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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

३६ नामदेव की हिन्दी कविता
का शून्य ही है। यह सूक्ष्मतम और अनिर्वचनीय होते हुए भी करुणामय, गरीबनिवाज
और भक्तवत्सल है।
भक्तों के भगवान की इन विशेषताओं से विशिष्ट होने पर भी यह उसे उससे
सर्वथा भिन्न है। भक्तों के भगवान 'बाहिरजामी' किन्तु इनके राम 'अंतरजामी' है।
अंतरजामी होते हुए भी वे भक्तों को दर्शन देते हैं। उनका यह रूप अनिर्वचनीय
होता है।१
यदि भक्त किसी प्रकार उसका वर्णन करने का प्रयास भी करे तो उसको कोई
समझ नहीं सकता। यदि थोड़ा बहुत समझने लगे तो उस पर उसे विश्वास नहीं
होता।२
इस प्रकार हम देखते हैं कि संतों का निर्गुण उपास्य रूपवान और अरूप होते
हुए भी दोनों से विलक्षण है। इसके विपरीत सगुणवादियों का उपास्य मानवों के बीच
में उन्हीं के रूप में प्रतिष्ठित रहता है।
मानव जीवन की संपूर्ण शक्ति, सारा सौंदर्य और समस्त शील का पूर्ण आविर्भाव
उन्हीं में मिलता है। यही कारण है कि एक का उपास्य केवल अनुभूति और साधना-
गम्य मात्र होने के कारण रहस्यपूर्ण है और दूसरे का प्रत्यक्ष होने के कारण प्रेम और
श्रद्धा का पात्र है।
भगवान का प्रथम रूप केवल बुद्धिवादी साधकों को ही आकृष्ट कर पाता है जब
कि उनका दूसरा रूप संपूर्ण सृष्टि को तन्मय और रसमग्न रखने की क्षमता रखता है।
उपास्य रूप सम्बन्धी इस अंतर ने निर्गुण और सगुण काव्य धाराओं को बिलकुल अलग
कर रखा है।
निर्गुण और सगुणवादी कवियों में स्वभावगत भेद भी दिखाई पड़ता है।
निर्गुणवादी अधिकतर क्रांतिदर्शी, सत्यान्वेषी, अक्खड़, फक्कड़ और घुमक्कड़ होते थे।
उनके व्यक्तित्व की ये विशेषताएँ उनकी रचनाओं में स्पष्ट प्रतिबिंबित मिलती हैं।
इसके विपरीत सगुणवादी कवि अधिकतर सामंजस्यवादी, रूढ़िवादी, सत्त्ववादी प्रेमी
जीव होते थे। उनके व्यक्तित्व की इन विशेषताओं ने उनकी रचनाओं को निर्गुनिया
कवियों की रचनाओं की अपेक्षा अधिक कोमल, रागरंजित और मधुर बना दिया है।
निर्गुण काव्यधारा सगुण काव्यधारा से इस दृष्टि से भी भिन्न है।
१. कबीर ग्रन्थावली पृ० १५
कबीर देखा एक अंग महिमा कही न जाई।
२. कबीर ग्रन्थावली पृ० १७
दीठा है तो कस कहू, कह्या न कोइ पतियाइ।

हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि ३७
निर्गुण एवं सगुण कवियों में हमें रस सम्बन्धी अंतर भी दिखलाई पड़ता है।
निर्गुण काव्यधारा भक्ति, शांत और वीर इसकी वह त्रिवेणी है जिसमें अवगाहन कर
मानव जाति अपने युग-युग के कालुष्य धो सकती है।
इसके विपरीत सगुण काव्यधारा में हमें शृंगार और भक्ति के मधुमय सुहाग से
उद्भूत माधुर्य भाव रूपी शिशु की रसमयी लीलाओं का वैभव मिलता है।
एक धारा पतितपावनी है और दूसरी आनन्दविधायिनी । यही दोनों में
अंतर है।
इसके अतिरिक्त दोनों धाराओं में प्रवृत्तिगत भेद भी दिखाई पड़ता है । निर्गुण
काव्यधारा भूमि बुद्धिवादिता और विचारात्मकता है। इसके विपरीत सगुण काव्यधारा
परम भाव-प्रवण, श्रद्धामूलक और अनुभूति प्रधान है।
दोनों धाराओं में साधना और सिद्धि सम्बन्धी अंतर भी है। निर्गुण काव्यधारा
का सम्बन्ध जीवन के साधना पक्ष से है जब कि सगुण काव्यधारा में जीवन के सिद्धि
पक्ष की झाँकी सजाई गई है।
एक में उन समस्त साधनों और प्रयत्नों का उल्लेख किया गया है जिससे आनन्द
ब्रह्म की उपलब्धि हो सकती है। दूसरे में स्वयं आनन्द रूप ब्रह्म का ही वर्णन किया
गया है।
सगुण कवियों का लक्ष्य भगवान के सगुण, साकार, आनन्दमय रूप की झाँकी
का उद्घाटन करना था। इसके विपरीत निर्गुण कवियों का उद्देश्य अपने हृदयस्थ 'मुनि
मंडलवासी पुरुष' की रहस्यानुभूति करना था। सगुण एवं निर्गुण धारा के इन भेदों ने
ही एक दूसरे को परस्पर अलग कर रखा है।
निर्गुण काव्यधारा का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
ऐतिहासिक स्थिति से तात्पर्य निर्गुण काव्यधारा के काल सम्बन्धी सीमा और
विस्तार के निर्णय से है। निर्गुण काव्यधारा के प्रमुख प्रवर्तक संत कबीर माने जाते
हैं, किंतु सच्ची बात यह है कि निर्गुण काव्यधारा का बीजारोपण नामदेव, जयदेव,
त्रिलोचन, सदन, बेनी, रामानन्द, धन्ना, पीपा, सेन आदि संत कबीर से पहले ही कर
चुके थे। कबीर ने उसे व्यवस्थित रूप देकर विकसित, प्रचारित और प्रसारित किया
था। भक्ति की उत्पत्ति के सम्बन्ध में निम्नलिखित उक्ति प्रसिद्ध है :—
भक्ति द्राविड़ उपजी लाये रामानन्द ।
परगट किया कबीर ने सप्त द्वीप नवखंड ॥
यदि इस उक्ति में कोई सार है तो निर्गुण काव्यधारा का उदय १४ वीं शताब्दी
से मानना पड़ेगा । डॉ० गोविंद त्रिगुणायत को तो यह उक्ति विशेष रूप से सारगर्भित

