सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २७५
'हे नरहरि । मैं तुम्हारा सेवक हूँ, आवागौन के फेर से मुझे मुक्त करो ।'१
'नामदेव का स्वामी नरहरि खंभे में से प्रगट हुआ ।'२
'मुक्ति मिलने पर तथा नाम का उच्चारण करने पर स्वामी और सेवक (भक्त
और भगवान्) साथ रहे ।'३
'देवता मैले हैं, गंगाजल भी अशुद्ध है। केवल नामदेव के स्वामी निर्मल हैं,
शुद्ध है ।'४
कबीर ने भी सेव्य-सेवक भाव पर विशेष जोर दिया है। भगवान् के प्रति कबीर
का आत्मसमर्पण देखने योग्य है। वे कहते हैं—'हे स्वामी। मै तुम्हारा गुलाम हूँ। तू
मुझे जहाँ चाहे बेच डाल। तूने तो मुझे ऐसे हाट में उतार दिया है जहाँ पर तू ही
गाहक है और बेचनेवाला भी तू ही है ।'५
कबीर के विनयभाव की उत्कृष्टता अवलोकनीय है। कबीर कहते हैं—'मैं राम
का स्वामिभक्त कुत्ता हूँ और मेरा नाम मोती है। मेरे गले में राम नाम की रस्सी है
अर्थात् राम के प्रेम की रस्सी से मैं बँधा हूँ। जिधर राम मुझे खींचता है उधर ही मैं
चलता हूँ ।'६
१. नामदेव कहै मैं सेवक तेरा ।
आवा गवण निवारि हो नरहरी ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १६७ ।
२. खंभा मांहि प्रगट्यो हरी । नामदेव को स्वामी नरहरी ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १२७ ।
३. मुक्ति भऐला जाप जपेला । सेवक स्वामो संग रहेला ॥
संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ४५ ।
४. मैला सुर मैली सुरसरी । नामदेव कौ ठाकुर निरमल हरी ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १२१ ।
५. मैं गुलाम मोहि बेचि गुसाईं ।
तन मन धन मेरा रामजी के तांईं ॥ टेक ॥
आनि कबीरा हाटि उतारा ।
सोई गाहक सोई बेचनहारा ॥
—कबीर ग्रंथावली पृष्ठ १२४ ।
६. कबीर कूता राम का मुतिया मेरा नाउ ।
गले राम की जेवड़ी जित खेंचे तित जाऊँ ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ २० ।
२७६ नामदेव की हिंदी कविता
'हे रामजी ! आप पर मेरा दृढ़ विश्वास है। फिर मैं और किसी का निहोरा
क्यों करूँ ? रामचंद्रजी जैसा जिसका स्वामी हो वह और को क्यों पुकारे ?'¹
मैं उस समर्थ का सेवक हूँ जो महान् और असीम है, इसी कारण मेरा अनर्थ
नहीं हो सकता। यदि पतिव्रता नंगी रहे तो ईश्वर के लिए बड़ी लज्जा का विषय
होगा।'²
'मेरा ठाकुर, मेरा स्वामी ऐसा भक्तवत्सल है कि उसकी शरण में जाने पर वह
अपने भक्तों का उद्धार करता है।'³
ऊपर नामदेव तथा कबीर दोनों की रचनाओं में समान रूप से पाई जाने वाली
निर्गुण पक्ष की जो विशेषताएँ बताई गई हैं उनसे नामदेव और उनकी रचनाओं का
कबीर और उनकी बानी पर प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। संत मत की ये सभी विशेष-
ताएँ कबीर को नामदेव से उत्तराधिकार में मिली थीं।
संत नामदेव का निर्गुण भक्ति की ओर झुकाव पंजाब आने के पूर्व संत ज्ञाने-
श्वर के संपर्क से हो चुका था। पंजाब में इसके लिए उपयुक्त वातावरण मिला। अतः
उनकी निर्गुण भक्ति खूब विकसित हुई, जिसकी अभिव्यक्ति उनके हिंदी पदों में है।
यहाँ मैं एक बात की ओर संकेत करना चाहता हूँ और वह यह कि नामदेव के हिंदी
पदों में उनके परिपक्व अनुभव साधना के संबंध में प्रौढ़ विचार और आध्यात्मिक
समन्वयवाद का स्पष्ट निखार है। इनके मराठी अभंगों में वर्णनात्मकता अधिक है और
जहाँ भावुकता अधिक है वहीं भक्ति की विह्वलता है परंतु हिंदी पदों में आत्मानुभूति
तथा ज्ञान और भक्ति का वह सुंदर पाग है जो स्वाद लेने वाले के लिए गूँगे के गुड़
की तरह है।
वस्तुतः देखा जाय तो नामदेव की हिंदी रचना का क्षेत्र बहुत विशाल है।
१ अब मोहि राम भरोसा तेरा।
ओर कोन का करौं निहोरा ॥ टेक ॥
जाके राम सरीखा साहिब भाई।
सो क्यूँ अनत पुकारन जाई ॥
—कबीर ग्रन्थावली पद १२२, पृष्ठ १२७।
२ उस सम्रथ का दास हौं कदे न होइ अकाज।
पतिव्रता नांगी रहे तो उसकी पुरिस को लाज ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ २०।
३. दास कबीर को ठाकुर ऐसो भगत की सरन उबारे।
—कबीर ग्रन्थावली, पद १२२, पृष्ठ १२७।
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २७७
ध्यानपूर्वक इन पदो का अध्ययन करने से यह बात निश्चित रूप से दिखाई पड़ती है कि
निर्गुण संतों की रचनाओं में जो विशेषताएँ प्राप्त होती हैं वे सभी नामदेव में हैं।
आचार्य परशुराम चतुर्वेदीजी ने भी इन्ही विशेषताओं का उल्लेख किया है—
(१) प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर सत्य का अन्वेषण
(२) सद्गुरु के महत्व का प्रतिपादन
(३) परम तत्व के साथ एकात्म भाव
(४) नाम स्मरण का आग्रह, तथा
(५) वाह्याडम्बर की व्यर्थता
संत नामदेव की हिंदी रचनाओ में ये सभी विशेषताएँ प्राप्त होती है । नामदेव
और कबीर की समान विचार-धारा की तुलना में इन विशेषताओ का उल्लेख किया जा
चुका है पर यहाँ उन्हे ओर स्पष्ट रूप से रखना चाहता हूँ।
नामदेव ने सर्वदा इस बात पर जोर दिया है कि ब्रह्म अथवा सत्य का अन्वेषण
प्रत्यक्ष अनुभव के बिना नहीं हो सकता । कहना-सुनना उसके परिचय में सहायक नही
