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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 332 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 44

हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि ४५
प्रेरित होकर संत दरिया ने मन को कर्ता विष्णु रूप कहा है। १
संत सुन्दरदास ने कल्पनावाद के सिद्धांत की अभिव्यक्ति और अधिक स्पष्ट
शब्दों में की है। वे लिखते हैं 'मन के भ्रम से ही यह संसार उत्पन्न होता है और उस
भ्रम से निरावृत हो जाने पर उसका लय हो जाता है। २
बौद्ध तांत्रिकों की खंडन-मंडन की प्रवृत्ति ने संतों को प्रतिक्रियात्मक प्रेरणा
प्रदान की थी। सम्भवतः उन्हीं से प्रेरित होकर उन्होंने समस्त मिथ्याचारों और आडंबरों
का डटकर विरोध किया है। उदाहरण के लिये हम मूर्तिपूजा का खंडन ले सकते हैं।
संत दादू लिखते हैं—'जो लोग कंकड़ पत्थर की सेवा करते हैं वे अपना मूल भी गंवा
बैठते हैं। ३
काया शोधन बौद्ध तांत्रिकों की साधना का प्राण-भूत सिद्धांत है। संत दरिया
ने स्पष्ट लिखा है कि अविगत ज्योति के दर्शन तभी होते हैं जब साधक काया शोधन
में सफल होता है। ४
संतों के गुह्यवाद को बौद्ध तांत्रिकों से प्रेरणा मिली होगी। सद्गुरु के मिलने से
ही भुक्ति और मुक्ति प्राप्त होती है। ५
बौद्ध तंत्रों में काम या राग के सदुपयोग पर विशेष बल दिया गया है। उनकी
धारणा है कि काम को यदि रहस्य पर प्रेरित कर दिया जाय तो वही मुक्ति प्राप्त कर
सकता है। काम साधना से मुक्ति और भुक्ति दोनों की प्राप्ति होती है। संत इस सिद्धांत
से भी पूर्णतया परिचित थे। संत मलूकदास ने एक स्थल पर इसी सिद्धांत की व्यंजना
करते हुए लिखा है :—
१. यह मन कर्ता विस्नु रूप कहावै । —दरिया सागर, पृ० ६१ ।
२. मन ही के भ्रम ते जगत यह देखियत
मन ही के भ्रम गये जगत यह बिलात है।
—सुन्दर विलास, पृ० १२२ ।
३. जिनि कंकड पत्थर सेविया सो अपना मूल गवांई ।
—दादू बानी, भाग १, पृ० १४७ ।
४. काया परचे मूल जब पावै, अविगत ज्योति दृष्टि में आवै ॥
—दरिया सागर, पृ० १४० ।
५. सद्गुरू मिले तो पाइये,
भुगुति मुकति भंडार ।
—दादू बानी भाग १, पृ० ६ ।