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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 274, कुल 332 में से

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पृष्ठ 274

२८० नामदेव की हिन्दी कविता
के विद्वानों में इस काल के संबंध में कोई मतभेद नहीं है। कुछ विद्वानों ने हिंदी कविता
में वर्णित घटनाओं के आधार पर नामदेव का काल कुछ बाद में खींचने का प्रयत्न
किया है।
डॉ० मोहनसिंह 'दीवाना' ने अपनी पुस्तक 'भक्त शिरोमणि नामदेव' की नई
जीवनी, नई पदावली, में नामदेव के काल को ई० स० १३६० और १४५० के बीच
माना है। इसका आधार उन्होंने नामदेव का मृत गाय जिलानेवाला पद¹ माना है।
इस संदर्भ में डॉ० राजनारायण मौर्य का मत दृष्टव्य है।²
डॉ० मोहनसिंह ने फिरोजशाह बहमनी को ही वह सुलतान माना है जिसने
नामदेव को मृत गाय जिलाने की आज्ञा दी थी। वह दक्षिण में था और उसका काल
सन् १३६७ से १४२२ ई० के मध्य का है। अन्य फिरोज सुलतान फिरोज शाह खिलजी
(राज्य काल सन् १२८२ से १२६६ तक) के साथ नामदेव के काल का मेल नहीं बैठता
और फिरोज शाह तुगलक (राज्य काल १३५१ ई० से १३८८ ई० तक) के साथ स्थान
का मेल नहीं बैठता क्योंकि फिरोज शाह न तो दक्षिण में आया था और न संत नामदेव
दिल्ली ही गये थे। अत इसी आधार पर डॉ० मोहनसिंह ने नामदेव का काल खींचकर
आगे बढ़ा दिया है। उन्होंने एक और तर्क दिया है। वह है संत नामदेव का रामानन्द
का शिष्य होना। वे रामानन्द का जन्म सन् १४२० और ३० ई० के बीच तथा कबीर
का सन् १४५० और ६० ई० के बीच मानते हैं।
डॉ० मोहनसिंह के इन दोनों तर्कों में कोई तथ्य नहीं है। इसका तो कहीं उल्लेख
भी नहीं है कि रामानन्द नामदेव के गुरु थे। महाराष्ट्र और हिंदी साहित्य में भी यह
१ सुलतानु पूछे सुनु बे नामा। देखउ राम तुम्हारे कामा॥
—गुरु ग्रन्थ साहब, नामदेव के हिंदी पद, पद ४७।
२. 'यहाँ एक बात विशेष उल्लेखनीय है कि डॉ० मोहनसिंह ने गुरु ग्रंथ साहब के
जिस पद के आधार पर गाय जिलाने की घटना का जिक्र किया है वह पद नामदेव
रचित मानने में मुझे संदेह है। काशी नागरी प्रचारिणी सभा में मुझे एक हस्त
लिखित संतों की परचई प्राप्त हुई है जिसमें नामदेव की भी परचई है। इसका
लिपिकाल स० १७४० और रचयिता कृष्णानंद हरीदास हैं। नामदेव की परचई
में (जो दोहे और चौपाई में है) मृत गाय जिलाने का वर्णन है जिसकी शब्दावली
गुरु ग्रंथ साहब के इस पद से बहुत मिलती जुलती है। भाषा और वर्ण्य विषय की
दृष्टि से भी यह पद संदेहात्मक है।'
—हिंदुस्तानी (जनवरी १९६२), पृष्ठ ११२।