हो सकता । कहना-सुनना जब समाप्त होगा तब उसका परिचय मिलेगा ।¹
वे बार-बार आत्मानुभव की ओर संकेत करते हैं—'रे मानव ! ईश्वर की सृष्टि
को अपने हृदय मे विचार कर देख । एक ही ईश्वर घट-घट और चराचर में समान रूप
से व्याप्त है ।'²
वे वेद और पुराण पढ़ने के बाद भी स्वतः विचार करने को अधिक महत्व देते
हैं—'हे पंडित ! तुम वेदों और पुराणो को पढ़ो और सोचो कि हरि का दास संसार से
बिलकुल अलग है ।'³
गुरु के महत्त्व के अनेक उदाहरण हम पहले दे आये हैं । 'सारा संसार भ्रम में
भूला हुआ है, निर्वाण पद को कोई पहचानता ही नही । नामदेव के गुरु ने उस परम तत्त्व
१. कहिवौ सुनिबौ जब गत होइबौ तब ताहि परचौ आवै ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६६ ।
२. कहत नामदेउ हरि की रचना देखहु रिदै विचारी ॥
घट-घट अंतरि सरब निरंतरि केवल एक मुरारी ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १५० ।
३. ऐसे जगथै दास निधारा ।
वेद पुरान मुगुत किन देषी पंडित करउ विचारा ॥ टेक ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ८२ ।
२७८ नामदेव की हिन्दी कविता
को नामदेव के बहुत ही समीप बताया ।'१
उस परम तत्त्व, पर ब्रह्म के साथ नामदेव जैसे एकाकार हो गये हैं। वे कबीर
की विरहिणी की तरह उस प्रिय से अपना संबंध जनम-जनम का बतलाते हैं ।२
और यह प्रीति कच्ची नहीं है। यह तो चातक के अनन्य भाव से भी बढ़कर
है । 'चातक पानी से भरे हुए घड़े की ओर नही जाता । मेघ से टपकने वाली बूंद का
पान किये बिना उसको संतोष नही होता । उसके स्नेह की ओर देखो ।'३
नामदेव का उस परम तत्त्व से जो संबंध है वह लहर और सरोवर तथा मछली
और पानी का है ।४
नामदेव की हिंदी रचनाओं में नाम-स्मरण का आग्रह बारंबार दिखाई पड़ता
है। वे यहाँ तक कहते हैं कि यदि जीभ से राम नाम का उच्चारण न हो तो वह किस
काम की ?५
उन्हें ज्ञात है कि राम-नाम के स्मरण बिना यम के जाल से छुटकारा नहीं है।
अत. वे अपने आलसी मन को सचेत करते हैं ।६
नामदेव को पूरा विश्वास है कि राम के भजन के अतिरिक्त उद्धार का अन्य
१. निरबाने पद कोइ चौन्है झूठे भरम भुताइला ।
प्रणवत नामा परम तत रे सत गुरु निकटि बताइला ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १६ ।
२. लागो जनम जनम की प्रीति, चित नही बीसरै रे ॥ टेक ॥
—संत नामदेव को हिंदी पदावली, पद १३६ ।
३. भर्यो सरवर लहरया जाइ धायौ नहीं पपीहरो रे ॥
तेन्हो घन बिन तपति न याइ, जोवो तेन्हौ नेहरो रे ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १३६ ।
४. हरि सरवर जन तरंग कहावै ।
सेवग हरि तजि कहूँ कत जावै ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ७ ।
तू सायर मे मछ्छा तोरा । —संत नामदेव को हिंदी पदावली, पद ४६ ।
५. जो बोले तौ रामहि बोलि ।
नही तर वदन कपाट न खोलि ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ११६ ।
६. अपने राम कूँ भज ले आलसीया । राम बिना जम जाल सीया ॥टेक॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६३ ।
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २७६
कोई मार्ग है ही नहीं। 'तुम करोड़ो उपाय क्यों नही करते, राम भजन के बिना भव
सागर को पार करना दुस्तर है।'१
नामदेव बाह्याडम्बर के बहुत विरोधी है। ब्राह्मण वेद पढ़ने का आडम्बर करते
है तो मुसलमान रोजा और नमाज का । नामदेव कहते है कि जब तक मन में भ्रान्ति है
तब तक इन सबका कुछ उपयोग नही।२
ऐसे आडम्बर-प्रेमियों को नामदेव ने पूरी खबर ली है। साधनो ही को महत्त्व
देने वाले भक्तों पर वे व्यंग्य करते है ।३
उपरि-उल्लिखित सब तथ्यो पर विचार करने पर आचार्य विनयमोहन शर्मा का
यह निष्कर्ष समीचीन जान पड़ता है।४
नामदेव तथा कबीर का काल
यद्यपि यह सर्वमान्य तथ्य है कि संत नामदेव कबीर के पहले हुए थे किन्तु यहाँ
में एक बार पुनः इन दोनों के कालों पर विचार कर लेना चाहता हूँ ताकि दोनों का
काल-क्रम स्पष्ट रूप से निश्चित किया जा सके। बड़े खेद की बात है कि कुछ लोगों ने
नामदेव और कबीर को समकालीन भी माना है।
नामदेव का जन्मकाल शके ११९२ (सन १२७० ई०) प्रसिद्ध है।५ महाराष्ट्र
१. राम भगति बिन गति न तिरन की। कोटि उपाइ जु करही रे नर ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६२ ।
२. ब्रह्मा पढ़ि गुणि वेद सुनावै । मन की भ्रांति न जावै ॥
करम करै सो सूझै नाही। बहुतक करम कराई ॥
मास दिवस लग रोजा साधै । कलमा बांग पुकारै ।
मनमें काती जीव संघारै । नाव अलह का सारै ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६४ ।
३. मन मैले की सुधि नहिं जाणी । साबन सिला सराह्रै पाणी ॥
४. 'नामदेव में उत्तरी भारत के संत मत की सारी विशेषताएँ विद्यमान हैं। इसीलिए
हम उन्हे उत्तर भारत में निर्गुण भक्ति मत का प्रथम प्रचारक और प्रवर्तक तथा
कबीर आदि संतों का पथ-प्रदर्शक मानते हैं।'
—हिंदी को मराठी संतों की देन, पृष्ठ १२८ ।
५. अधिक ब्याण्णव गणित अकरा शतें । उगवता आदित्य तेजोराशी ।
शुक्ल एकादशी कार्तिकी रविवार । प्रभव संवत् शालिवाहन शके ॥
