का वर्णन इतिहास में नहीं है। अतः संत नामदेव की पंजाब यात्रा का वर्णन इतिहास
में न होना यात्रा का अप्रमाण नहीं हो सकता।
महाराष्ट्रीय संत नामदेव के किसी शिष्य द्वारा हिन्दी पदों की रचना की जो
बात कही गई है, वह तो पिछले तर्क—हिन्दी मराठी पदों के साम्य से ही व्यर्थ सिद्ध हो
जाती है। यदि हिन्दी के पद उनके किसी शिष्य द्वारा रचे गये होते तो मराठी अभंगों
की शब्दावली का साम्य, भाव साम्य और महाराष्ट्र में प्रचलित यादवकालीन मराठी के
कुछ विशिष्ट प्रयोग न मिलते। हिन्दी के जो पद मराठी से साम्य रखते हैं उनकी संख्या
केवल ६-१० है। यदि हिन्दी पद मराठी के अनुवाद होते तो हिन्दी के सैकड़ों पदों की
छाया मराठी के अभंगों में कहीं-न-कहीं तो मिलती, पर ऐसा नहीं है।
१. पाँच संत कवि : डॉ० श० गो० तुलपुले, पृ० १३५।