३८ नामदेव की हिन्दी कविता
प्रतीत होती है। उनके अनुसार निर्गुण काव्यधारा का उदय १४ वो शताब्दी से मानना
ही ठीक है।१
डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदीजी का भी यही मत है।२
निर्गुण काव्यधारा की अंतिम सीमा निश्चित करना थोड़ा कठिन मालूम होता
है क्योंकि निर्गुणिया संतों की परम्परा भारत में आज भी जीवित है। विविध पंथों के
रूप में नहीं अपितु उनकी जैसी प्रवृत्ति वाले साधु संतों के रूप में भी। किन्तु संत तुलसी
साहब के बाद के संतों में कोई ऐसा अलौकिक प्रतिभासंपन्न संत नहीं हुआ जिसकी
वाणी में सरस काव्य का उन्मेष हो। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि संत तुलसी साहब
के बाद यह धारा केवल नाम मात्र को ही शेष रह गई थी। संत तुलसी साहब के काल
के सम्बन्ध में थोड़ा मतभेद है। कुछ विद्वान् उनका काल १८१७ विक्रमी से लेकर
१८६६ विक्रमी तक मानते हैं और कुछ १८२० से लेकर १६०० विक्रमी तक निश्चित
करते हैं। इस संदर्भ में डॉ० गोविंद त्रिगुणायत का मत समीचीन जान पड़ता है।३
सिद्ध संप्रदाय (सिद्धों की परंपरा) : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
उपनिषदों में कर्मकाण्ड के विरुद्ध जो प्रतिक्रिया मिलती है वह अन्तर्धारा के रूप
में (अप्रत्यक्ष रूप में) ही। उसका प्रत्यक्ष रूप में खण्डन और विरोध तो बौद्ध धर्म ने
ही किया। बौद्ध निरीश्वरवादी थे। सदाचार, अहिंसा, आत्मविश्वास, समाधि, शील
और प्रज्ञा आदि ही बौद्ध धर्म के वे अनमोल रत्न हैं जिनके द्वारा 'निर्वाण' की प्राप्ति
हो सकती है। कालान्तर में बौद्ध धर्म दो भागों में बँट गया—हीनयान और महायान।
आगे चलकर महायान के भी कई टुकड़े हो गये। वज्रयान और सहजयान इसके अंतिम
टुकड़े हैं। इसमें कष्टपूर्ण व्रतसंयम आदि की कोई गुंजाइश नहीं रह गई।
बौद्ध धर्म में कालान्तर में अनाचार का प्रवेश हो गया। लेकिन इस देश से इस धर्म
का निष्कासन प्रधानतः शंकर, कुमारिल तथा उदयन आदि वेदान्तिक और मीमांसक
१. हिंदी की निर्गुण काव्यधारा और उसकी दार्शनिक पृष्ठ भूमि, पृ० १४।
२. मध्यकालीन धर्मसाधना, डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृ० ६५।
३. 'तुलसी साहब की स्थिति के सम्बन्ध में हम उपर्युक्त दोनों मतों में से चाहे किसी
को स्वीकार करें, पर उनकी अंतिम तिथि के सम्बन्ध में कोई विशेष मतभेद नहीं
है। इस आधार पर हम निर्गुण काव्य धारा की अंतिम अवधि १६ वो शताब्दी
का अंतिम वर्ष मान सकते हैं।'
—'हिंदी की निर्गुण काव्यधारा और उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि' पृ० १४।

हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि ३६
आचार्यों द्वारा ही हुआ। उत्तरी भारत में हर्षवर्द्धन तक इसे फलने-फूलने के लिए राज-
कीय सहारा मिला। बिंबसार, अशोक, कनिष्क आदि राजाओं से इसे पर्याप्त सहारा
मिला। हर्षवर्द्धन के पश्चात् राजकीय सहायता न मिलने के कारण बौद्ध संन्यासियो को
उन जगहों में जाना पड़ा जहाँ वे निम्न स्तर के लोगो के बीच अपने नानाविध चमत्कार
दिखाकर कुछ अर्जित कर सकने में समर्थ हो सकते। फलस्वरूप उनमे उच्च एवं शिष्ट
मानसिक एवं नैतिक प्रेरणाओं का अभाव बढ़ने लगा और वे जादू टोनी, तंत्रों-मंत्रों की
ओर अत्यंत वेग से मुड़ गये। मंत्रयान का ही अग्रिम विकास वज्रयान की संज्ञा से अभि-
हित किया जाता है। दोनो में अन्तर बहुत ही कम है। सौम्य अवस्था का नाम मंत्रयान
और उग्र रूप की संज्ञा वज्रयान। महात्मा बुद्ध ने तो मंत्र तंत्र तथा जादू-टोना को
'मिथ्या जीव' (Bad living) कहकर तिरस्कृत ही किया। किन्तु आगे चलकर उन्ही
के अनुयायियो ने इन्हें निर्वाण-प्राप्ति का एक प्रमुख अंग ही मान लिया और बुद्ध के
मानव व्यक्तित्व के तिरस्कार ने उन्हें मानव लोक से ऊपर उठाकर दिव्य लोक में पहुँचा
दिया। छोटे बड़े मंत्रों की रचना होने लगी। इनके साथ ही हठयोग की जटिल विधियाँ
भी इन लोगों ने अपनाईं। इस प्रकार इन सिद्धो ने भोली-भाली जनता का विश्वास
अर्जित किया। मंत्र, मैथुन तथा हठयोग वज्रयान के तीन प्रमुख तत्त्व मान लिए गये।
राहुलजी के अनुसार इन संप्रदायों का उद्भव-स्थान दक्षिण का श्री पर्वत और
धान्य कटक (गुंटूर, जिला मद्रास) था। वज्रयानी सिद्धों ने मंत्र के उपर्युक्त तत्त्वो के साथ
मद्य और मांस को भी शामिल कर पंच तत्त्वों को 'पंच मकार' को अपनी सहज साधना
का अंग बनाया।
धर्म के नाम पर तो अनाचार का समावेश हुआ ही साथ ही हठयोग की
प्रक्रियाएँ भी इनकी साधना का मुख्य अंग बनीं। इसके परिणामस्वरूप घट के भीतर
चक्र, नाड़ी, शून्य देश आदि की कल्पना करके नाद, बिंदु, सुरति, निरति आदि परि-
भाषिक शब्दो के सहारे अन्तस्साधना का विधान किया गया। इसके कारण वे अपने को
रहस्यदर्शी करार देने लगे और रहस्यमय भाषा में ही पहेलियाँ कह कर लोगो को
आश्चर्य चकित करने लगे।
नाथ पंथ
नाथ पंथ का मूल बौद्धों की यही वज्रयान शाखा है। चौरासी सिद्धों में गोरख-
नाथ (गोरक्ष पा) भी गिन लिए गये हैं। पर यह स्पष्ट है कि उन्होने अपना मार्ग अलग
कर लिया। योगियो की इस हिन्दू शाखा ने वज्रयानियो के अश्लील और वीभत्स
विधानों से अपने को अलग रखा। गोरख ने पतंजलि के उच्च लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति को
लेकर हठयोग का प्रवर्तन किया। वज्रयानी सिद्धो का लीला क्षेत्र भारत का पूर्वी भाग