—सकल संत गाथा, अभंग १२५४ ।
२८० नामदेव की हिन्दी कविता
के विद्वानों में इस काल के संबंध में कोई मतभेद नहीं है। कुछ विद्वानों ने हिंदी कविता
में वर्णित घटनाओं के आधार पर नामदेव का काल कुछ बाद में खींचने का प्रयत्न
किया है।
डॉ० मोहनसिंह 'दीवाना' ने अपनी पुस्तक 'भक्त शिरोमणि नामदेव' की नई
जीवनी, नई पदावली, में नामदेव के काल को ई० स० १३६० और १४५० के बीच
माना है। इसका आधार उन्होंने नामदेव का मृत गाय जिलानेवाला पद¹ माना है।
इस संदर्भ में डॉ० राजनारायण मौर्य का मत दृष्टव्य है।²
डॉ० मोहनसिंह ने फिरोजशाह बहमनी को ही वह सुलतान माना है जिसने
नामदेव को मृत गाय जिलाने की आज्ञा दी थी। वह दक्षिण में था और उसका काल
सन् १३६७ से १४२२ ई० के मध्य का है। अन्य फिरोज सुलतान फिरोज शाह खिलजी
(राज्य काल सन् १२८२ से १२६६ तक) के साथ नामदेव के काल का मेल नहीं बैठता
और फिरोज शाह तुगलक (राज्य काल १३५१ ई० से १३८८ ई० तक) के साथ स्थान
का मेल नहीं बैठता क्योंकि फिरोज शाह न तो दक्षिण में आया था और न संत नामदेव
दिल्ली ही गये थे। अत इसी आधार पर डॉ० मोहनसिंह ने नामदेव का काल खींचकर
आगे बढ़ा दिया है। उन्होंने एक और तर्क दिया है। वह है संत नामदेव का रामानन्द
का शिष्य होना। वे रामानन्द का जन्म सन् १४२० और ३० ई० के बीच तथा कबीर
का सन् १४५० और ६० ई० के बीच मानते हैं।
डॉ० मोहनसिंह के इन दोनों तर्कों में कोई तथ्य नहीं है। इसका तो कहीं उल्लेख
भी नहीं है कि रामानन्द नामदेव के गुरु थे। महाराष्ट्र और हिंदी साहित्य में भी यह
१ सुलतानु पूछे सुनु बे नामा। देखउ राम तुम्हारे कामा॥
—गुरु ग्रन्थ साहब, नामदेव के हिंदी पद, पद ४७।
२. 'यहाँ एक बात विशेष उल्लेखनीय है कि डॉ० मोहनसिंह ने गुरु ग्रंथ साहब के
जिस पद के आधार पर गाय जिलाने की घटना का जिक्र किया है वह पद नामदेव
रचित मानने में मुझे संदेह है। काशी नागरी प्रचारिणी सभा में मुझे एक हस्त
लिखित संतों की परचई प्राप्त हुई है जिसमें नामदेव की भी परचई है। इसका
लिपिकाल स० १७४० और रचयिता कृष्णानंद हरीदास हैं। नामदेव की परचई
में (जो दोहे और चौपाई में है) मृत गाय जिलाने का वर्णन है जिसकी शब्दावली
गुरु ग्रंथ साहब के इस पद से बहुत मिलती जुलती है। भाषा और वर्ण्य विषय की
दृष्टि से भी यह पद संदेहात्मक है।'
—हिंदुस्तानी (जनवरी १९६२), पृष्ठ ११२।
नामदेव . हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २८१
प्रचलित है कि संत ज्ञानेश्वर के पिता के गुरु रामानन्द थे । किन्तु श्री भावे १ के अनुसार
उनके गुरु श्रीपाद स्वामी थे । रामानन्द का काल आज भी निश्चित नहीं है । पर इतना
अवश्य निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि ये संत नामदेव के गुरु नहीं हो सकते ।
नामदेव के गुरु विसोबा खेचर थे जो नाथ परंपरा के एक सिद्ध योगी थे ।
कबीर की रचनाओं में नामदेव का नाम आया है ।२ परन्तु नामदेव की रचना
में कबीर का नाम कहीं भी नहीं आया है । अतः यह निर्विवाद सिद्ध हो जाता है कि
नामदेव कबीर के पूर्ववर्ती है । एक ओर ध्यान देने योग्य बात यह है कि नामदेव और
कबीर के परवर्ती संतों ने बड़ी ही श्रद्धा से इन दोनों का नाम लिया है पर प्रायः नाम-
देव का नाम कबीर के पहले मिलता है ।
इसका तात्पर्य यह नहीं है कि कबीर का नाम नामदेव के पूर्व कही आया ही
नहीं है । छंद रचना में जहाँ जो शब्द बैठ गया वहाँ रख दिया गया है । फिर भी नामों
का क्रम देखकर लगता है कि ये रचयिता संत नाम-क्रम के प्रति सचेत अवश्य थे ।
१. महाराष्ट्र सारस्
२८२ नामदेव की हिन्दी कविता
कबीर का काल निर्णय
संत कबीर का जन्म-काल यद्यपि आज भी विवाद-रहित नहीं है फिर भी कबीर
के काल निर्णय के संबंध में जितने भी लोगों ने विचार किया है, उनमें से अधिकांश ने
उनका जन्म काल संवत् १४५५ और मृत्युकाल संवत् १५७५ माना है।
कबीर पंथियों में कबीर के आविर्भाव के सम्बन्ध में निम्नांकित दोहा प्रचलित
है।१ इस उल्लेख से कबीर की जन्म-तिथि संवत् १४५५ को ज्येष्ठ की पूर्णिमा प्रामा-
णिक प्रतीत होती है।
कबीर के काल निर्णय में तीन ऐसे प्रमुख ऐतिहासिक व्यक्ति हैं जो बाधक या
सहायक हैं—रामानन्द, सिकंदर लोदी और नवाब बिजली खाँ।
रामानन्द को कबीर का गुरु कहा जाता है। इसी बात को सिद्ध करने के लिए
दोनों को खींचकर, तान कर, एक साथ लाने का प्रयत्न किया जाता है।
सिकन्दर लोदी (सन् १४८८-१५१७ ई०) और कबीर की भेंट काशी में
बताई जाती है। अतः कबीर और सिकंदर लोदी का भी एक साथ होना आवश्यक है।
वेस्टकॉट, स्मिथ, भांडारकर, मेकालिफ, फहूँहर, ईश्वरी प्रसाद आदि इतिहासकारों ने
भी कबीर को सिकंदर लोदी का समकालीन माना है।
'आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया' में लिखा है कि बिजली खाँ ने कबीर
का स्मारक बनवाया था। अतः बिजली खाँ को भी कबीर का समकालीन होना
चाहिए।
परिणाम-स्वरूप इन चारों ऐतिहासिक व्यक्तियों को किसी प्रकार आगे पीछे
करके एक साथ लाया जाता है। देखना यह है कि क्या सचमुच ये चारों सम-
कालीन हैं?
