सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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अन्य कोई नही । आचार्य शुक्ल ने भी इस बात की पुष्टि की है ।१
श्री रामानन्द पर नामदेव का अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा होगा क्योकि रामानन्द ने
उसी परम्परा को आगे बढ़ाया । इस सम्बन्ध में डॉ० शं० गो० तुलपुले का मत
दृष्टव्य है ।२
डॉ० राममूर्ति त्रिपाठी का मत
'सम्मेलन पत्रिका'३ में प्रकाशित अपने 'निर्गुण मत के प्रवर्तक नामदेव या
कबीर' शीर्षक लेख के अन्त में डॉ० राममूर्ति त्रिपाठी ने निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत
किये है—
(१) जहाँ वारकरी-साधना सगुणोपासना द्वारा निर्गुण की प्राप्ति नाम
साधना से करती है वहाँ निर्गुण धारा गृह भक्ति द्वारा सीधे निर्गुण गति के लिए
'शब्द-साधना' करती है । इस स्थिति में नामदेव की वारकरी साधना-धारा निर्गुनियों
की साधना धारा से अपना कुछ वैशिष्ट्य रखती ही है और रखना भी चाहिए अन्यथा
साधना की भूमि पर दोनो का भेद जाता रहेगा । इस प्रकार निर्गुण सम्प्रदाय की प्रतिष्ठा
का श्रेय तो कबीर को ही दिया जाना चाहिए क्योकि उन्हों से इस धारा की अवि-
च्छिन्नता भी दृष्टिगोचर होती है ।
(२) नामदेव और कबीर के बीच एक दीर्घकालीन व्यवधान भी है ।
(३) सगुण का निरसन और निर्गुण पर बल-परिवेश और संस्कारो की दृष्टि
से जितना कबीर के साथ चिपकता है उतना नामदेव के साथ नही ।
(४) परम्परा उन्ही से निर्गुण साहित्य और साधको के लिए 'निर्गुण' संज्ञा का
प्रयोग करती आ रही है ।
१. 'नामदेव की रचना के आधार पर कहा जा सकता है कि निर्गुण पंथ के लिए
मार्ग निकालने वाले नाथ पंथ के जोगी और भक्त नामदेव थे ।'
—हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ० ७२ ।
२. 'भागवत धर्म का झंडा उत्तर में फहराने वाले नामदेव ही पहले सन्त थे । पंढरपुर
की भक्ति मार्ग की लहर उन्होंने सीधे पंजाब पहुँचाई और उससे ही आगे रामानंद,
कबीर, नानक, रैदास, पीपा आदि सन्त हुए ।'
—पांच सन्त कवी, पृ० १६१ ।
३. सम्मेलन पत्रिका भाग—५३, संख्या—१, २
—पौष-जेष्ठ—शक १८८६ ।