सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि ४६
नि.संदेह संत मत मत्स्येंद्रनाथी विचारधारा से प्रभावित है।
निर्गुण काव्यधारा पर गोरखनाथी धारा का प्रभाव
संतों का नाथ पंथियों से सीधा संबंध है। उनकी विचारधारा पर नाथों का
अक्षुण्ण प्रभाव पड़ा है। संत मत की प्रत्येक प्रवृत्ति नाथ पंथी प्रवृत्ति की अनुगामिनी
है। अंतर केवल इतना है कि संतों की विचारधारा अन्य दर्शनों से भी प्रभावित है
जिससे उसका स्वरूप नाथ पंथ से विलक्षण लगने लगा है।
नाथ पंथ के अध्यात्म पक्ष का पूरा-पूरा प्रभाव संतों पर दिखाई देता है। नाथ
पंथी ब्रह्म द्वैताद्वैत विलक्षण मानते थे। उन्हीं के अनुकरण पर संतों ने भी बहुत से
स्थलों पर ब्रह्म को द्वैताद्वैत विलक्षण कहा है। संत दरिया साहब ने लिखा है—
'वह परमात्मा सगुण निर्गुण दोनों से विलक्षण निर्मल सत् स्वरूप है।'१
नाथ पंथी मन को शून्य में लीन करने को ही मुक्ति मानते हैं। उन्हों का
अनुकरण करते हुए संतों ने भी शून्य में मन के लय को ही मुक्ति ध्वनित किया है।
संत दादू लिखते हैं—'चेतन जीव शून्य से उत्पन्न होता है और अंत में मुक्ति प्राप्त करने
पर उसी में लीन हो जाता है।'२
संतों की हठयोग साधना नाथपंथी साधना का ही रूपांतर है। नाथ पंथियों की
ही भाँति संत लोग गुरु को महत्त्व देते थे। गुरु के महत्त्व की ओर संकेत करते हुए
दयाबाई ने लिखा है—'गुरु देवाधिदेव ब्रह्म-रूप होता है। उसका गौरव और रहस्य
सरलता से नहीं समझा जा सकता।'३
नाथ पंथियों की मन साधना का सिद्धांत संतों को बहुत प्रिय था। उन्हों के
ढंग पर उन्होंने सर्वत्र मन के महत्त्व और उसके परिष्कार पर बल दिया है। संत
१. निर्गुण सगुन दुहुन तें न्यारा ।
सत स्वरूप होहि विमल सुधारा ॥
—दरिया सागर, पृ० १४।
२. सून्यहि मारग आइया सून्यहि मारग जाय ।
चेतन पैडा सुरति जहं दादू रह्यो लो लाय ॥
—संत सुधासार, पृ० ४६६ ।
३. गुरु है देवन के देवा, गुरु को कोऊ नहिं जानत भेदा ।
सद्गुरु ब्रह्म स्वरूप है मनुष भाव मत आन ॥
—दयाबाई की बानी, पृ० २ ।
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