(१) रामानन्द का काल, सं० १३५६-१४६७।
(२) सिकन्दर लोदी का शासन काल, सं० १५४५-१५७५।
(३) नवाब बिजली खाँ द्वारा बनाया गया कबीर का स्मारक, सं० १५०७।
यदि कबीर का काल सं० १४५५ से १५७५ तक माना जाय तो वे रामानन्द
के शिष्य नहीं हो सकते, इसलिए लोगों ने रामानन्द की प्रामाणिक तिथि और आगे
१. चौदह सौ पचपन साल गए चंद्र वार एक ठाट ठए।
जेठ सुदी बरसायत को पूरनमासी प्रकट भए ॥
—कबीर चरित्र बोध, पृष्ठ ६।
(बोधसागर, स्वा० युग़लानन्द द्वारा संशोधित)
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्त्ता २८३
दी है। उन्होंने रामानन्द का जन्म संवत् १४५६ (वास्तविक जन्म संवत् से १०० वर्ष
बाद) माना है जो कपोल कल्पित है।
सिकंदर लोदी और कबीर की भेंट भी एक प्रकार से कपोल-कल्पना ही है।
किसी इतिहास ग्रन्थ से यह घटना प्रमाणित नही होती। यदि किसी नवाब या सामन्त
से कबीर की भेंट हुई भी हो तो वह सिकन्दर लोदी नही हो सकता।
ऐतिहासिक काल-क्रम और घटना-चक्र की दृष्टि से यदि किसी ने कबीर के
काल पर विचार किया है तो प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ० रामप्रसाद त्रिपाठी ने।¹ वे
इस परिणाम पर पहुँचे हैं कि कबीर का काल विक्रम की १५वीं शताब्दी के आगे किसी
भी प्रकार नही जाता। सिकंदर लोदी के प्रसंग को वे पूर्णतः अप्रामाणिक मानते है।
उनका मत है कि संवत् १४१७ से १४६१ तक का काल पूर्वी उत्तरी भारत मे क्रान्ति
का काल है। इन दिनों राजनीतिक क्रान्ति और धार्मिक क्रान्ति साथ-साथ चलती रही।
कबीर साहब जैसे प्रवल प्रचारक के लिए यही समय सबसे उपयुक्त था। कबीर सं०
१४०५ में उत्पन्न हुए और अपनी २५-३० वर्ष की आयु मे सं० १४३०-३५ से उन्होंने
अपनी बात लोगो से कहनी प्रारम्भ कर दी थी।
डॉ० रामकुमार वर्मा² डॉ० रामप्रसाद त्रिपाठी के इस निष्कर्ष से सहमत
नही हैं।
रही बात बिजली खाँ की। वह भी पूर्णरूपेण ऐतिहासिक और प्रामाणिक नही
है। सं० १५०७ में नवाब बिजली खाँ ने कबीर का स्मारक बनवाया यह ठीक है
किन्तु यह बात प्रमाणित नही होती कि यह स्मारक मृत्यु के समय का है या कबीर के
जीवन-काल का ?
वास्तव में बिजली खाँ द्वारा कबीर का स्मारक बनवाना उतना महत्वपूर्ण नही
जितना 'आर्किओलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया' में उसका उल्लेख। यह उल्लेख पूर्णतः
ऐतिहासिक है और गलत नही हो सकता। एक प्रकार से यह प्रमाणित तथ्य है। नवाब
बिजली खाँ ने आमी नदी के किनारे कबीर का स्मारक सं० १५०७ मे बनाया। कबीर
की मृत्यु सं० १५०५ में हुई। मृत्यु के पश्चात् बिजली खाँ के मन में स्मारक बनाने
की बात आयी होगी और उसके बनने में एक डेढ़ साल सहज ही लग गया होगा। अतः
१. 'कबीर जी का समय'
—हिंदुस्तानी, अप्रैल १९३२, पृ० २०७-१०।
२. संत कबीर।
—डॉ० रामकुमार वर्मा, पृ० ४७।
२८४ नामदेव की हिन्दी कविता
यह स्मारक स० १५०७ में बनकर तैयार हुआ। इस ऐतिहासिक तथ्य के आधार पर
कबीर और बिजली खाँ का सम्बन्ध पूर्णतः प्रमाणित हो जाता है।
इस संदर्भ में आचार्य परशुराम चतुर्वेदी की शंका दृष्टव्य है।१
कबीर के काल निर्णय के सम्बन्ध में डॉ० राजनारायण मौर्य का निष्कर्ष ठोस
प्रमाणों पर आधारित तथा सुचिंतित प्रतीत होता है।२
ऊपर इस बात का उल्लेख हो चुका है कि जनश्रुति कबीर का जन्म-काल
स० १४५५ तदनुसार सन् १३९८ ई० तथा उनका मृत्युकाल स० १५७५ तदनुसार
सन् १५१८ ई० मानने के पक्ष में है।
नामदेव का जन्म काल सन् १२७० ई० और मृत्यु काल सन् १३५० ई० है।
इस प्रकार नामदेव का जन्म कबीर से १२८ वर्ष पूर्व हुआ था। इतना ही नहीं नामदेव
के मृत्युकाल और कबीर के जन्म-काल में भी ४८ वर्षों का अन्तर है। अतः यह निर्विवाद
सिद्ध हो जाता है कि नामदेव का काल कबीर के काल से एक शताब्दी पूर्व था।
ऐसा विश्वास किया जाता है कि उत्तर भारत में भक्ति मार्ग को रामानन्द ले
आये थे। सौभाग्य से उनको कबीर जैसा शिष्य मिल गया था। कबीर के अनुयायियों
१. 'उपलब्ध सामग्रियों पर विचार करते हुए इस प्रकार का निर्णय करने वालो की
प्रवृत्ति इधर कबीर साहब के जीवनकाल को क्रमशः कुछ पहले की ओर (सं०
१४५५-१५७५) ही ले जाने की दीख पड़ती है। ऐसी दशा में कभी-कभी अनुमान
होने लगता है कि उक्त समय (कबीर का काल) कही (स० १४२५-१५०५) के
ही लगभग सिद्ध न हो जाय।'
—उत्तरी भारत की संत परम्परा, पृ० १३६।
२ 'ऊपर के सभी तथ्यों का यदि पूर्णरूपेण विश्लेषण किया जाय और ऐतिहासिक
दृष्टि से भी विचार किया जाय तो सेंट्रल लायब्रेरी पटियाला से प्राप्त हस्तलिखित
ग्रन्थ में दिया हुआ कबीर का काल ही ठीक जान पड़ता है।'
'श्री चतुर्वेदी जी के पास ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं था जिसके आधार पर वे
कबीर का काल स० १४०५-१५०५ बता सकते। किन्तु उन्हे लगने लगा कि स०
१४५५-१५७५ वाला कबीर का काल पूर्णतः प्रामाणिक नहीं है। इसीलिए उन्होंने
संदेह प्रकट किया कि कही स० १४२५-१५०५ के लगभग कबीर का काल न हो।
मैं समझता हूँ कि अब एक प्रमाण मिल गया है और उसके आधार पर स० १४०५-
१५०५ तक कबीर का काल मानने में कोई हर्ज नही है। मैं स्वयं कबीर का यही
काल मानता हूँ।'