४० नामदेव की हिन्दी कविता
था । गोरख ने अपने पंथ का प्रचार देश के पश्चिमी भागो मे—राजपूताने और पंजाब
में किया ।
गोरखनाथ का समय
गोरखनाथ का काल निर्णय करते समय विद्वानों के बीच परस्पर मतभेद हो
जाता है । सामान्यतः इस सम्बन्ध में चार मत मिलते हैं—
१. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का मत, जिसमे डॉ० रामकुमार वर्मा और डॉ०
धर्मेन्द्र शास्त्री भी सहमत हैं—गोरख का समय १३ वी शती का
मानता है ।¹
२. डॉ० श्याम सुन्दरदास का मत जो गोरख को १४ वी शती का
मानता है ।२
३. पं० हजारीप्रसाद द्विवेदी और स्व० डॉ० पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल का मत
जो गोरख को १० वी शताब्दी का मानता है ।३
४. धी राहुलजी का मत जो गोरख को १० वी शती के अंतिम चरण का
मानता है ।४
ज्ञानदेव की परंपरा
गोरख को १३ वी शती का सम-सामयिक मानने के लिए सबसे बड़ा और सबल
प्रमाण ज्ञानदेव बतलाई वह नाथ परम्परा की सूची है जिसमें उन्होंने अपने को नाथ
परम्परा में मानते हुए अपने पूर्व के नाथो की एक सूची दी है । वह सूची इस
प्रकार है ।५
आदिनाथ, मत्स्येंद्रनाथ, गोरखनाथ, गैनीनाथ, निवृत्तिनाथ और ज्ञानदेव ।
ज्ञानदेव महाराष्ट्र के संत थे जो अलाउद्दीन (समय संवत् १३५८) के समकालीन
थे । उपरिलिखित महाराष्ट्र परम्परा के अनुसार गोरखनाथ का समय महाराज पृथ्वीराज
के पीछे आता है ।
१. हिन्दी साहित्य का इतिहास : रामचन्द्र शुक्ल, पृ० १६ ।
२. हिन्दी साहित्य, पृ० ६० ।
३. नाथ संप्रदाय : डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृ० ६६ ।
४. 'गोरख सिद्धांत संग्रह', पृ० ४० ।
५. हिन्दी साहित्य का इतिहास, रामचन्द्र शुक्ल, पृ० १८ ।

हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि ४१
जिस प्रकार सिद्धो की संख्या चौरासी प्रसिद्ध है उसी प्रकार नाथों की संख्या
नौ। नाथ पंथ सिद्धो की परम्परा से छंटकर निकला है, इसमें कोई संदेह नही।
श्री विनयकुमार के अनुसार गोरख दसवी शती के अंतिम चरण और ग्यारहवी
शती के प्रारम्भ के सम-सामयिक थे ।१
गोरखनाथ की हठयोग-साधना ईश्वरवाद को लेकर चली थी। अतः उसमें
मुसलमानों के लिए भी आकर्षण था। ईश्वर से मिलाने वाला योग, हिन्दुओ और मुसल-
मानों दोनो के लिये एक सामान्य साधना के रूप में आगे रखा जा सकता है, यह बात
गोरखनाथ को दिखाई दी थी। उसमें मुसलमानों को अप्रिय मूर्तिपूजा और बहुदेवोपासना
की आवश्यकता न थी। अतः उन्होंने दोनों के विद्वेष भाव को दूर करके साधना का
एक सामान्य मार्ग निकालने की संभावना समझी थी और वे उसका संस्कार अपनी
शिष्य परम्परा में छोड़ गये।
नाथ संप्रदाय के सिद्धांत ग्रन्थों में ईश्वरोपासना के बाह्य विधानों के प्रति
उपेक्षा प्रकट की गई है। घट के भीतर ही ईश्वर को प्राप्त करने पर जोर दिया गया
है। वेद शास्त्र का अध्ययन व्यर्थ ठहराकर विद्वानों के प्रति अश्रद्धा प्रकट की गई है
तीर्थाटन आदि निष्फल कहे गये हैं।
'नाद,' 'बिंदु' आदि संज्ञाएँ वज्रयानी सिद्धो में बराबर चलती रही हैं। गोरख
सिद्धांत में उनकी व्याख्या इस प्रकार की गई है—
नाथांशो नादो, नादांशः प्राणः।
शक्त्यंशो बिन्दु, बिन्दोरंशः शरीरम् ॥
गोरक्ष सिद्धांत संग्रह
( गोपीनाथ कविराज संपादित )
'नाद' और 'बिंदु' के योग से जगत् की उत्पत्ति सिद्ध और हठयोग दोनो
मानते थे।
१. 'जहाँ तक गोरख के आविर्भाव काल का सवाल है हम ज्ञानदेव की सूची का उल्टा
सीधा अर्थ लगा कर उन्हें १३ वीं सदी तक खींच लाने के पक्षपाती नहीं हैं। उपरि
लिखित 'रत्नाकर जोयम कथा' 'विमुक्त मंजरी' और 'गोरक्ष सिद्धांत संग्रह' जैसे
प्रामाणिक ग्रन्थो में—जो राहुलजी के अनुसार भूटान में रहने के कारण सदियो के
हेर-फेर से बचे रहे—सहसा अविश्वास भी नहीं किया जा सकता। इस तरह हमारा
दृढ़ विश्वास है कि गोरख दसवी शती के अंतिम चरण और ग्यारहवी के प्रारम्भ
के समसामयिक थे।'
'साहित्य संदेश' अंक १२, मार्च १६४५, पृ० ३६५।

४२ नामदेव की हिन्दी कविता
नाथ संप्रदाय जब फैला तब उसमें भी जनता की नीची और अशिक्षित श्रेणियों
के बहुत से लोग आए जो शास्त्र संपन्न न थे, जिनकी बुद्धि का विकास बहुत सामान्य
कोटि का था ।१
निर्गुण उपासना का विकास कैसे हुआ ?
मध्यकाल में उत्तरी भारत में बौद्ध तांत्रिकों का प्रभुत्व था२ इस भू-भाग के
कोने-कोने में बौद्ध तांत्रिकों की साधना फैली हुई थी । इन बौद्ध तांत्रिकों ने सामान्य
जनता को बहुत अधिक प्रभावित किया । निर्गुंणिया संत इसी सामान्य जनता से संबंधित
थे । यही कारण है कि उन पर बौद्ध तंत्रों का प्रभाव दिखाई देता है ।
मंत्रयान
बौद्ध तंत्र मतों का उदय महायान और उसकी शाखाओं एवं उपशाखाओं में
हुआ । यों तो तंत्र मत की हल्की झलक प्राचीन३ बौद्ध साहित्य में भी मिलती है किंतु
तंत्र मत का उदय महायान की मंत्रयान शाखा से स्पष्ट दिखाई दिया । इस मंत्रयान में
तंत्र, मंत्र तथा मुद्रा, मंडल आदि को विशेष महत्त्व दिया गया है ।४ इस संप्रदाय का
सबसे प्रथम ग्रन्थ ‘मंजुश्री मूल कल्प’ माना जा सकता है । इसका रचना काल प्रथम
या दूसरी शताब्दी ई० माना जाता है ।५
इससे स्पष्ट है कि मंत्रयान का उदय दूसरी शताब्दी के आसपास हो चला था ।
किंतु मंत्रों के गूढ़ रहस्यो का प्रचार साधारण जनता में न हो सका । परिणाम यह
हुआ कि मंत्रयान को अपनी वेशभूषा बदलनी पड़ी और उसे उन सामान्य जादू-टोना,
जंत्र मंत्र तथा यौनमूलक यौगिक साधना अपनानी पड़ी । इन लोगों ने इन पूर्व प्रच-
लित जादू टोने, यौनयोगिक प्रक्रियाओं आदि को बौद्धिक विचारधारा से अनुप्राणित
करके प्रस्तुत करने का प्रयास किया । मंत्रयान का यह नया रूप ही वज्रयान
कहलाया ।६
1 'The system of mystic culture introduced by Gorakhnath does
not seem to have spread widely through the educated classes.'
—गोपीनाथ कविराज और झा
( सरस्वती भवन स्टडीज )
2. Introduction to Budhist Esoterism, p 166.
३. बौद्ध दर्शन मीमांसा—डॉ० बलदेव उपाध्याय, पृ० ४२५ ।
4. Introduction to Tantrik Budhism : —Das Gupta. p 69.
५. साधना माला-भाग २ (भूमिका)
६. बौद्ध दर्शन मीमांसा —डॉ० बलदेव उपाध्याय, पृ० ४२८ ।

हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि ४३
वज्रयान मंत्रयान का विकसित और परिवर्धित रूप माना जाता है। वज्र का
अर्थ है शून्यता। वज्रयान में सब कुछ पूर्ण शून्य रूप माना जाता है। इस बात को डॉ०
एस० बी० दासगुप्ता ने अपने 'तांत्रिक बुद्धिज्म' में स्पष्ट किया है।
निर्गु णिया कवियों पर बौद्ध तांत्रिकों का ऋण
बौद्ध तांत्रिकों से संतों का सीधा संबंध था। यही कारण है कि वे लोग उनसे
बहुत अधिक प्रभावित हुए थे।१
वेदांत दर्शन की भांति बौद्ध तांत्रिक लोग तत्त्व को अनुभवगम्यता में ही विशेष
विश्वास करते थे। कोई आश्चर्य नही कि संतों को इस दिशा में भी प्रेरणा मिली हो।
उन्हो से प्रभावित होकर उन्होंने तर्क का विरोध और अनुभव का महत्त्व प्रतिपादित
किया है। यही नहीं उन्होंने बौद्ध तांत्रिकों के अनुकरण पर षट् शास्त्रादि की भी निंदा
की है। संत सुन्दरदास२ कहते हैं—
सुन्दर कहत षट शास्त्र माही भयो वाद ।
जाके अनुभव ज्ञान वाद में न बह्यो हैं···
संतों ने वेद शास्त्र की जी खोलकर निंदा की है। संत दरिया३ 'वेद कतेब' को
बंधन रूप मानते थे। कबीर ने कहा है—
वेद किताब कहो मत झूठा, झूठा जो न विचारे ।
संत मलूकदास४ ने तो यहाँ तक लिखा है कि वेद शास्त्र पढ़कर पंडित भी भ्रम
में पड़ गये हैं :—
वेद पढ़ पढ़ पंडित भूले ।
१. 'बौद्ध तांत्रिकों की तत्त्व की अनुभवगम्यता, धर्म ग्रन्थों की अमान्यता, तत्त्व का
वाच्यावाच्य परे होना, सहज तत्त्व की स्वरूप धारणा, सहजावस्था की धारणा,
शून्यवाद, अभिव्यक्ति विलक्षणता, नाद बिंदु साधना, कल्पनावाद, खण्डन-मण्डन की
प्रवृत्ति, साधनों में काम या राग का महत्त्व, काया शोधन, गुह्यवाद एवं योग साधना
आदि बातों ने संतों को पूरी पूरी प्रेरणा प्रदान की थी। उनकी बानियों पर इन
सब का प्रभाव परिलक्षित होता है।'
—'हिंदी की निर्गुण काव्यधारा और उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि' पृ० २६२ ।
२. संत बानी संग्रह, पृ० १११ ।
३. वेद कतेब दोई फंद रचिया पंधी जित संसार ।
—संत दरिया बिहार वाले के चुने हुए पद, पृ० ४५ ।
४. मलूकदास की बानी, पृ० ४ ।

४४ नामदेव की हिंदी कविता
सहजयान की सहज तत्त्व धारणा ने भी संतों को प्रभावित किया है। उसी के
सदृश वे भी सत्ता को सहज रूप में मानते हैं। दादू लिखते हैं—'मैंने परमात्मा का
सहज रूप देखा है। वह परम तेजमय है। उसमें मेरा मन सरलता से रम जाता है।'१
इसे संतों ने द्वैताद्वैत विलक्षण भी कहा है।२
बौद्ध तांत्रिकों के शून्यवाद का ऋण भी संतों पर है। वज्रयान में सब कुछ पूर्ण
शून्य रूप ही माना गया है। वज्रयान के इस सिद्धांत की व्यंजना करते हुए दादू ने
लिखा है कि चेतन जीव शून्य से आया और शून्य में ही लय होगा। अतः उसे उसी
शून्य का ध्यान करना चाहिए।३ सहजयान के चार शून्यों की धारणा भी संतों को
अपने ढंग पर मान्य थी। उनकी ओर संकेत करते हुए संत दादू लिखते हैं—तीन शून्य
तो नाम रूप से संबंधित हैं। चौथा शून्य ही निर्गुण रूप होने से सहज कहलाता है।
वह सर्वव्यापी है।४
तत्त्व के सहज और शून्य रूप होने के कारण ही संतों ने उसे अनिर्वचनीय और
वाच्यावाच्य परे कहा है। संत दादू कहते हैं, 'जो कुछ नहीं है अर्थात् सहज शून्य रूप
है वह अनिर्वचनीय है। उसको नाम रूप देकर वाणी के बंधन में बाँधकर लोग भ्रमित
हो रहे हैं।'५
बौद्ध तांत्रिकों का कल्पनावाद जो विज्ञानवाद का ही रूपांतर है, बहुत प्रसिद्ध
है। संतों के कल्पनावाद को इनके कल्पनावाद से प्रेरणा मिली होगी। संभवतः उसी के
१ अविनासी अंग तेज का, ऐसा तत्त्व अनूप।
सो हम देख्या नैन भरि सुंदर सहज स्वरूप ॥
परम तेज परगट भया तहँ मन रह्या समाइ।
दादू खेले पीव सौ नहिं आवै नहिं जाइ ॥
—दादू बानी भाग १, पृ० ५५।
२ निर्गुंन सगुन दुहुन ते न्यारा, सत स्वरूप ओहि विमल विचारा।
—द० सागर, पृ० ५४।
३ शून्य हि मारग आइया, शून्य हि मारग जाय।
चेतन गँवा सुरति का दादू रहु ल्यो लाय ॥
—'ने को अंग' सं० संत सुधासार, पृ० २८३।
४ तीन सून्य आकार की चौथा निर्गुंण नाम।
सहज शून्य में रमि रहा जहँ तह सब ठाम ॥
—दादू बानी, भाग १, पृ० २०।
५ कुछ नाही का नाव धर भरमा सब संसार।
—दादू बानी भाग १, पृ० १४८।

हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि ४५
प्रेरित होकर संत दरिया ने मन को कर्ता विष्णु रूप कहा है। १
संत सुन्दरदास ने कल्पनावाद के सिद्धांत की अभिव्यक्ति और अधिक स्पष्ट
शब्दों में की है। वे लिखते हैं 'मन के भ्रम से ही यह संसार उत्पन्न होता है और उस
भ्रम से निरावृत हो जाने पर उसका लय हो जाता है। २
बौद्ध तांत्रिकों की खंडन-मंडन की प्रवृत्ति ने संतों को प्रतिक्रियात्मक प्रेरणा
प्रदान की थी। सम्भवतः उन्हीं से प्रेरित होकर उन्होंने समस्त मिथ्याचारों और आडंबरों
का डटकर विरोध किया है। उदाहरण के लिये हम मूर्तिपूजा का खंडन ले सकते हैं।
संत दादू लिखते हैं—'जो लोग कंकड़ पत्थर की सेवा करते हैं वे अपना मूल भी गंवा
बैठते हैं। ३
काया शोधन बौद्ध तांत्रिकों की साधना का प्राण-भूत सिद्धांत है। संत दरिया
ने स्पष्ट लिखा है कि अविगत ज्योति के दर्शन तभी होते हैं जब साधक काया शोधन
में सफल होता है। ४
संतों के गुह्यवाद को बौद्ध तांत्रिकों से प्रेरणा मिली होगी। सद्गुरु के मिलने से
ही भुक्ति और मुक्ति प्राप्त होती है। ५
बौद्ध तंत्रों में काम या राग के सदुपयोग पर विशेष बल दिया गया है। उनकी
धारणा है कि काम को यदि रहस्य पर प्रेरित कर दिया जाय तो वही मुक्ति प्राप्त कर
सकता है। काम साधना से मुक्ति और भुक्ति दोनों की प्राप्ति होती है। संत इस सिद्धांत
से भी पूर्णतया परिचित थे। संत मलूकदास ने एक स्थल पर इसी सिद्धांत की व्यंजना
करते हुए लिखा है :—
१. यह मन कर्ता विस्नु रूप कहावै । —दरिया सागर, पृ० ६१ ।
२. मन ही के भ्रम ते जगत यह देखियत
मन ही के भ्रम गये जगत यह बिलात है।
—सुन्दर विलास, पृ० १२२ ।
३. जिनि कंकड पत्थर सेविया सो अपना मूल गवांई ।
—दादू बानी, भाग १, पृ० १४७ ।
४. काया परचे मूल जब पावै, अविगत ज्योति दृष्टि में आवै ॥
—दरिया सागर, पृ० १४० ।
५. सद्गुरू मिले तो पाइये,
भुगुति मुकति भंडार ।
—दादू बानी भाग १, पृ० ६ ।

'काम राम से मिला सकता है, यदि इस पर विजय प्राप्त करके उसका सत्पथ
पर नियोजन किया जाय ।'¹
बौद्ध तांत्रिकों ने साधना के क्षेत्र में नाद, बिंदु और योग की साधनाओं को
महत्त्व दिया है । संतों की साधना के भी ये प्रतिष्ठित तत्त्व थे । इससे प्रकट होता है कि
वे लोग बौद्ध तांत्रिकों से इस दृष्टि से भी प्रभावित हुए हैं ।
बौद्ध तांत्रिकों ने सिद्धांतों की गुह्यता पर हिंदू तांत्रिकों के सदृश ही बल दिया
है । अपने सिद्धांतों को गुह्य बनाने की कामना से ही उन्हें अपनी अभिव्यक्ति प्रतीकात्मक
बनानी पड़ी है । उनकी अभिव्यक्ति शैली से संत लोग अनेकधा प्रभावित हुए थे । सच
तो यह है कि संतों की अभिव्यक्ति में प्राण प्रदान करने का श्रेय बौद्ध तांत्रिकों को ही
है । कहीं कहीं तो उन्होंने उनके शब्दों यहाँ तक कि वाक्यों तक को दोहराया है ।²
सरहपा की भी इसी प्रकार की एक साखी है ।³
उपर्युक्त साखियों से एक बात और स्पष्ट प्रकट होती है कि संत लोग सिद्धों की
रहस्य साधना से भी बहुत अधिक प्रभावित हुए थे । सच तो यह है कि संतों का रहस्य-
वाद सिद्धों के रहस्यवाद का ही अभिनव रूपांतर है, जिसके प्रधान स्तंभ उपनिषद् और
सूफ़ी मत हैं । इस प्रकार हम देखते हैं कि संतों पर बौद्ध तांत्रिकों का भी बहुत बड़ा
प्रभाव है ।

हिंदी काव्य तथा नाथ संप्रदाय

मध्यकालीन धर्म साधनाओं में नाथ पंथ बहुत महत्त्वपूर्ण है । इस पंथ के मूल
प्रवर्तक आदिनाथ या भगवान शिव माने जाते हैं ।⁴ मध्ययुग में इसे प्राण प्रदान करने
का श्रेय गोरखनाथ और उनके गुरु मत्स्येंद्रनाथ को है । मध्ययुग में यह मत विविध
नामों से प्रसिद्ध था, जिनमें सिद्ध मत, योग मार्ग, योग संप्रदाय, अवधूत संप्रदाय,
१. काम मिलावे राम से जो राखे यह जीत ।
दास मलूका यों कहै जो आवै प्रतीत ॥
—मलूकदास की बानी, पृ० ४० ।
२ जिहि वन सिंह न संचरै चील उडै नहि जाय ।
रैन दिवसा का गम नहीं तहाँ कबीर रहा ल्यो लाय ॥
३ जहि मन पवन न संचरै रवि ससि नहिं प्रवेश ।
तहि वट चित्त विसास करुन सरहे कहिअ उवेस ॥
—'हिंदी साहित्य की भूमिका'—डा० हजारी प्रसाद द्विवेदी, पृ०३६ से उद्धृत ।
४. नाथ संप्रदाय, डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृ० १ ।

हिंदी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि ४७
गोरखनाथी संप्रदाय, मत्स्येंद्रनाथी संप्रदाय आदि नाम बहुत प्रसिद्ध हैं। इस मत के
अनुयायी योगी, कनफटा, दर्शनी आदि नामों से पुकारे जाते हैं।१
नाथ पंथ के इतिहास में मत्स्येंद्रनाथ और गोरखनाथ के नाम सबसे अधिक
प्रसिद्ध हैं। इसका कारण यह है कि दोनों ही नाथ पंथ की दो भिन्न-भिन्न धाराओं के
प्रवर्तक थे। प्रोफेसर बाग्ची२ का मत है कि मत्स्येंद्र ने योगिनी कौल मार्ग नामक
नाथ पंथी धारा का प्रवर्तन किया था। गोरखनाथ ने नाथ पंथ में हठयोग को विशेष
महत्व दिया था। इसीलिए उनका साधना मार्ग गोरखनाथी हठयोग के नाम से प्रसिद्ध
है। आजकल गोरखनाथ के मत को ही सामान्यतः नाथ पंथ के नाम से अभिहित
किया जाता है। निर्गुणिया संतों को नाथ पंथ की उपर्युक्त दोनों ही धाराओं ने प्रभा-
वित किया था। इन दोनों आधारशिलाओं पर ही संत मत का भवन खड़ा हुआ है।
मत्स्येंद्रनाथ ने संत मत के लिये पूरी पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी। यदि हम
दोनों मतों की तुलना करें तो हमें निश्चय हो जायगा कि निर्गुण काव्यधारा की सच्ची
पृष्ठभूमि मत्स्येंद्रनाथ का योगिनी कौल मार्ग ही है। उसकी दार्शनिक विचारधारा,
उसका साधना क्रम और उसके पारिभाषिक शब्द संत कवियों में ज्यो के त्यो उपलब्ध
होते हैं।
नाथ शब्द की व्याख्या के संबंध में विद्वानों में मतभेद है। डॉ० गोविंद त्रिगुणा-
यत के अनुसार यह संप्रदाय स्वतंत्र रूप से विकसित हुआ था। हिंदू, शैव, शाक्त तंत्रों,
बौद्ध तंत्रों, शैव दर्शन और योग साधना आदि विविध धर्म और साधना पद्धतियों ने
मिलकर इसकी प्राण प्रतिष्ठा की थी। दूसरे शब्दों में हम यों कह सकते हैं कि नाथ
संप्रदाय मध्यकाल की सामान्य जनता में प्रचलित सभी साधना और धर्म पद्धतियों का
एक अभिनव समन्वित स्वरूप है। अपने समय की समस्त विचार धाराओं और साधनाओं
के सुंदर तत्त्वों को स्वायत्त करने की प्रवृत्ति निर्गुण संप्रदाय में भी थी। डॉ० गोविंद
त्रिगुणायत नाथपंथ तथा निर्गुण संप्रदाय का घनिष्ठ संबंध बताते हैं।३
१. गोरखनाथ एण्ड दी कनफटा योगीज —ब्रिग्स, पृ० १ (१९३८)।
२. कौल ज्ञान निर्णय—डॉ० प्रबोधचंद्र बागची संपादित भूमिका, पृ० ३५।
३. 'यही कारण है कि निर्गुण संप्रदाय की प्रवृत्ति साम्य के कारण नाथ पंथ के अत्य-
धिक समीप है। हमारी अपनी दृढ़ धारणा है कि नाथपंथ और निर्गुण संप्रदाय में
पिता-पुत्र का संबंध है। नाथ संप्रदाय को अच्छी तरह से समझे बिना संतों का
निर्गुण संप्रदाय किसी प्रकार भी समझा नहीं जा सकता।'
—हिन्दी की निर्गुण काव्यधारा और उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि, पृ० २६७।

