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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 332 में से

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पृष्ठ 49

५० नामदेव की हिन्दी कविता
दरिया ने लिखा है¹ 'मन के पीछे सारा जगत् भ्रमित है, जो मन के रहस्य को समझ
लेता है वही बुद्धिमान है।' एक अन्य स्थान पर उन्होंने फिर लिखा है²—'मन ही
नियम और आचारों का पालन कराता है और मन ही मन को पूजा चढ़ाता है।'
इस प्रकार संतों ने मन के महत्त्व और उसके पवित्रीकरण का उपदेश दिया है।
संतों पर नाथ पंथी भाषा और अभिव्यक्ति का भी बड़ा व्यापक प्रभाव पड़ा है।
कबीर आदि संत तो उससे इतना अधिक प्रभावित हुए कि कहीं-कहीं पर उन्होंने शब्द,
वाक्यांश, वाक्य यहाँ तक कि पूरे पद पुनरुद्धृत किये हैं। यह साख गोरख और कबीर
में समान रूप से पाई जाती है।³
संतों की पारिभाषिक शब्दावली लगभग पच्चीस प्रतिशत नाथ पंथियों से ही ली
गई है। संतों के किसी शब्द का अर्थ यदि समझ में न आये तो उसकी खोज सबसे
पहले नाथ पंथी साहित्य में करनी चाहिये।
संत लोग नाथ पंथी योगियों के स्वरूप से भी पूर्णतया परिचित थे। कबीर आदि
संतों ने उस स्वरूप का वर्णन विविध पंथों के साधुओं के वेषाडम्बर की आलोचना के
प्रसंग में किया है। कबीर ने नाथ पंथी साधु के वेषाडम्बर के प्रति उपेक्षा भाव प्रकट
किया है।⁴
सच तो यह है कि नाथ संप्रदाय का पूरा ज्ञान हुए बिना निर्गुण विचारधारा
को समझना यदि असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य ही है।
इन विवरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि निर्गुण काव्यधारा का प्रारम्भ बौद्ध
तन्त्र तथा उनकी अनेक शाखाओं के द्वारा पाँचवीं-छठवीं शताब्दी से ही हो गया था।
तान्त्रिकों की ये रचनाएँ संस्कृत में हैं। आगे चलकर दसवीं शताब्दी के आस पास देशी

१. मन के पीछे सब जगत् भुलाना, मन चीन्हे सो चतुर सुजाना।
—दरिया सागर, पृ० ६।
२. मन ही नेम अचार करावे, मन ही मन के पूजा चढ़ावे।
—दरिया सागर, पृ० ३०।
३. यहु मन सक्ती, यहु मन सीव, यहु मन पाँच तत्व को जीव।
यहु मन ले उन्मनि रहै तो तीन लोक की बाता कहै ॥
—गोरख बानी संग्रह, पृ० १८ तथा संत कबीर, पृ० ८२।
४. बाबा जोगी एक अकेला जाके तीरथ बरत न मेला।
झोली पत्र विभूतिन बटुआ अनहद बेन बजावे ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० १५८।