—'हिन्दुस्तानी' वर्ष ३२।
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २८५
में निम्नलिखित दोहा प्रचलित है ।१ परन्तु द्रविड़ देश में जो भक्ति उत्पन्न हुई थी उसका
वही रूप नहीं है जो कबीर आदि निर्गुण संतों में प्राप्त होता है । रामानन्द ने रामा-
नुजाचार्य के भक्ति सिद्धांतों को उत्तर भारत में अनेक प्रयोगों के साथ प्रस्तुत किया ।
दक्षिण से उत्तर की ओर आने में भक्ति को अनेक बाधाओं का सामना करना
पड़ा । पहली बाधा शैव संप्रदाय की थी । अपनी उत्तर की यात्रा में भक्ति की लहर
जब महाराष्ट्र में पहुँची तो वहाँ शैव संप्रदाय का प्रभाव वर्तमान था । 'ज्ञानेश्वरी' के
रचयिता संत ज्ञानेश्वर स्वयं नाथ पंथ के अनुयायी थे । वे गुरु गोरखनाथ की परम्परा
में हुए ।
ज्ञानेश्वर के समकालीन संत नामदेव ने विट्ठल की उपासना की जिसमें नाम-
स्मरण का अत्यधिक महत्त्व है । यह विट्ठल संप्रदाय सन् १२०६ (सं० १२६६) के लग-
भग पंढरपुर में प्रचारित हुआ । इसके प्रचारक कन्नड़ संत पुंडलिक कहे जाते हैं । यह
विट्ठल संप्रदाय वैष्णव और शैव संप्रदायों का मिश्रित रूप है । इस संप्रदाय के इष्टदेव
विट्ठल एक सर्वव्यापी ब्रह्म के प्रतीक बनकर समस्त महाराष्ट्र के आराध्य बन गए । ऐसा
ज्ञात होता है कि आठवीं शताब्दी के शैव धर्म से ग्यारहवीं शताब्दी के वैष्णव धर्म का
समझौता विट्ठल संप्रदाय के रूप में हुआ जिसके सब से बड़े संत नामदेव हुए । विट्ठल
संप्रदाय के अन्तर्गत होते हुए भी नामदेव ने मूर्तिपूजा पर बल न देकर नाम स्मरण पर
ही अधिक बल दिया ।
इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि उत्तर भारत में सन्त मत का जो उत्थान
वैष्णव भक्ति को लेकर हुआ था उसका पूर्वार्द्ध महाराष्ट्र में विट्ठल सम्प्रदाय के सन्तो
द्वारा प्रस्तुत हो चुका था जिनमें ज्ञानेश्वर और नामदेव प्रमुख थे । अपनी उत्तर भारत
की यात्रा में इन दोनों ने १५वीं शताब्दी में प्रसारित होने वाले सन्त मत की भूमिका
प्रस्तुत कर दी ।
निर्गुण भक्ति के प्रेरकों में से एक रामानन्द माने जाते हैं किंतु इनके पूर्व ही
सन्त नामदेव ने निर्गुण भक्ति का प्रचार पंजाब में प्रारम्भ किया था । जैसा कि ऊपर
उल्लेख हो चुका है, नामदेव महाराष्ट्र के वारकरी सम्प्रदाय के सन्त थे जिसमें सगुण
भक्ति प्रचलित थी । किन्तु नाथ पंथी विसोबा खेचर से दीक्षित होने के पश्चात् उनकी
प्रवृत्ति निर्गुण भक्ति की ओर हुई और तत्कालीन महाराष्ट्र और पंजाब में प्रचलित नाथ
पंथ का उन पर प्रभाव पड़ा । इस तरह निर्गुण पंथ के प्रवर्त्तक नामदेव ही हो सकते हैं
१. भक्ति द्राविड़ उपजी लाये रामानन्द ।
प्रगट किया कबीर ने सप्त द्वीप नव खण्ड ॥
२८६ नामदेव की हिन्दी कविता
अन्य कोई नही । आचार्य शुक्ल ने भी इस बात की पुष्टि की है ।१
श्री रामानन्द पर नामदेव का अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा होगा क्योकि रामानन्द ने
उसी परम्परा को आगे बढ़ाया । इस सम्बन्ध में डॉ० शं० गो० तुलपुले का मत
दृष्टव्य है ।२
डॉ० राममूर्ति त्रिपाठी का मत
'सम्मेलन पत्रिका'३ में प्रकाशित अपने 'निर्गुण मत के प्रवर्तक नामदेव या
कबीर' शीर्षक लेख के अन्त में डॉ० राममूर्ति त्रिपाठी ने निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत
किये है—
(१) जहाँ वारकरी-साधना सगुणोपासना द्वारा निर्गुण की प्राप्ति नाम
साधना से करती है वहाँ निर्गुण धारा गृह भक्ति द्वारा सीधे निर्गुण गति के लिए
'शब्द-साधना' करती है । इस स्थिति में नामदेव की वारकरी साधना-धारा निर्गुनियों
की साधना धारा से अपना कुछ वैशिष्ट्य रखती ही है और रखना भी चाहिए अन्यथा
साधना की भूमि पर दोनो का भेद जाता रहेगा । इस प्रकार निर्गुण सम्प्रदाय की प्रतिष्ठा
का श्रेय तो कबीर को ही दिया जाना चाहिए क्योकि उन्हों से इस धारा की अवि-
च्छिन्नता भी दृष्टिगोचर होती है ।
(२) नामदेव और कबीर के बीच एक दीर्घकालीन व्यवधान भी है ।
(३) सगुण का निरसन और निर्गुण पर बल-परिवेश और संस्कारो की दृष्टि
से जितना कबीर के साथ चिपकता है उतना नामदेव के साथ नही ।
(४) परम्परा उन्ही से निर्गुण साहित्य और साधको के लिए 'निर्गुण' संज्ञा का
प्रयोग करती आ रही है ।
१. 'नामदेव की रचना के आधार पर कहा जा सकता है कि निर्गुण पंथ के लिए
मार्ग निकालने वाले नाथ पंथ के जोगी और भक्त नामदेव थे ।'
—हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ० ७२ ।
२. 'भागवत धर्म का झंडा उत्तर में फहराने वाले नामदेव ही पहले सन्त थे । पंढरपुर
की भक्ति मार्ग की लहर उन्होंने सीधे पंजाब पहुँचाई और उससे ही आगे रामानंद,
कबीर, नानक, रैदास, पीपा आदि सन्त हुए ।'
—पांच सन्त कवी, पृ० १६१ ।
३. सम्मेलन पत्रिका भाग—५३, संख्या—१, २
—पौष-जेष्ठ—शक १८८६ ।
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्त्ता २८७
(५) नामदेव और कबीर के बीच की कड़ी जोड़ने वाली साधना को नामदेव
से प्राप्त कर आगे बढ़ाने वाला निर्गुण धारा में उस प्रकार नही मिलता जिस प्रकार
कबीर की साधना को आगे बढ़ाने वाले निर्गुण धारा में अविच्छिन्न रूप से मिलते है ।
