सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 270, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ें२७६ नामदेव की हिंदी कविता
'हे रामजी ! आप पर मेरा दृढ़ विश्वास है। फिर मैं और किसी का निहोरा
क्यों करूँ ? रामचंद्रजी जैसा जिसका स्वामी हो वह और को क्यों पुकारे ?'¹
मैं उस समर्थ का सेवक हूँ जो महान् और असीम है, इसी कारण मेरा अनर्थ
नहीं हो सकता। यदि पतिव्रता नंगी रहे तो ईश्वर के लिए बड़ी लज्जा का विषय
होगा।'²
'मेरा ठाकुर, मेरा स्वामी ऐसा भक्तवत्सल है कि उसकी शरण में जाने पर वह
अपने भक्तों का उद्धार करता है।'³
ऊपर नामदेव तथा कबीर दोनों की रचनाओं में समान रूप से पाई जाने वाली
निर्गुण पक्ष की जो विशेषताएँ बताई गई हैं उनसे नामदेव और उनकी रचनाओं का
कबीर और उनकी बानी पर प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। संत मत की ये सभी विशेष-
ताएँ कबीर को नामदेव से उत्तराधिकार में मिली थीं।
संत नामदेव का निर्गुण भक्ति की ओर झुकाव पंजाब आने के पूर्व संत ज्ञाने-
श्वर के संपर्क से हो चुका था। पंजाब में इसके लिए उपयुक्त वातावरण मिला। अतः
उनकी निर्गुण भक्ति खूब विकसित हुई, जिसकी अभिव्यक्ति उनके हिंदी पदों में है।
यहाँ मैं एक बात की ओर संकेत करना चाहता हूँ और वह यह कि नामदेव के हिंदी
पदों में उनके परिपक्व अनुभव साधना के संबंध में प्रौढ़ विचार और आध्यात्मिक
समन्वयवाद का स्पष्ट निखार है। इनके मराठी अभंगों में वर्णनात्मकता अधिक है और
जहाँ भावुकता अधिक है वहीं भक्ति की विह्वलता है परंतु हिंदी पदों में आत्मानुभूति
तथा ज्ञान और भक्ति का वह सुंदर पाग है जो स्वाद लेने वाले के लिए गूँगे के गुड़
की तरह है।
वस्तुतः देखा जाय तो नामदेव की हिंदी रचना का क्षेत्र बहुत विशाल है।
१ अब मोहि राम भरोसा तेरा।
ओर कोन का करौं निहोरा ॥ टेक ॥
जाके राम सरीखा साहिब भाई।
सो क्यूँ अनत पुकारन जाई ॥
—कबीर ग्रन्थावली पद १२२, पृष्ठ १२७।
२ उस सम्रथ का दास हौं कदे न होइ अकाज।
पतिव्रता नांगी रहे तो उसकी पुरिस को लाज ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ २०।
३. दास कबीर को ठाकुर ऐसो भगत की सरन उबारे।
—कबीर ग्रन्थावली, पद १२२, पृष्ठ १२७।