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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 332 में से

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पृष्ठ 45

'काम राम से मिला सकता है, यदि इस पर विजय प्राप्त करके उसका सत्पथ
पर नियोजन किया जाय ।'¹
बौद्ध तांत्रिकों ने साधना के क्षेत्र में नाद, बिंदु और योग की साधनाओं को
महत्त्व दिया है । संतों की साधना के भी ये प्रतिष्ठित तत्त्व थे । इससे प्रकट होता है कि
वे लोग बौद्ध तांत्रिकों से इस दृष्टि से भी प्रभावित हुए हैं ।
बौद्ध तांत्रिकों ने सिद्धांतों की गुह्यता पर हिंदू तांत्रिकों के सदृश ही बल दिया
है । अपने सिद्धांतों को गुह्य बनाने की कामना से ही उन्हें अपनी अभिव्यक्ति प्रतीकात्मक
बनानी पड़ी है । उनकी अभिव्यक्ति शैली से संत लोग अनेकधा प्रभावित हुए थे । सच
तो यह है कि संतों की अभिव्यक्ति में प्राण प्रदान करने का श्रेय बौद्ध तांत्रिकों को ही
है । कहीं कहीं तो उन्होंने उनके शब्दों यहाँ तक कि वाक्यों तक को दोहराया है ।²
सरहपा की भी इसी प्रकार की एक साखी है ।³
उपर्युक्त साखियों से एक बात और स्पष्ट प्रकट होती है कि संत लोग सिद्धों की
रहस्य साधना से भी बहुत अधिक प्रभावित हुए थे । सच तो यह है कि संतों का रहस्य-
वाद सिद्धों के रहस्यवाद का ही अभिनव रूपांतर है, जिसके प्रधान स्तंभ उपनिषद् और
सूफ़ी मत हैं । इस प्रकार हम देखते हैं कि संतों पर बौद्ध तांत्रिकों का भी बहुत बड़ा
प्रभाव है ।

हिंदी काव्य तथा नाथ संप्रदाय

मध्यकालीन धर्म साधनाओं में नाथ पंथ बहुत महत्त्वपूर्ण है । इस पंथ के मूल
प्रवर्तक आदिनाथ या भगवान शिव माने जाते हैं ।⁴ मध्ययुग में इसे प्राण प्रदान करने
का श्रेय गोरखनाथ और उनके गुरु मत्स्येंद्रनाथ को है । मध्ययुग में यह मत विविध
नामों से प्रसिद्ध था, जिनमें सिद्ध मत, योग मार्ग, योग संप्रदाय, अवधूत संप्रदाय,
१. काम मिलावे राम से जो राखे यह जीत ।
दास मलूका यों कहै जो आवै प्रतीत ॥
—मलूकदास की बानी, पृ० ४० ।
२ जिहि वन सिंह न संचरै चील उडै नहि जाय ।
रैन दिवसा का गम नहीं तहाँ कबीर रहा ल्यो लाय ॥
३ जहि मन पवन न संचरै रवि ससि नहिं प्रवेश ।
तहि वट चित्त विसास करुन सरहे कहिअ उवेस ॥
—'हिंदी साहित्य की भूमिका'—डा० हजारी प्रसाद द्विवेदी, पृ०३६ से उद्धृत ।
४. नाथ संप्रदाय, डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृ० १ ।