४८ नामदेव की हिंदी कविता
निर्गुण काव्यधारा पर मत्स्येंद्रनाथी धारा के प्रभाव
संतो को नाथ पथ की मत्स्येंद्रनाथी धारा से पर्याप्त प्रेरणा मिली थी। उनको
इन साधनाओ को एक क्रमबद्ध परंपरा प्राप्त हुई थी। मत्स्येंद्र नाथ के अनुकरण पर
ही संतो ने उनमनी अवस्था, सहजावस्था आदि के वर्णन भी किये है। उनमनी अवस्था
का वर्णन करते हुए दादू लिखते है कि उनमनी अवस्था ही सहजावस्था होती है। वह
परमात्मा ही सहज स्वरूप, सर्वव्यापी और तेज रूपी है। १
मत्स्येंद्रनाथियो की मन की साधना को संतो ने अपना प्रमुख सिद्धांत अभि-
व्यंजित किया है। संत दरिया साहब लिखते है कि मन के कारण ही संसार भ्रम में
फंसा हुआ है। जो मन के रहस्य को जान लेता है वह बुद्धिमान है। २
दादू ने भी लिखा है—मन कालुष्य को जन्म देने वाला है। वही कालुष्य का
प्रक्षालन कर सकता है अतः उसी की साधना करनी चाहिए। ३
अपने पूर्ववर्ती तांत्रिक साधको की भाँति मत्स्येंद्रनाथी साधक लोग भी बाह्या-
चारों के विरुद्ध थे। संतों ने उसी परंपरा का अनुकरण किया था। मत्स्येंद्रनाथी
से निरंजन योगिया की परंपरा मिली थी उन्हीं के अनुकरण पर संतो ने निरंजन
योगियो का वर्णन किया है। जिस प्रकार मत्स्येंद्रनाथी साधक भावात्मक पूजा और
साधना को महत्व देते थे उसी प्रकार संत लोगो ने भी साधना के क्षेत्र में सभी प्रकार
के साधको और साधनाओ का मानसीकरण किया है। निरंजन योगियो के स्वरूप
निर्देश से उपर्युक्त दोनो बातें स्पष्ट हो जायेंगी। ४

१ न घर भला न बन भला जहां नही निज नांव।
दादू उनमनि मन रहे भला न सोई ठाँव ॥
—दादू बानी भाग १, पृ० २४।
२ मन पीछे सब जगत भुलाना। मन चीन्हे सो चतुर सुजाना ॥
—दरिया सागर, पृ० ३०।
३ मन ही सो मल उपजै मन ही सो मल धोई
दादू बानी भाग १, पृ० ११४।
४ जोगिया बैरागी बाबा, रहे अकेला उनमनि लागा।
आत्मा जोगी धीरज गया, निहचल आसन अगम पथा ॥
सहजे मुद्रा अनल अधारो अनहद सींगी रहणि हमारी।
काया बनखण्ड पायो चेला ज्ञान गुफा में रहे अकेला ॥
दादू दरसन करन जागे निरंजन नगरी भिक्षा मांगे।
—दादू बानी भाग २, पृ० ६८।

हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि ४६
नि.संदेह संत मत मत्स्येंद्रनाथी विचारधारा से प्रभावित है।
निर्गुण काव्यधारा पर गोरखनाथी धारा का प्रभाव
संतों का नाथ पंथियों से सीधा संबंध है। उनकी विचारधारा पर नाथों का
अक्षुण्ण प्रभाव पड़ा है। संत मत की प्रत्येक प्रवृत्ति नाथ पंथी प्रवृत्ति की अनुगामिनी
है। अंतर केवल इतना है कि संतों की विचारधारा अन्य दर्शनों से भी प्रभावित है
जिससे उसका स्वरूप नाथ पंथ से विलक्षण लगने लगा है।
नाथ पंथ के अध्यात्म पक्ष का पूरा-पूरा प्रभाव संतों पर दिखाई देता है। नाथ
पंथी ब्रह्म द्वैताद्वैत विलक्षण मानते थे। उन्हीं के अनुकरण पर संतों ने भी बहुत से
स्थलों पर ब्रह्म को द्वैताद्वैत विलक्षण कहा है। संत दरिया साहब ने लिखा है—
'वह परमात्मा सगुण निर्गुण दोनों से विलक्षण निर्मल सत् स्वरूप है।'१
नाथ पंथी मन को शून्य में लीन करने को ही मुक्ति मानते हैं। उन्हों का
अनुकरण करते हुए संतों ने भी शून्य में मन के लय को ही मुक्ति ध्वनित किया है।
संत दादू लिखते हैं—'चेतन जीव शून्य से उत्पन्न होता है और अंत में मुक्ति प्राप्त करने
पर उसी में लीन हो जाता है।'२
संतों की हठयोग साधना नाथपंथी साधना का ही रूपांतर है। नाथ पंथियों की
ही भाँति संत लोग गुरु को महत्त्व देते थे। गुरु के महत्त्व की ओर संकेत करते हुए
दयाबाई ने लिखा है—'गुरु देवाधिदेव ब्रह्म-रूप होता है। उसका गौरव और रहस्य
सरलता से नहीं समझा जा सकता।'३
नाथ पंथियों की मन साधना का सिद्धांत संतों को बहुत प्रिय था। उन्हों के
ढंग पर उन्होंने सर्वत्र मन के महत्त्व और उसके परिष्कार पर बल दिया है। संत
१. निर्गुण सगुन दुहुन तें न्यारा ।
सत स्वरूप होहि विमल सुधारा ॥
—दरिया सागर, पृ० १४।
२. सून्यहि मारग आइया सून्यहि मारग जाय ।
चेतन पैडा सुरति जहं दादू रह्यो लो लाय ॥
—संत सुधासार, पृ० ४६६ ।
३. गुरु है देवन के देवा, गुरु को कोऊ नहिं जानत भेदा ।
सद्गुरु ब्रह्म स्वरूप है मनुष भाव मत आन ॥
—दयाबाई की बानी, पृ० २ ।
४