(६) वारकरी साधक नामदेव से निर्गुंनिये साधको को पृथक् रखने का कारण
यह भी संभावित है कि जिस प्रकार 'भागवत' के प्रभाव में रहने वाले वारकरी सगुणो-
पासना द्वारा निर्गुण दशा की सातलम्ब उपलब्धि के बाद भी स्वरसतः द्वैत की कल्पित
भूमिका पर ज्ञानोत्तर भक्ति की धारा में मग्न रहना चाहते है, निर्गुनिया सन्त वैसा न
चाहते हो, उनका मार्ग भिन्न हो ।
डॉ० राममूर्ति त्रिपाठी के तर्क विचारणीय हैं परन्तु में समझता हूँ कि इनके
तर्कों से पूर्णतः सहमत नही हुआ जा सकता ।
(१) डॉ० राममूर्ति त्रिपाठी ने 'नाम साधना' और 'शब्द-साधना' को अलग-अलग
बतलाया है । इस प्रकार का वर्गीकरण वारकरी तथा निर्गुण साधना धाराओं के लिए
उचित नही है । दोनों में नाम साधना और शब्द साधना का महत्त्व है । वारकरी
सम्प्रदाय में कभी भी सगुण और निर्गुण नाम की दो स्तरो की उपासना-धारा नही
रही । निर्गुण धारा की अविच्छिन्नता ही एक मात्र निकष नही है जिसके आधार पर
कबीर को निर्गुण मत के प्रवर्तक होने का श्रेय मिले । हिंदी साहित्य के अधिकांश
विद्वानों और साहित्य के इतिहासकारो का झुकाव अब नामदेव को निर्गुण मत के आद्य
प्रवर्तक मानने के पक्ष में है ।
(२) नामदेव और कबीर के बीच दीर्घकालीन व्यवधान होने की बात, कोई
नई बात नहीं है । निर्गुण मत की सभी विशेषताएँ कबीर के पहले नामदेव में पाई
जाती है, इसका प्रमाण मिल रहा है ।
(३) 'सगुण का खण्डन' और 'निर्गुण पर बल' देने वाली बातें नामदेव की
हिन्दी रचनाओं में प्रचुर मात्रा में मिलती है, जिसका उल्लेख पहले किया जा चुका है ।
सगुण के खण्डन ओर निर्गुण के मण्डन पर नामदेव ने भी उतना ही बल दिया
है जितना कबीर ने ।
(४) परम्परा उन्हो (कबीर) से निर्गुण साहित्य और साधकों के लिए 'निर्गुण'
संज्ञा का प्रयोग करती आ रही है ।' डॉ० त्रिपाठी के इस आक्षेप के उत्तर में कहा जा
सकता है कि नामदेव ने अपनी बात कही । परवर्ती साधको ने उसे 'निर्गुण'
विचारधारा का नाम दिया । स्वयं नामदेव ने कभी नहीं कहा कि मैं निर्गुण काव्य लिख
रहा हूँ ।
(५) डॉ० त्रिपाठी के इस आक्षेप में भी कोई सार नहीं है कि कबीर से निर्गुण
धारा अविच्छिन्न रूप से बहती है परन्तु इस साधना धारा को नामदेव से प्राप्त कर
२८८ नामदेव की हिन्दी कविता
उसे आगे बढ़ाने वाला कोई नही मिलता। वस्तुतः नामदेव के पूर्व से ही इस धारा का
प्रवाह चला आ रहा था किन्तु हिन्दी में इसे लाने का श्रेय नामदेव को ही है।
नामदेव के अस्तित्व से तथा उनके प्रदेय से इनकार नही किया जा सकता।
नामदेव की हिंदी रचनाओ में इस साधना की सारी विशेषताएँ प्राप्त हैं नामदेव के
बाद इस धारा को अपनाने वाला न मिला हो पर वह धारा समाप्त नहीं हुई। कबीर
ने उसे अधिक पल्लवित किया। हो सकता है कि इस विचार-धारा का प्रचार करने
वाले कवि हुए हों, उन्होंने रचनाएँ भी की हों परन्तु दुर्भाग्य से इस प्रकार की रचनाएँ
प्राप्त नही होतीं।
(६) 'सुरत' आदि शब्दों का प्रयोग नामदेव में भी मिलता है। वे साधना की
उस अवस्था तक अवश्य पहुंचे थे जहाँ तक कबीर। वास्तव में बात यह है कि उनका
प्रारम्भ का मार्ग भिन्न था। वे सगुण से निर्गुण की ओर गये थे।
उद्देश्य दोनों का एक ही है—ब्रह्म की अनुभूति। दोनों की साधना-पद्धति में
अन्तर अवश्य है। नामदेव को प्रारम्भ में सगुण को अपनाना आवश्यक था। सगुणो-
पासना को अनुपयुक्तता प्रतीत होने पर उन्होंने निर्गुणोपासना को अपनाया। कबीर
पहले ही से निर्गुणोपासक थे।
उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह भली-भांति सिद्ध होता है कि डॉ० राममूर्ति
त्रिपाठी के तर्कों को ध्यान में रखकर नामदेव को निर्गुण मत का आद्य प्रवर्तक न मान-
कर कबीर को उसके प्रवर्तन का श्रेय देना अनुचित है। यह नामदेव के साथ सरासर
अन्याय है।
इस अध्याय के प्रारम्भ में आचार्य शुक्ल, आचार्य परशुराम चतुर्वेदी, आचार्य
विनयमोहन शर्मा, डॉ० पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल तथा डॉ० सरनामसिंह आदि संत साहित्य
के अध्येताओं के जो मत उद्धृत किये गये हैं उनसे स्पष्ट हो जाता है कि संत मत का
बीजारोपण नामदेव द्वारा हुआ। संत नामदेव द्वारा लगाई इस बेलि को कबीर ने
सींचा, विकसित किया और पुष्ट किया। आगे चलकर इस पथ के साथ कबीर
की असाधारण प्रतिभा ने अपना नाम अमर कर लिया और नामदेव का नाम पीछे पड़
गया। वास्तव में कबीर और निर्गुण पंथ अन्योन्याश्रित हो गए। यदि कबीर न होते
तो नामदेव द्वारा लगाई गई यह बेल सूख जाती।
किसी परम्परा को प्रारम्भ करना महत्त्वपूर्ण तो है ही, उससे भी महत्त्वपूर्ण है
उसे सबल और समर्थ बनाकर उसका विकास करना। संत पीपा ने निर्गुण पंथ तथा
संत मत के सम्बन्ध में दोनों—नामदेव और कबीर का महत्व समझा है। उन्होंने
दोनों को एक-सा ही पद प्रदान किया है।
संत पीपा कहते हैं—यदि कलि काल में नामदेव और कबीर न होते तो लोक,
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्त्ता २८६
वेद और कलियुग मिलकर भक्ति को रसातल पहुँचा देते । पंडितो ने तरह-तरह से
सगुण भक्ति की बातें कह कर जगत् को भरमाया और काया रोग बढ़ाया । गुरुमुख
