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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 332 में से

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पृष्ठ 56

संत नामदेव की हिन्दी कविता ५६
किया है ।१ उसने ग्रन्थ के प्रारम्भ में शालिवाहन शक के चौदहवी शताब्दी के 'बहिरा
पिसा' उर्फ बहिरा जातवेद (बहिरंभट) का उल्लेख किया है । ज्ञानेश्वर का समकालीन
तथा विसोवा खेचर का शिष्य नामदेव चौदहवी शती के कवि का उल्लेख अपनी रचना
में कैसे कर सकता है ?
एक ओर नामदेव का उल्लेख 'महिकावती की बखर' में पाया जाता है ।
इसके अतिरिक्त मारवाड़ में भी नामदेव नामक किसी संत का होना बताया
जाता है । पर उसकी जीवनी और रचना के कुछ ज्ञात न होने के कारण उसके विषय
में कुछ कहा नहीं जा सकता ।
सबसे अधिक विवाद इस बात को लेकर चला है कि महाराष्ट्रीय संत नामदेव
भिन्न है और पंजाबी (गुरु ग्रन्थ साहब के) नामदेव जिनकी रचना हिन्दी में भी मिलती
है, भिन्न है। इस संबंध में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किये गये है-
(क) जो नामदेव पंढरपुर के विट्ठल को एक क्षण भी छोड़ने के लिए तैयार नही
थे वे पंढरपुर छोड़कर लगभग २० वर्ष तक दूर रहे यह आश्चर्य की बात है जिस पर
विश्वास नही होता ।
(ख) जिन नामदेव ने ज्ञानेश्वर महाराज के साथ की यात्रा का अपने 'तीर्थावली'
के अभंगों में इतना विस्तृत और रोचक वर्णन किया है, वही इतनी दीर्घकालीन यात्रा
का वर्णन एक भी स्थान पर, न मराठी अभंगों, न हिन्दी पदों में करें, यह असंभव-सा
जान पड़ता है ।
(ग) महाराष्ट्रीय संत नामदेव की पंजाब यात्रा अथवा पंजाब निवास का उल्लेख
न तो महाराष्ट्र के इतिहास में प्राप्त होता है न पंजाब के इतिहास में ।
ऊपर के तर्कों के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि महाराष्ट्रीय संत नामदेव
का पंजाब जाना, गुरदासपुर जिले के घोमान गाँव में लंबी अवधि तक निवास करना
और हिन्दी में पद रचना करना अन्तः साक्ष्य तथा बहिःसाक्ष्य दोनों से रहित है । इस
संबंध में महाराष्ट्र के कुछ विवेचकों का यह अनुमान प्रस्तुत किया जाता है—'गुरु ग्रन्थ
साहब के पद-रचयिता नामदेव का महाराष्ट्र के ज्ञानदेव कालीन नामदेव से कोई संबंध
नही है । वह नामदेव की पंजाब यात्रा के समय उनका कोई शिष्य रहा होगा, जिसने
बाद में अपने गुरु का नाम धारण कर हिन्दी में पद रचे होंगे ।' डॉ० विनयमोहन शर्मा
ने इस अनुमान को निराधार सिद्ध किया है ।२
१. नामा मनी आठवी खेचर चरण । तयाचे कृपेने सिद्धी जावो ।।
श्री नामदेव महाराज आणि त्याचे समकालीन संत
—ज० र० आजगावकर, पृष्ठ ११
२. हिन्दी को मराठी संतो की देन, पृ० १०१।।