सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 269, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २७५
'हे नरहरि । मैं तुम्हारा सेवक हूँ, आवागौन के फेर से मुझे मुक्त करो ।'१
'नामदेव का स्वामी नरहरि खंभे में से प्रगट हुआ ।'२
'मुक्ति मिलने पर तथा नाम का उच्चारण करने पर स्वामी और सेवक (भक्त
और भगवान्) साथ रहे ।'३
'देवता मैले हैं, गंगाजल भी अशुद्ध है। केवल नामदेव के स्वामी निर्मल हैं,
शुद्ध है ।'४
कबीर ने भी सेव्य-सेवक भाव पर विशेष जोर दिया है। भगवान् के प्रति कबीर
का आत्मसमर्पण देखने योग्य है। वे कहते हैं—'हे स्वामी। मै तुम्हारा गुलाम हूँ। तू
मुझे जहाँ चाहे बेच डाल। तूने तो मुझे ऐसे हाट में उतार दिया है जहाँ पर तू ही
गाहक है और बेचनेवाला भी तू ही है ।'५
कबीर के विनयभाव की उत्कृष्टता अवलोकनीय है। कबीर कहते हैं—'मैं राम
का स्वामिभक्त कुत्ता हूँ और मेरा नाम मोती है। मेरे गले में राम नाम की रस्सी है
अर्थात् राम के प्रेम की रस्सी से मैं बँधा हूँ। जिधर राम मुझे खींचता है उधर ही मैं
चलता हूँ ।'६
१. नामदेव कहै मैं सेवक तेरा ।
आवा गवण निवारि हो नरहरी ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १६७ ।
२. खंभा मांहि प्रगट्यो हरी । नामदेव को स्वामी नरहरी ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १२७ ।
३. मुक्ति भऐला जाप जपेला । सेवक स्वामो संग रहेला ॥
संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ४५ ।
४. मैला सुर मैली सुरसरी । नामदेव कौ ठाकुर निरमल हरी ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १२१ ।
५. मैं गुलाम मोहि बेचि गुसाईं ।
तन मन धन मेरा रामजी के तांईं ॥ टेक ॥
आनि कबीरा हाटि उतारा ।
सोई गाहक सोई बेचनहारा ॥
—कबीर ग्रंथावली पृष्ठ १२४ ।
६. कबीर कूता राम का मुतिया मेरा नाउ ।
गले राम की जेवड़ी जित खेंचे तित जाऊँ ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ २० ।