सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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उसे आगे बढ़ाने वाला कोई नही मिलता। वस्तुतः नामदेव के पूर्व से ही इस धारा का
प्रवाह चला आ रहा था किन्तु हिन्दी में इसे लाने का श्रेय नामदेव को ही है।
नामदेव के अस्तित्व से तथा उनके प्रदेय से इनकार नही किया जा सकता।
नामदेव की हिंदी रचनाओ में इस साधना की सारी विशेषताएँ प्राप्त हैं नामदेव के
बाद इस धारा को अपनाने वाला न मिला हो पर वह धारा समाप्त नहीं हुई। कबीर
ने उसे अधिक पल्लवित किया। हो सकता है कि इस विचार-धारा का प्रचार करने
वाले कवि हुए हों, उन्होंने रचनाएँ भी की हों परन्तु दुर्भाग्य से इस प्रकार की रचनाएँ
प्राप्त नही होतीं।
(६) 'सुरत' आदि शब्दों का प्रयोग नामदेव में भी मिलता है। वे साधना की
उस अवस्था तक अवश्य पहुंचे थे जहाँ तक कबीर। वास्तव में बात यह है कि उनका
प्रारम्भ का मार्ग भिन्न था। वे सगुण से निर्गुण की ओर गये थे।
उद्देश्य दोनों का एक ही है—ब्रह्म की अनुभूति। दोनों की साधना-पद्धति में
अन्तर अवश्य है। नामदेव को प्रारम्भ में सगुण को अपनाना आवश्यक था। सगुणो-
पासना को अनुपयुक्तता प्रतीत होने पर उन्होंने निर्गुणोपासना को अपनाया। कबीर
पहले ही से निर्गुणोपासक थे।
उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह भली-भांति सिद्ध होता है कि डॉ० राममूर्ति
त्रिपाठी के तर्कों को ध्यान में रखकर नामदेव को निर्गुण मत का आद्य प्रवर्तक न मान-
कर कबीर को उसके प्रवर्तन का श्रेय देना अनुचित है। यह नामदेव के साथ सरासर
अन्याय है।
इस अध्याय के प्रारम्भ में आचार्य शुक्ल, आचार्य परशुराम चतुर्वेदी, आचार्य
विनयमोहन शर्मा, डॉ० पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल तथा डॉ० सरनामसिंह आदि संत साहित्य
के अध्येताओं के जो मत उद्धृत किये गये हैं उनसे स्पष्ट हो जाता है कि संत मत का
बीजारोपण नामदेव द्वारा हुआ। संत नामदेव द्वारा लगाई इस बेलि को कबीर ने
सींचा, विकसित किया और पुष्ट किया। आगे चलकर इस पथ के साथ कबीर
की असाधारण प्रतिभा ने अपना नाम अमर कर लिया और नामदेव का नाम पीछे पड़
गया। वास्तव में कबीर और निर्गुण पंथ अन्योन्याश्रित हो गए। यदि कबीर न होते
तो नामदेव द्वारा लगाई गई यह बेल सूख जाती।
किसी परम्परा को प्रारम्भ करना महत्त्वपूर्ण तो है ही, उससे भी महत्त्वपूर्ण है
उसे सबल और समर्थ बनाकर उसका विकास करना। संत पीपा ने निर्गुण पंथ तथा
संत मत के सम्बन्ध में दोनों—नामदेव और कबीर का महत्व समझा है। उन्होंने
दोनों को एक-सा ही पद प्रदान किया है।
संत पीपा कहते हैं—यदि कलि काल में नामदेव और कबीर न होते तो लोक,