से निर्गुण भक्ति का उपदेश न पाने से वक्ता और श्रोता दोनों भ्रम में पड़े। इसमें हम
जैसे पतित तो मार्गों की भूल भुलैया में भटकते ही रह जाते । त्रिगुणातीत भगवद् भक्ति
बिरला ही कोई पाता है । भक्ति का प्रताप रखने के लिए निज जन समझ उन्होंने स्वयं
उपदेश दिया जिससे पीपा को भी कुछ मिल गया ।१
पीपा का उपर्युक्त कथन सचमुच बड़े महत्त्व का है । निर्गुण भक्ति के लिए
नामदेव और कबीर का ही नाम लिया जा सकता है । नामदेव कबीर के पूर्ववर्ती होने
के कारण संत मत के प्रारम्भकर्त्ता कहे जायेंगे । अतः नि संकोच रूप से यह स्वीकार
किया जा सकता है कि हिंदी साहित्य में संत मत के प्रवर्तक नामदेव ही हैं ।
१. जो कलि नाम कबीर न होते ।
तौ लोक वेद अरु कलि जुग मिलि करि भगति रसातल देते ॥
हम से पतित कहौ क्या कहते, कौन प्रतीति मन धरते ।
नाना बरन देखि सुनी स्रवनौ बहुमारग अनुसरते ॥
नुगुणी भगति रहित भगवंता विरला कोई पावै ।
सोई कृपा करि देहु कृपानिधि नाम कबीरा गावै ॥
अपनी भगति काज हरि आपै, निज जन आप पठाया ।
नाम कबीरा सांच प्रकास्या, तहाँ पीपै कछु पाया ॥
—श्रवंगी (ह० लि० प्रति, पूना विश्वविद्यालय), पृ० ३१८ ।
१४
सप्तम अध्याय
नामदेव का तत्कालीन और परवर्ती साहित्य पर प्रभाव
नामदेव की पंजाब यात्रा का रहस्य
पंजाब की तत्कालीन परिस्थिति
नामदेव की महत्ता और उनकी रचनाओं का प्रसार
मध्ययुगीन नव जागरण के प्रणेता नामदेव
नामदेव का व्यक्तित्व
नामदेव की रचनाओं का प्रसार
हिंदी काव्य रचना का प्रयोजन
सिद्ध संप्रदाय और नाथ पंथ
सिद्धो तथा नाथों का नामदेव पर प्रभाव
नामदेव का समकालीन साहित्य पर प्रभाव
नामदेव का परवर्ती साहित्य पर प्रभाव
(१) ईश्वर की सर्वव्यापकता
(२) प्रत्यक्ष अनुभव से सत्यान्वेषण
(३) सद्गुरु-महत्त्व प्रतिपादन
(४) सुमिरन—नामस्मरण का महत्त्व
(५) बाह्याचारों की व्यर्थता
(६) अनन्य प्रेम भावना
(७) कर्म और अध्यात्म भावना का समन्वय
(८) भेदभाव विहीनता
(९) ब्रह्म की निर्गुणता
(१०) करनी तथा कथनी में एकता
(११) भक्त की भगवान के प्रति मिलन उत्कंठा
नामदेव का तत्कालीन और परवर्ती
साहित्य पर प्रभाव
नामदेव की पंजाब यात्रा का रहस्य
प्रायः नामदेव के संबंध में यह प्रश्न उठाया जाता है कि वे महाराष्ट्र छोड़कर
पंजाब क्यों गये ? क्या वे केवल भ्रमण के लिए गये थे अथवा इस भ्रमण के पीछे उनका
कोई विशेष अभिप्राय था ? इसके अनेक कारण हो सकते हैं। वास्तव में बात यह है
कि नामदेव एक जागरूक संत थे। भागवत धर्म के महान् प्रचारक थे। इस भागवत
धर्म के उपदेशों की निधि उनके हाथ आयी थी। अथवा उसके संदेश से वे भली भांति
परिचित हो चुके थे और अब उसका प्रचार और प्रसार करना चाहते थे।¹ उन्हे समाज
के लोक तथा परलोक की चिंता थी। मेरे विचार से अपनी पहली यात्रा में जब उन्होंने
इस बात का अनुभव किया कि उत्तर में धर्म और संस्कृति का ह्रास हो रहा है तो
उन्होंने उत्तर में जाकर वहाँ की जनता को जाग्रत करने का निश्चय किया। अन्यथा वे
पंढरी के विट्ठल को छोड़कर उत्तर कभी न जाते।
पंजाब की तत्कालीन परिस्थिति
इतिहास इस बात का साक्षी है कि विदेशी आक्रमणों के आघात सब से अधिक
पंजाब को ही सहने पड़े हैं। भ्रमण करते करते नामदेव जब पंजाब पहुँचे तब उन्होंने
देखा कि विदेशी के बढ़ते प्रभाव के कारण भारतीय संस्कृति को धोखा निर्माण हो गया
है। यदि नामदेव और उनसे प्रेरणा-प्राप्त गुरु नानक यदि पंजाब को अपना कार्य क्षेत्र
न बनाते तो देश के बटवारे के बाद पंजाब का जो हिस्सा आज भारत में है उससे भी
हमें हाथ धोना पड़ता।
१. आम्हा सापडले वर्म। करूं भागवत धर्म ॥
—श्रीनामदेवगाथा, अभंग १४०३ ।
(महाराष्ट्र शासन प्रकाशन)
२६४ नामदेव की हिन्दी कविता
नामदेव के समय पंजाब की परिस्थिति अत्यंत प्रतिकूल थी। ६५७ ई० में
महाराज हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात् साम्राज्य की परंपरा समाप्त हो गई। देश अनेक
राज्यो में बँट गया जो पारस्परिक द्वेष और संघर्ष के कारण विदेशी आक्रमणो को
विफल करने में असमर्थ रहे। क्षात्र-वृत्ति, पराकोटि की कमजोर, स्वार्थ परायण और
विषयासक्त हो गई थी। आपस के बैर तथा अधिकार प्राप्ति के लिए विदेशियों की
सहायता लेकर वह आत्मनाश कर रही थी। १२ वीं शताब्दी के अंत में पृथ्वीराज तथा
जयचंद के आपस के बैर के कारण पंजाब को इन्ही परिस्थितियों में से गुजरना पड़ा।
ऐसी विषम परिस्थितियों में अपनी प्राचीन तथा सर्वश्रेष्ठ संस्कृति की रक्षा का महान्
उत्तरदायित्व निर्भय तथा त्यागी संतों का होता है।
भागवत धर्म का अर्थात् भारतीय संस्कृति के परिणत स्वरूप का उत्तर की ओर
प्रचार करने वाले नामदेव पहले संत है। उनको भारतीय संस्कृति की रक्षा तथा संवर्धन
करना था। यह कार्य उन्होंने नाम संकीर्तन¹ द्वारा संपन्न किया। राजनीति की अपेक्षा
मानवता का पुरस्कार करने वाला संस्कृति की रक्षा उनकी दृष्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण
थी। अतः उन्होंने स्थायी रूप से पंजाब में रहने का निश्चय किया हो।
ऊपर इस बात का उल्लेख हो चुका है कि भारत के अन्य स्थानों की अपेक्षा
पंजाब में विदेशियों के द्वारा भारतीय धर्म और संस्कृति को अधिक खतरा था। अतः