५० नामदेव की हिन्दी कविता
दरिया ने लिखा है¹ 'मन के पीछे सारा जगत् भ्रमित है, जो मन के रहस्य को समझ
लेता है वही बुद्धिमान है।' एक अन्य स्थान पर उन्होंने फिर लिखा है²—'मन ही
नियम और आचारों का पालन कराता है और मन ही मन को पूजा चढ़ाता है।'
इस प्रकार संतों ने मन के महत्त्व और उसके पवित्रीकरण का उपदेश दिया है।
संतों पर नाथ पंथी भाषा और अभिव्यक्ति का भी बड़ा व्यापक प्रभाव पड़ा है।
कबीर आदि संत तो उससे इतना अधिक प्रभावित हुए कि कहीं-कहीं पर उन्होंने शब्द,
वाक्यांश, वाक्य यहाँ तक कि पूरे पद पुनरुद्धृत किये हैं। यह साख गोरख और कबीर
में समान रूप से पाई जाती है।³
संतों की पारिभाषिक शब्दावली लगभग पच्चीस प्रतिशत नाथ पंथियों से ही ली
गई है। संतों के किसी शब्द का अर्थ यदि समझ में न आये तो उसकी खोज सबसे
पहले नाथ पंथी साहित्य में करनी चाहिये।
संत लोग नाथ पंथी योगियों के स्वरूप से भी पूर्णतया परिचित थे। कबीर आदि
संतों ने उस स्वरूप का वर्णन विविध पंथों के साधुओं के वेषाडम्बर की आलोचना के
प्रसंग में किया है। कबीर ने नाथ पंथी साधु के वेषाडम्बर के प्रति उपेक्षा भाव प्रकट
किया है।⁴
सच तो यह है कि नाथ संप्रदाय का पूरा ज्ञान हुए बिना निर्गुण विचारधारा
को समझना यदि असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य ही है।
इन विवरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि निर्गुण काव्यधारा का प्रारम्भ बौद्ध
तन्त्र तथा उनकी अनेक शाखाओं के द्वारा पाँचवीं-छठवीं शताब्दी से ही हो गया था।
तान्त्रिकों की ये रचनाएँ संस्कृत में हैं। आगे चलकर दसवीं शताब्दी के आस पास देशी

१. मन के पीछे सब जगत् भुलाना, मन चीन्हे सो चतुर सुजाना।
—दरिया सागर, पृ० ६।
२. मन ही नेम अचार करावे, मन ही मन के पूजा चढ़ावे।
—दरिया सागर, पृ० ३०।
३. यहु मन सक्ती, यहु मन सीव, यहु मन पाँच तत्व को जीव।
यहु मन ले उन्मनि रहै तो तीन लोक की बाता कहै ॥
—गोरख बानी संग्रह, पृ० १८ तथा संत कबीर, पृ० ८२।
४. बाबा जोगी एक अकेला जाके तीरथ बरत न मेला।
झोली पत्र विभूतिन बटुआ अनहद बेन बजावे ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० १५८।

५१
भाषा में रचनाएँ होने लगी। सिद्धो और नाथो की ऐसी रचनाएँ पर्याप्त मात्रा में पाई
जाती है। निगुंण काव्य के रचयिता नाथ और सिद्ध पूरे भारत में फैले हुए थे। इस
प्रकार निगुंण काव्य की धारा का प्रवाह नामदेव के पूर्व से चला आ रहा था और
नामदेव ने इसको वही से ग्रहण किया। जिस धारा के नाथ और सिद्ध कवि अपनी
रचनाओ से समाज में प्रसिद्धि प्राप्त कर रहे थे उसी धारा को अपनाकर अपनी वाणी
द्वारा समाज को जाग्रत करना नामदेव को अधिक उपयुक्त जान पड़ा। इसलिए उन्होंने
तत्कालीन स्थितियो को ध्यान में रखते हुए अपने हिन्दी पदो की रचना की।
☐ ☐

द्वितीय अध्याय
संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ
चरित्र विषयक सामग्री—कई नामदेव
हिंदी में रचना करने वाले नामदेव ज्ञानेश्वरकालीन
महाराष्ट्रीय संत नामदेव हैं अथवा कोई अन्य ?
जन्म काल
नामदेव का अयोनि—संभव होना
नामदेव चरित्र के प्राचीन स्रोत—गाथा
ज्ञानेश्वर और नामदेव का समकालीनत्व
डॉ० रा० गो० भांडारकर का मत
डॉ० मोहनसिंह का मत—मेकालिफ का मत
जनम साखी
महाराष्ट्रीय विद्वानों के मत
हिंदी के विद्वानों के मत—निष्कर्ष
जन्म स्थान
हिंदी तथा मराठी के विद्वानों के मत
माता पिता एवं परिवार, जाति तथा व्यवसाय
क्या बालभक्त नामदेव डाकू थे ?—गुरु, नामदेव की यात्राएं
नामदेव की समाधि—नामदेव का व्यक्तित्व
रचनाएँ—मराठी गाथा की प्रतियां
मराठी अभंगों का वर्गीकरण
हिंदी रचनाएँ
हिंदी की रचनाओं का विषयानुसार विभाजन

संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ
संतो के वैयक्तिक जीवन और उनकी काव्य रचना का घनिष्ठ सम्बन्ध है ।
उनके लिए परमार्थ साधना ही जीवन का आदर्श था और काव्य रचना इस साधना
का आविष्कार । उनका साहित्य व्यक्तिनिष्ठ है अथवा विषयनिष्ठ, इस विषय पर वाद-
विवाद की गुंजाइश ही नही है क्योकि संतों के भाव-जीवन तथा उनकी काव्य सृष्टि में
अधिकांश में एकरूपता है । इसीलिए उनके भाव जगत् और इहलोक के चरित्र में
अन्तर नही खोजा जा सकता । फिर भी उनके जीवन कार्य तथा उनके काव्य का
अन्वयार्थ लगाने के पहले उनका जीवन परिचय प्राप्त कर लेना आवश्यक हो जाता है ।
नामदेव ने अपनी आत्मकथा भी लिखी है । उनके आत्म-चरित्र-परक अभंगों
की सहायता से हम उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं का ढाँचा खड़ा कर सकते हैं
यद्यपि इसमें भी अनेक कठिनाइयाँ हैं । इन आत्म-चरित्र-परक अभंगों में कई प्रक्षिप्त हैं
तथा बहुत से अभंगों में पाठभेद भी पाया जाता है । इन अभंगों की प्रामाणिकता में
भी सन्देह है क्योकि स्वयं नामदेव के हाथ की लिखी अधिकृत गाथा अभी तक किसी
को भी प्राप्त नही हुई है ।
नामदेव के समकालीन संतो ने उनका जो परिचय दिया है उसको कहाँ तक
ग्राह्य अथवा अग्राह्य समझा जाय यह भी एक समस्या है । डॉ० भांडारकर, पं० पांडुरंग
शर्मा, श्री भिंगारकर बुवा, श्री आजगावकर, प्रो० प्रियोलकर, डॉ० वि० भि० कोलते,
प्राचार्य दांडेकर आदि अनुसंधान-कर्ताओं ने नामदेव-चरित्र की चर्चा की है । इस प्रकार
की सामग्री विपुल है । परन्तु कहा नहीं जा सकता कि इस सामग्री से उनका संपूर्ण
तथा विश्वसनीय चरित्र उपलब्ध होगा ही । नामदेव के चरित्र के इन अध्येताओं द्वारा
दी गई जानकारी कही अधूरी है तो कही सदोष । कुछ स्थलों पर तो उसकी पुनरुक्ति
भी हुई है । इन कारणों से नामदेव की विस्तृत तथा विश्वासार्ह जीवनी का अभाव
बहुत खटकता है । अतः नामदेव विषयक उपलब्ध सभी सामग्री का अध्ययन और
विश्लेषण कर उनका जीवन चरित्र प्रस्तुत करने का प्रयत्न यहाँ किया गया है ।
अब प्रश्न यह है कि हिंदी में रचना करने वाले नामदेव ज्ञानेश्वर कालीन

