सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 332 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 54

संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ५७
बातें विस्तार के साथ लिखी हैं। उन्होंने "कमलाकर संताचे आख्यान" का एक अभंग
प्रस्तुत किया है जिसमें विष्णुदास नामा ने अपने पूर्ववर्ती संतों के साथ नामदेव का भी
नाम दिया है।¹ इससे इतना तो स्पष्ट हो ही जाता है कि नामदेव और विष्णुदास
नामा दो भिन्न व्यक्ति हैं। परन्तु यह संभव है कि नामदेव ने अपने अभंगों में "विष्णु
दास नामा" की मुद्रा लगाई हो ।
विष्णुदास नामा की 'बावन अक्षरी' की एक प्रति इतिहासाचार्य राजवाडे को
मिली थी जिसमें स्वयं विष्णुदास नामा ने नामदेव की वंदना की है। 'नामदेव के
पवित्र नाम के उच्चारण से वह हरि-हर का भक्त हो जाता है क्योंकि गोविंद को नाम
प्रिय है।'२
श्री पांगारकर के अनुसार विष्णुदास नामा जाति का ब्राह्मण न होकर 'शिंपी'
(दर्जी) था। इसके लिए वे उन्हीं की रचना से उदाहरण देते हैं। विष्णुदास नामा का
कथन है—तुलसी का पौधा यदि अपवित्र भूमिपर उगा हो उसे अपवित्र न समझा
जाय। विष्णुदास नामा विट्ठल के भजन में तल्लीन हो गया, उसे शिंपी (दर्जी) न
कहा जाय।³ श्री पांगारकर विष्णुदास नामा को संत एकनाथ का समकालीन तथा
मुक्तेश्वर का पूर्ववर्ती बताते हैं। 'ओवी' उसका प्रिय छंद है।
इसके अतिरिक्त विष्णुदास नामा की रचनाओं में आचार धर्म पर अधिक बल
दिया गया है। उनकी कुछ रचनाएँ कूट समस्यात्मक भी हैं। विष्णुदास नामा अधिक-
१. कोण्ही एके अवसरी । सकल संत मिलोनी अवधारी ।
कीर्तन करितां गजरी । पंढरपुरा चालिले ॥
ज्ञानदेव सोपानदेव । चांगा मुक्ताई नामदेव
कबीर रोहिदास भक्त राय । ब्रह्मानंदे चालले ॥
—विष्णुदास नामा कृत महाभारत (कमलाकर संताचे आख्यान), मुंबई
मराठी ग्रंथ संग्रहालय
२. नामदेवाचे पवित्र । नाम उच्चरिता अखंडित ।
नामें होय हरि हर भक्त । नाम प्रिय गोविंदा ॥
—मराठी वाङ्मयाचा इतिहास (खंड पहिला) पृ० ५५४
३. अमंगळु भूमीसी उगवल्या तुलसी । अपवित्र तयासी म्हणो नये ।
विष्णुदास नामा विट्ठली मिळाला । शिंपी शिंपी त्याला म्हण नये ।
—मराठी वाङ्मयाचा इतिहास (खंड दूसरा) पृ० ५७८