नामदेव ने पंजाब को अपना कार्य क्षेत्र बनाने का निश्चय किया हो। उन्होंने अपनी
रचनाओं द्वारा इस बात का आग्रह किया कि लोग अपना मनोबल कायम रखें तथा
आडम्बर-रहित जीवन बितायें। यही कारण है कि नामदेव ने संत के नाते बहुत उच्च
कोटि की मान्यता प्राप्त की तथा उनकी रचनाओं का बहुत सम्मान किया गया।
नामदेव की महत्ता और उनकी रचनाओं का प्रसार
नामदेव की महत्ता का प्रमाण इसी से मिलता है कि महाराष्ट्र के उनके सम
कालीन तथा परवर्ती संतों ने उनका बड़े आदर के साथ स्मरण किया है।
संत तुकाराम की शिष्या संत बहिणाबाई का निम्नलिखित अभंग बहुत प्रसिद्ध
है जिसका भाव इस प्रकार है—
'ज्ञानदेव ने भागवत धर्म के मंदिर की नींव (पाया) अपनी 'ज्ञानेश्वरी' के
द्वारा डाली। नामदेव ने ज्ञानेश्वर द्वारा प्रस्थापित वारकरी पंथ का अपने अभंगों द्वारा
१, नाचू कीर्तनाचे रंगी। ज्ञानदीप लावूं जगी।
—श्रीनामदेवरायांची सार्थ गाथा (भाग तीसरा)
अभंग १५६, पृ० १८६ ।
नामदेव का साहित्य पर प्रभाव २६५
विस्तार किया। एकनाथ ने अपने 'भागवत' की पताका फहराई और तुकाराम ने
अभंगों की रचना कर इसके ऊपर कलश स्थापन किया।"१
संत ज्ञानेश्वर नामदेव की काव्य-कला के विषय में लिखते हुए कहते हैं—'नाम-
देव में कथन मात्र नहीं कवित्व है—उसका रस अद्भुत और निरुपम है।'२
एक अन्य स्थल पर वे लिखते हैं—'हे नामदेव ! तेरी रचना सागर से भी
अगाध तथा सरस है। वह रस-सिक्त है। उसे सुनने के लिए मेरा मन अधीर हो रहा
है। अविलम्ब मुझे अपनी कोई रचना सुना।'३
नामदेव के यहाँ की दासी संत जनाबाई ने नामदेव के आध्यात्मिक ऋण को सहर्ष
स्वीकार किया है। वे कहती हैं कि मेरे माता-पिता नामदेव धन्य हैं। उन्होंने मुझे
पंढरीराया के दर्शन कराये।४
नामदेव की मधुर वाणी का वर्णन करते हुए उनके शिष्य परिसा भागवत कहते
हैं—'नामदेव की अमृत-मधुर वाणी दूध की मलाई के समान है। उसका वर्णन करने
में मैं असमर्थ हूँ।'५
१. संत कृपा झाली । इमारत फळा आली ॥
ज्ञानदेवे रचिला पाया । उभारिले देवालय ॥
नामा तयाचा किंकर । तेणे केला हा विस्तार ॥
जनार्दन एकनाथ । ध्वज उभारिला भागवत ॥
भजन करा सावकाश । तुका झाला ये कलस ॥ —भागवत संप्रदाय, पृष्ठ ५७२ ।
२. भक्त भागवत बहुतसाल ऐकिले । बहु होऊनी गेले होती पुढे ॥
परी नामयाचे बोलणे नव्हे हे कवित्व । हा रस अद्भुत निरुपमु ॥
—सकल संत गाथा, पृष्ठ ८७, अभंग ६२७ ।
३. सिंधुहूनि सखोल सुरस तुझे बोल । आनंदाची बोल नित्य नवी ॥
ते मज सादर ऐकवी सत्वर । श्रवण क्षुधातुर झाले माझे ॥
—सकल संत गाथा, पृष्ठ ८७, अभंग ६२५ ।
४. धन्य माय बाप नामदेव माझा । तेणे पंढरी राया दाखविले ॥
—सकल संत गाथा, भाग छठा, जनाबाई के अभंग, अभंग ७८ ।
५. कवित्वा परीस कवित्व आगले पै आहे ।
परि तें न कळे सोय नामयाची ॥
दुधावरोल साय तें मी वाणू काय ।
तैसे गाणे गाय नामदेव ॥
—सकल संत गाथा, अभंग १, परिसा भागवत के अभंग ।
२६१ नामदेव की हिन्दी कविता
संत तुकाराम ने भी नामदेव को अपने काव्य का प्रेरणा स्रोत बताया है ।¹
संत निलोबा राय ने अन्य संतों के साथ नामदेव का सादर स्मरण किया ।²
नामदेव के पदों के कवित्व के सम्बन्ध में स्वर्गीय प्रोफेसर वासुदेव बलवन्त
पटवर्धन ने बंबई विश्वविद्यालय की विल्सन फायलॉलाजिकल व्याख्यान-माला में ये
विचार प्रकट किये थे—
'नामदेव की कविता में हमें उस प्रकाश के रोमांस का अनुभव होता है जो
समुद्र या धरती पर कभी नहीं उतरा, उस स्वप्न के दर्शन होते हैं जो इस मिट्टी की
धरती पर कभी नहीं झलका । उस प्रेम की प्रतीति होती है जिसने कभी वासना को
उत्तेजित नहीं किया । उसमें तो करुणा, विश्वास और भक्ति का 'रोमांस' है तथा मानव-
आत्मा का प्रेम तथा परमात्म शक्ति के प्रति आत्मसमर्पण है । उसमें हम भक्ति अथवा
आध्यात्मिक प्रेम का रोमांस, हृदय का हृदय के प्रति संगीतमय निवेदन और उद्वेलित
भावातुर हृदय के उद्गार पाते हैं ।'³
१. नामदेवें केले स्वप्नामाजी जागे । सवें पांडुरंगे येऊनियां ॥
सांगीतले काम करावें कवित्व । वाउगे निमित्त बोलो नये ॥
—तुकारामाचा गाथा, अभंग ३७३३ ।
२. निवृत्ती ज्ञानेश्वर सोपान । नामा सजंना जाल्हण ॥
कूर्मा विसोबा खेचर । सावता चांगा वटेश्वर ॥
कबीर सेना सूरदास । नरसी मेहेता भानुदास ॥
निला म्हणे जनार्दन एका । देवचि होऊन ठेला तुका ॥
—सकल संत गाथा, संत माहात्म्य ।
3 Here we have the Romance of a light that never was on sea or
land, of a dream that never settled on the world of clay, of love
that never stirred the passion of sex Here is the Romance of
the piety, of faith and devotion of surrender of human soul in
the love, the light and the life of the ultimate being It is a
Romance of Bhakti or Spiritual love that we have here It is
the heart's song to the heart It is the outburst of the contents
of the heart under excitement when the heart is touched or
stirred or thrilled or roused into passionate life '
—श्रीनामदेवचरित्र (पुनर्मुद्रण १६५२) रं० ह० भालुकर ।
प्रस्तावना (पृ० ७४ ७५) से उद्धृत