सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८ नामदेव की हिन्दी कविता
तर विषय-निष्ठ और बहिर्मुख है। उनकी रचना में वर्णनात्मकता अधिक है। संत
नामदेव एकान्तिक विट्ठल भक्त और भावुक हैं। इनकी रचनाओं में अनुभूति की सच्चाई
और मामिकता है।
इन प्रमाणों के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि विष्णुदास नामा और
संत नामदेव दो भिन्न व्यक्ति हैं।
(३) नामा पाठक
संत एकनाथ कृत 'संत माला' में इनका उल्लेख आता है। चित्राव शास्त्री ने¹
इनका काल ई० स० १३७८ माना है। डॉ० तुलपुले² के अनुसार नामा पाठक
ज्ञानेश्वर कालीन कान्हो पाठक का पोता है। इनका 'अश्वमेध पर्व' नामक एक ओवी-
बद्ध ग्रंथ मिलता है। इनकी रचना संत नामदेव की रचना से बिल्कुल अलग है इस
लिए इनका उनसे कोई सम्बन्ध भी नहीं है।
(४) नामदेव शिंपी
नामदेव शिंपी को ज्ञानेश्वर कालीन नामदेव का सम-सामयिक कहा गया है।
ये भी अपने आपको विष्णुदास नामा लिखते हैं। दामोदर पंडित ने शके ११८६ में
इस कवि को महानुभाव पंथ की दीक्षा दी।³ इस बात का 'स्मृति स्थल' में भी
उल्लेख है।⁴
(५) नेमदेव
महानुभाव पंथी एक अन्य व्यक्ति 'नेमदेव' भी प्रसिद्ध है जिसका उल्लेख महानु-
भाव पंथ के प्रसिद्ध ग्रन्थ 'लीला चरित्र'⁵ के 'विठ्ठल वीरु वचन' नामक प्रकरण में
आया है। इस ग्रन्थ के अनुसार यह 'कोली' (मछुआ) जाति का था और महानुभाव
पंथ में दीक्षित हुआ था। इसके काल का कुछ निश्चित पता नहीं। धो चांदोरकर ने
इसे ज्ञानेश्वरकालीन संत नामदेव के साथ जोड़ दिया पर इसका न तो वारकरी संप्रदाय
से कोई सम्बन्ध था न इसकी रचना का पता ही चलता है।
(६) बाल क्रीड़ा कर्ता नामदेव
इसके बाल लीला के अभंग बहुत ही मधुर हैं। परन्तु इन अभंगों की भाषा
अर्वाचीन प्रतीत होती है। उसने अपने एक अभंग में विसोबा खेचर का उल्लेख
१. मध्ययुगीन चरित्र कोश : सिद्धेश्वर शास्त्री चित्राव पृ० ४१२।
२. महाराष्ट्र सारस्वत (पुरवणी) : डॉ० शं० गो० तुलपुले पृ० ७५६।
३. महानुभावीय मराठी वाङ्मयः य० खु० देशपांडे।
४. स्मृति स्थलः संपादक : वा० ना० देशपांडे, पृ० ७४-७५।
५. लीला चरित्र (उत्तरार्द्ध) सम्पादक : ह० ना० नेने, पृ० ४२३।