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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 283, कुल 332 में से

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पृष्ठ 283

नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्त्ता २८६
वेद और कलियुग मिलकर भक्ति को रसातल पहुँचा देते । पंडितो ने तरह-तरह से
सगुण भक्ति की बातें कह कर जगत् को भरमाया और काया रोग बढ़ाया । गुरुमुख
से निर्गुण भक्ति का उपदेश न पाने से वक्ता और श्रोता दोनों भ्रम में पड़े। इसमें हम
जैसे पतित तो मार्गों की भूल भुलैया में भटकते ही रह जाते । त्रिगुणातीत भगवद् भक्ति
बिरला ही कोई पाता है । भक्ति का प्रताप रखने के लिए निज जन समझ उन्होंने स्वयं
उपदेश दिया जिससे पीपा को भी कुछ मिल गया ।१
पीपा का उपर्युक्त कथन सचमुच बड़े महत्त्व का है । निर्गुण भक्ति के लिए
नामदेव और कबीर का ही नाम लिया जा सकता है । नामदेव कबीर के पूर्ववर्ती होने
के कारण संत मत के प्रारम्भकर्त्ता कहे जायेंगे । अतः नि संकोच रूप से यह स्वीकार
किया जा सकता है कि हिंदी साहित्य में संत मत के प्रवर्तक नामदेव ही हैं ।

१. जो कलि नाम कबीर न होते ।
तौ लोक वेद अरु कलि जुग मिलि करि भगति रसातल देते ॥
हम से पतित कहौ क्या कहते, कौन प्रतीति मन धरते ।
नाना बरन देखि सुनी स्रवनौ बहुमारग अनुसरते ॥
नुगुणी भगति रहित भगवंता विरला कोई पावै ।
सोई कृपा करि देहु कृपानिधि नाम कबीरा गावै ॥
अपनी भगति काज हरि आपै, निज जन आप पठाया ।
नाम कबीरा सांच प्रकास्या, तहाँ पीपै कछु पाया ॥
—श्रवंगी (ह० लि० प्रति, पूना विश्वविद्यालय), पृ० ३१८ ।
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