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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 332 में से

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पृष्ठ 43

४४ नामदेव की हिंदी कविता
सहजयान की सहज तत्त्व धारणा ने भी संतों को प्रभावित किया है। उसी के
सदृश वे भी सत्ता को सहज रूप में मानते हैं। दादू लिखते हैं—'मैंने परमात्मा का
सहज रूप देखा है। वह परम तेजमय है। उसमें मेरा मन सरलता से रम जाता है।'१
इसे संतों ने द्वैताद्वैत विलक्षण भी कहा है।२
बौद्ध तांत्रिकों के शून्यवाद का ऋण भी संतों पर है। वज्रयान में सब कुछ पूर्ण
शून्य रूप ही माना गया है। वज्रयान के इस सिद्धांत की व्यंजना करते हुए दादू ने
लिखा है कि चेतन जीव शून्य से आया और शून्य में ही लय होगा। अतः उसे उसी
शून्य का ध्यान करना चाहिए।३ सहजयान के चार शून्यों की धारणा भी संतों को
अपने ढंग पर मान्य थी। उनकी ओर संकेत करते हुए संत दादू लिखते हैं—तीन शून्य
तो नाम रूप से संबंधित हैं। चौथा शून्य ही निर्गुण रूप होने से सहज कहलाता है।
वह सर्वव्यापी है।४
तत्त्व के सहज और शून्य रूप होने के कारण ही संतों ने उसे अनिर्वचनीय और
वाच्यावाच्य परे कहा है। संत दादू कहते हैं, 'जो कुछ नहीं है अर्थात् सहज शून्य रूप
है वह अनिर्वचनीय है। उसको नाम रूप देकर वाणी के बंधन में बाँधकर लोग भ्रमित
हो रहे हैं।'५
बौद्ध तांत्रिकों का कल्पनावाद जो विज्ञानवाद का ही रूपांतर है, बहुत प्रसिद्ध
है। संतों के कल्पनावाद को इनके कल्पनावाद से प्रेरणा मिली होगी। संभवतः उसी के
१ अविनासी अंग तेज का, ऐसा तत्त्व अनूप।
सो हम देख्या नैन भरि सुंदर सहज स्वरूप ॥
परम तेज परगट भया तहँ मन रह्या समाइ।
दादू खेले पीव सौ नहिं आवै नहिं जाइ ॥
—दादू बानी भाग १, पृ० ५५।
२ निर्गुंन सगुन दुहुन ते न्यारा, सत स्वरूप ओहि विमल विचारा।
—द० सागर, पृ० ५४।
३ शून्य हि मारग आइया, शून्य हि मारग जाय।
चेतन गँवा सुरति का दादू रहु ल्यो लाय ॥
—'ने को अंग' सं० संत सुधासार, पृ० २८३।
४ तीन सून्य आकार की चौथा निर्गुंण नाम।
सहज शून्य में रमि रहा जहँ तह सब ठाम ॥
—दादू बानी, भाग १, पृ० २०।
५ कुछ नाही का नाव धर भरमा सब संसार।
—दादू बानी भाग १, पृ० १४८।