सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 46, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिंदी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि ४७
गोरखनाथी संप्रदाय, मत्स्येंद्रनाथी संप्रदाय आदि नाम बहुत प्रसिद्ध हैं। इस मत के
अनुयायी योगी, कनफटा, दर्शनी आदि नामों से पुकारे जाते हैं।१
नाथ पंथ के इतिहास में मत्स्येंद्रनाथ और गोरखनाथ के नाम सबसे अधिक
प्रसिद्ध हैं। इसका कारण यह है कि दोनों ही नाथ पंथ की दो भिन्न-भिन्न धाराओं के
प्रवर्तक थे। प्रोफेसर बाग्ची२ का मत है कि मत्स्येंद्र ने योगिनी कौल मार्ग नामक
नाथ पंथी धारा का प्रवर्तन किया था। गोरखनाथ ने नाथ पंथ में हठयोग को विशेष
महत्व दिया था। इसीलिए उनका साधना मार्ग गोरखनाथी हठयोग के नाम से प्रसिद्ध
है। आजकल गोरखनाथ के मत को ही सामान्यतः नाथ पंथ के नाम से अभिहित
किया जाता है। निर्गुणिया संतों को नाथ पंथ की उपर्युक्त दोनों ही धाराओं ने प्रभा-
वित किया था। इन दोनों आधारशिलाओं पर ही संत मत का भवन खड़ा हुआ है।
मत्स्येंद्रनाथ ने संत मत के लिये पूरी पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी। यदि हम
दोनों मतों की तुलना करें तो हमें निश्चय हो जायगा कि निर्गुण काव्यधारा की सच्ची
पृष्ठभूमि मत्स्येंद्रनाथ का योगिनी कौल मार्ग ही है। उसकी दार्शनिक विचारधारा,
उसका साधना क्रम और उसके पारिभाषिक शब्द संत कवियों में ज्यो के त्यो उपलब्ध
होते हैं।
नाथ शब्द की व्याख्या के संबंध में विद्वानों में मतभेद है। डॉ० गोविंद त्रिगुणा-
यत के अनुसार यह संप्रदाय स्वतंत्र रूप से विकसित हुआ था। हिंदू, शैव, शाक्त तंत्रों,
बौद्ध तंत्रों, शैव दर्शन और योग साधना आदि विविध धर्म और साधना पद्धतियों ने
मिलकर इसकी प्राण प्रतिष्ठा की थी। दूसरे शब्दों में हम यों कह सकते हैं कि नाथ
संप्रदाय मध्यकाल की सामान्य जनता में प्रचलित सभी साधना और धर्म पद्धतियों का
एक अभिनव समन्वित स्वरूप है। अपने समय की समस्त विचार धाराओं और साधनाओं
के सुंदर तत्त्वों को स्वायत्त करने की प्रवृत्ति निर्गुण संप्रदाय में भी थी। डॉ० गोविंद
त्रिगुणायत नाथपंथ तथा निर्गुण संप्रदाय का घनिष्ठ संबंध बताते हैं।३
१. गोरखनाथ एण्ड दी कनफटा योगीज —ब्रिग्स, पृ० १ (१९३८)।
२. कौल ज्ञान निर्णय—डॉ० प्रबोधचंद्र बागची संपादित भूमिका, पृ० ३५।
३. 'यही कारण है कि निर्गुण संप्रदाय की प्रवृत्ति साम्य के कारण नाथ पंथ के अत्य-
धिक समीप है। हमारी अपनी दृढ़ धारणा है कि नाथपंथ और निर्गुण संप्रदाय में
पिता-पुत्र का संबंध है। नाथ संप्रदाय को अच्छी तरह से समझे बिना संतों का
निर्गुण संप्रदाय किसी प्रकार भी समझा नहीं जा सकता।'
—हिन्दी की निर्गुण काव्यधारा और उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि, पृ० २६७।