५६ नामदेव की हिन्दी कविता
महाराष्ट्रीय सत नामदेव हे अथवा कोई अन्य ? आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने अपनी
"उत्तरी भारत की सत परपरा" में कई नामदेवो का उल्लेख किया है। ध्यान देने की
बात यह है कि "नामदेव" नाम के चार या पाँच तो महाराष्ट्रीय संत थे। उत्तरी
भारत में भी दो से अधिक नामदेव नामधारी संतो का किसी न किसी समय वर्तमान
होना कहा गया है। अत संत नामदेव—जिनके पद "गुरु ग्रंथ साहिब" में संग्रहीत है—
के विषय में निश्चित रूप से कुछ कहना अथवा उनकी जीवनी तथा रचनाओ का
प्रामाणिक परिचय देना सदेह से रहित नही कहा जा सकता ।
यहाँ उन संतो और कवियो का परिचय देना आवश्यक है जो नामदेव के नाम
से प्रसिद्ध हैं।
(१) ज्ञानेश्वर के समकालीन नामदेव
इनका उल्लेख निवृत्तिनाथ के अभंगो में आता है। अन्य नामदेवो की अपेक्षा
इनकी रचनाएँ बहुत ही सरस एवं भावुकतापूर्ण है। कुछ अभंगो में ये अपने नाम का
उल्लेख केवल "नामा" शब्द से करते है। कुछ अभंगो में "केशवाचा नामा" (केशव
का नामा) तथा विष्णुदास नामा आदि मुद्राओं द्वारा ये अपना परिचय देते हैं।
(२) विष्णुदास नामा
नामदेव के मराठी अभंगो तथा हिंदी पदो में विष्णुदास नामा का नाम बार-
बार आया है। उनका काल सन् १५८०-१६३३ ई० के मध्य का है। उनकी प्रामाणिक
रचना "शुकाख्यान" है जिसकी अतिम ओवी में उसका रचनाकाल इस प्रकार दिया
है। "शालिवाहन शक के मन्मथनाम संवत्सर को पौष्य अमावस्या सोमवार को, ग्रथ
पूर्ण हुआ, श्रोता गण सावधान होकर उसका श्रवण करें।"१ यह काल शालिवाहन शक
का १५१७ है और नामदेव का प्रयाण काल शक १२७२ है। दोनों के काल में लगभग
ढाई सौ वर्ष का अंतर है। अत विष्णुदास नामा सत नामदेव से निश्चित ही भिन्न हैं।
श्रीमती सरोजिनी शेंडे ने अपने शोध प्रबन्ध में २ विष्णुदास नामा सबंधी सभी
१. उत्तरी भारत की सत परपरा पृ० १०५
१. मन्मथ नाम सवत्सरे पौष्य मासीं ।
सोमवार अमावास्येच्या दिवशीं ।
पूर्णता आली प्रयासी ।
श्रोते सावकासो परिसोजे ।
—सकल संत गाथा, अभंग २२५३
२. विष्णुदास नाम्याच्या महाभारताचा विवेचनात्मक अभ्यास
— (अप्रकाशित प्रबंध) मुंबई विद्यापीठ ग्रंथालय, १९६०

संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ५७
बातें विस्तार के साथ लिखी हैं। उन्होंने "कमलाकर संताचे आख्यान" का एक अभंग
प्रस्तुत किया है जिसमें विष्णुदास नामा ने अपने पूर्ववर्ती संतों के साथ नामदेव का भी
नाम दिया है।¹ इससे इतना तो स्पष्ट हो ही जाता है कि नामदेव और विष्णुदास
नामा दो भिन्न व्यक्ति हैं। परन्तु यह संभव है कि नामदेव ने अपने अभंगों में "विष्णु
दास नामा" की मुद्रा लगाई हो ।
विष्णुदास नामा की 'बावन अक्षरी' की एक प्रति इतिहासाचार्य राजवाडे को
मिली थी जिसमें स्वयं विष्णुदास नामा ने नामदेव की वंदना की है। 'नामदेव के
पवित्र नाम के उच्चारण से वह हरि-हर का भक्त हो जाता है क्योंकि गोविंद को नाम
प्रिय है।'२
श्री पांगारकर के अनुसार विष्णुदास नामा जाति का ब्राह्मण न होकर 'शिंपी'
(दर्जी) था। इसके लिए वे उन्हीं की रचना से उदाहरण देते हैं। विष्णुदास नामा का
कथन है—तुलसी का पौधा यदि अपवित्र भूमिपर उगा हो उसे अपवित्र न समझा
जाय। विष्णुदास नामा विट्ठल के भजन में तल्लीन हो गया, उसे शिंपी (दर्जी) न
कहा जाय।³ श्री पांगारकर विष्णुदास नामा को संत एकनाथ का समकालीन तथा
मुक्तेश्वर का पूर्ववर्ती बताते हैं। 'ओवी' उसका प्रिय छंद है।
इसके अतिरिक्त विष्णुदास नामा की रचनाओं में आचार धर्म पर अधिक बल
दिया गया है। उनकी कुछ रचनाएँ कूट समस्यात्मक भी हैं। विष्णुदास नामा अधिक-
१. कोण्ही एके अवसरी । सकल संत मिलोनी अवधारी ।
कीर्तन करितां गजरी । पंढरपुरा चालिले ॥
ज्ञानदेव सोपानदेव । चांगा मुक्ताई नामदेव
कबीर रोहिदास भक्त राय । ब्रह्मानंदे चालले ॥
—विष्णुदास नामा कृत महाभारत (कमलाकर संताचे आख्यान), मुंबई
मराठी ग्रंथ संग्रहालय
२. नामदेवाचे पवित्र । नाम उच्चरिता अखंडित ।
नामें होय हरि हर भक्त । नाम प्रिय गोविंदा ॥
—मराठी वाङ्मयाचा इतिहास (खंड पहिला) पृ० ५५४
३. अमंगळु भूमीसी उगवल्या तुलसी । अपवित्र तयासी म्हणो नये ।
विष्णुदास नामा विट्ठली मिळाला । शिंपी शिंपी त्याला म्हण नये ।
—मराठी वाङ्मयाचा इतिहास (खंड दूसरा) पृ० ५७८