सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
DevanagariHindipublished332 पृष्ठ
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४८ नामदेव की हिंदी कविता
निर्गुण काव्यधारा पर मत्स्येंद्रनाथी धारा के प्रभाव
संतो को नाथ पथ की मत्स्येंद्रनाथी धारा से पर्याप्त प्रेरणा मिली थी। उनको
इन साधनाओ को एक क्रमबद्ध परंपरा प्राप्त हुई थी। मत्स्येंद्र नाथ के अनुकरण पर
ही संतो ने उनमनी अवस्था, सहजावस्था आदि के वर्णन भी किये है। उनमनी अवस्था
का वर्णन करते हुए दादू लिखते है कि उनमनी अवस्था ही सहजावस्था होती है। वह
परमात्मा ही सहज स्वरूप, सर्वव्यापी और तेज रूपी है। १
मत्स्येंद्रनाथियो की मन की साधना को संतो ने अपना प्रमुख सिद्धांत अभि-
व्यंजित किया है। संत दरिया साहब लिखते है कि मन के कारण ही संसार भ्रम में
फंसा हुआ है। जो मन के रहस्य को जान लेता है वह बुद्धिमान है। २
दादू ने भी लिखा है—मन कालुष्य को जन्म देने वाला है। वही कालुष्य का
प्रक्षालन कर सकता है अतः उसी की साधना करनी चाहिए। ३
अपने पूर्ववर्ती तांत्रिक साधको की भाँति मत्स्येंद्रनाथी साधक लोग भी बाह्या-
चारों के विरुद्ध थे। संतों ने उसी परंपरा का अनुकरण किया था। मत्स्येंद्रनाथी
से निरंजन योगिया की परंपरा मिली थी उन्हीं के अनुकरण पर संतो ने निरंजन
योगियो का वर्णन किया है। जिस प्रकार मत्स्येंद्रनाथी साधक भावात्मक पूजा और
साधना को महत्व देते थे उसी प्रकार संत लोगो ने भी साधना के क्षेत्र में सभी प्रकार
के साधको और साधनाओ का मानसीकरण किया है। निरंजन योगियो के स्वरूप
निर्देश से उपर्युक्त दोनो बातें स्पष्ट हो जायेंगी। ४
१ न घर भला न बन भला जहां नही निज नांव।
दादू उनमनि मन रहे भला न सोई ठाँव ॥
—दादू बानी भाग १, पृ० २४।
२ मन पीछे सब जगत भुलाना। मन चीन्हे सो चतुर सुजाना ॥
—दरिया सागर, पृ० ३०।
३ मन ही सो मल उपजै मन ही सो मल धोई
दादू बानी भाग १, पृ० ११४।
४ जोगिया बैरागी बाबा, रहे अकेला उनमनि लागा।
आत्मा जोगी धीरज गया, निहचल आसन अगम पथा ॥
सहजे मुद्रा अनल अधारो अनहद सींगी रहणि हमारी।
काया बनखण्ड पायो चेला ज्ञान गुफा में रहे अकेला ॥
दादू दरसन करन जागे निरंजन नगरी भिक्षा मांगे।
—दादू बानी भाग २, पृ० ६८।