सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६४ नामदेव की हिन्दी कविता
नामदेव के समय पंजाब की परिस्थिति अत्यंत प्रतिकूल थी। ६५७ ई० में
महाराज हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात् साम्राज्य की परंपरा समाप्त हो गई। देश अनेक
राज्यो में बँट गया जो पारस्परिक द्वेष और संघर्ष के कारण विदेशी आक्रमणो को
विफल करने में असमर्थ रहे। क्षात्र-वृत्ति, पराकोटि की कमजोर, स्वार्थ परायण और
विषयासक्त हो गई थी। आपस के बैर तथा अधिकार प्राप्ति के लिए विदेशियों की
सहायता लेकर वह आत्मनाश कर रही थी। १२ वीं शताब्दी के अंत में पृथ्वीराज तथा
जयचंद के आपस के बैर के कारण पंजाब को इन्ही परिस्थितियों में से गुजरना पड़ा।
ऐसी विषम परिस्थितियों में अपनी प्राचीन तथा सर्वश्रेष्ठ संस्कृति की रक्षा का महान्
उत्तरदायित्व निर्भय तथा त्यागी संतों का होता है।
भागवत धर्म का अर्थात् भारतीय संस्कृति के परिणत स्वरूप का उत्तर की ओर
प्रचार करने वाले नामदेव पहले संत है। उनको भारतीय संस्कृति की रक्षा तथा संवर्धन
करना था। यह कार्य उन्होंने नाम संकीर्तन¹ द्वारा संपन्न किया। राजनीति की अपेक्षा
मानवता का पुरस्कार करने वाला संस्कृति की रक्षा उनकी दृष्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण
थी। अतः उन्होंने स्थायी रूप से पंजाब में रहने का निश्चय किया हो।
ऊपर इस बात का उल्लेख हो चुका है कि भारत के अन्य स्थानों की अपेक्षा
पंजाब में विदेशियों के द्वारा भारतीय धर्म और संस्कृति को अधिक खतरा था। अतः
नामदेव ने पंजाब को अपना कार्य क्षेत्र बनाने का निश्चय किया हो। उन्होंने अपनी
रचनाओं द्वारा इस बात का आग्रह किया कि लोग अपना मनोबल कायम रखें तथा
आडम्बर-रहित जीवन बितायें। यही कारण है कि नामदेव ने संत के नाते बहुत उच्च
कोटि की मान्यता प्राप्त की तथा उनकी रचनाओं का बहुत सम्मान किया गया।
नामदेव की महत्ता और उनकी रचनाओं का प्रसार
नामदेव की महत्ता का प्रमाण इसी से मिलता है कि महाराष्ट्र के उनके सम
कालीन तथा परवर्ती संतों ने उनका बड़े आदर के साथ स्मरण किया है।
संत तुकाराम की शिष्या संत बहिणाबाई का निम्नलिखित अभंग बहुत प्रसिद्ध
है जिसका भाव इस प्रकार है—
'ज्ञानदेव ने भागवत धर्म के मंदिर की नींव (पाया) अपनी 'ज्ञानेश्वरी' के
द्वारा डाली। नामदेव ने ज्ञानेश्वर द्वारा प्रस्थापित वारकरी पंथ का अपने अभंगों द्वारा
१, नाचू कीर्तनाचे रंगी। ज्ञानदीप लावूं जगी।
—श्रीनामदेवरायांची सार्थ गाथा (भाग तीसरा)
अभंग १५६, पृ० १८६ ।