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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 281, कुल 332 में से

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पृष्ठ 281

नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्त्ता २८७
(५) नामदेव और कबीर के बीच की कड़ी जोड़ने वाली साधना को नामदेव
से प्राप्त कर आगे बढ़ाने वाला निर्गुण धारा में उस प्रकार नही मिलता जिस प्रकार
कबीर की साधना को आगे बढ़ाने वाले निर्गुण धारा में अविच्छिन्न रूप से मिलते है ।
(६) वारकरी साधक नामदेव से निर्गुंनिये साधको को पृथक् रखने का कारण
यह भी संभावित है कि जिस प्रकार 'भागवत' के प्रभाव में रहने वाले वारकरी सगुणो-
पासना द्वारा निर्गुण दशा की सातलम्ब उपलब्धि के बाद भी स्वरसतः द्वैत की कल्पित
भूमिका पर ज्ञानोत्तर भक्ति की धारा में मग्न रहना चाहते है, निर्गुनिया सन्त वैसा न
चाहते हो, उनका मार्ग भिन्न हो ।
डॉ० राममूर्ति त्रिपाठी के तर्क विचारणीय हैं परन्तु में समझता हूँ कि इनके
तर्कों से पूर्णतः सहमत नही हुआ जा सकता ।
(१) डॉ० राममूर्ति त्रिपाठी ने 'नाम साधना' और 'शब्द-साधना' को अलग-अलग
बतलाया है । इस प्रकार का वर्गीकरण वारकरी तथा निर्गुण साधना धाराओं के लिए
उचित नही है । दोनों में नाम साधना और शब्द साधना का महत्त्व है । वारकरी
सम्प्रदाय में कभी भी सगुण और निर्गुण नाम की दो स्तरो की उपासना-धारा नही
रही । निर्गुण धारा की अविच्छिन्नता ही एक मात्र निकष नही है जिसके आधार पर
कबीर को निर्गुण मत के प्रवर्तक होने का श्रेय मिले । हिंदी साहित्य के अधिकांश
विद्वानों और साहित्य के इतिहासकारो का झुकाव अब नामदेव को निर्गुण मत के आद्य
प्रवर्तक मानने के पक्ष में है ।
(२) नामदेव और कबीर के बीच दीर्घकालीन व्यवधान होने की बात, कोई
नई बात नहीं है । निर्गुण मत की सभी विशेषताएँ कबीर के पहले नामदेव में पाई
जाती है, इसका प्रमाण मिल रहा है ।
(३) 'सगुण का खण्डन' और 'निर्गुण पर बल' देने वाली बातें नामदेव की
हिन्दी रचनाओं में प्रचुर मात्रा में मिलती है, जिसका उल्लेख पहले किया जा चुका है ।
सगुण के खण्डन ओर निर्गुण के मण्डन पर नामदेव ने भी उतना ही बल दिया
है जितना कबीर ने ।
(४) परम्परा उन्हो (कबीर) से निर्गुण साहित्य और साधकों के लिए 'निर्गुण'
संज्ञा का प्रयोग करती आ रही है ।' डॉ० त्रिपाठी के इस आक्षेप के उत्तर में कहा जा
सकता है कि नामदेव ने अपनी बात कही । परवर्ती साधको ने उसे 'निर्गुण'
विचारधारा का नाम दिया । स्वयं नामदेव ने कभी नहीं कहा कि मैं निर्गुण काव्य लिख
रहा हूँ ।
(५) डॉ० त्रिपाठी के इस आक्षेप में भी कोई सार नहीं है कि कबीर से निर्गुण
धारा अविच्छिन्न रूप से बहती है परन्तु इस साधना धारा को नामदेव से प्राप्त कर