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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 279, कुल 332 में से

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पृष्ठ 279

नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २८५
में निम्नलिखित दोहा प्रचलित है ।१ परन्तु द्रविड़ देश में जो भक्ति उत्पन्न हुई थी उसका
वही रूप नहीं है जो कबीर आदि निर्गुण संतों में प्राप्त होता है । रामानन्द ने रामा-
नुजाचार्य के भक्ति सिद्धांतों को उत्तर भारत में अनेक प्रयोगों के साथ प्रस्तुत किया ।
दक्षिण से उत्तर की ओर आने में भक्ति को अनेक बाधाओं का सामना करना
पड़ा । पहली बाधा शैव संप्रदाय की थी । अपनी उत्तर की यात्रा में भक्ति की लहर
जब महाराष्ट्र में पहुँची तो वहाँ शैव संप्रदाय का प्रभाव वर्तमान था । 'ज्ञानेश्वरी' के
रचयिता संत ज्ञानेश्वर स्वयं नाथ पंथ के अनुयायी थे । वे गुरु गोरखनाथ की परम्परा
में हुए ।
ज्ञानेश्वर के समकालीन संत नामदेव ने विट्ठल की उपासना की जिसमें नाम-
स्मरण का अत्यधिक महत्त्व है । यह विट्ठल संप्रदाय सन् १२०६ (सं० १२६६) के लग-
भग पंढरपुर में प्रचारित हुआ । इसके प्रचारक कन्नड़ संत पुंडलिक कहे जाते हैं । यह
विट्ठल संप्रदाय वैष्णव और शैव संप्रदायों का मिश्रित रूप है । इस संप्रदाय के इष्टदेव
विट्ठल एक सर्वव्यापी ब्रह्म के प्रतीक बनकर समस्त महाराष्ट्र के आराध्य बन गए । ऐसा
ज्ञात होता है कि आठवीं शताब्दी के शैव धर्म से ग्यारहवीं शताब्दी के वैष्णव धर्म का
समझौता विट्ठल संप्रदाय के रूप में हुआ जिसके सब से बड़े संत नामदेव हुए । विट्ठल
संप्रदाय के अन्तर्गत होते हुए भी नामदेव ने मूर्तिपूजा पर बल न देकर नाम स्मरण पर
ही अधिक बल दिया ।
इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि उत्तर भारत में सन्त मत का जो उत्थान
वैष्णव भक्ति को लेकर हुआ था उसका पूर्वार्द्ध महाराष्ट्र में विट्ठल सम्प्रदाय के सन्तो
द्वारा प्रस्तुत हो चुका था जिनमें ज्ञानेश्वर और नामदेव प्रमुख थे । अपनी उत्तर भारत
की यात्रा में इन दोनों ने १५वीं शताब्दी में प्रसारित होने वाले सन्त मत की भूमिका
प्रस्तुत कर दी ।
निर्गुण भक्ति के प्रेरकों में से एक रामानन्द माने जाते हैं किंतु इनके पूर्व ही
सन्त नामदेव ने निर्गुण भक्ति का प्रचार पंजाब में प्रारम्भ किया था । जैसा कि ऊपर
उल्लेख हो चुका है, नामदेव महाराष्ट्र के वारकरी सम्प्रदाय के सन्त थे जिसमें सगुण
भक्ति प्रचलित थी । किन्तु नाथ पंथी विसोबा खेचर से दीक्षित होने के पश्चात् उनकी
प्रवृत्ति निर्गुण भक्ति की ओर हुई और तत्कालीन महाराष्ट्र और पंजाब में प्रचलित नाथ
पंथ का उन पर प्रभाव पड़ा । इस तरह निर्गुण पंथ के प्रवर्त्तक नामदेव ही हो सकते हैं
१. भक्ति द्राविड़ उपजी लाये रामानन्द ।
प्रगट किया कबीर ने सप्त द्वीप नव खण्ड ॥