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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 271, कुल 332 में से

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पृष्ठ 271

नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २७७
ध्यानपूर्वक इन पदो का अध्ययन करने से यह बात निश्चित रूप से दिखाई पड़ती है कि
निर्गुण संतों की रचनाओं में जो विशेषताएँ प्राप्त होती हैं वे सभी नामदेव में हैं।
आचार्य परशुराम चतुर्वेदीजी ने भी इन्ही विशेषताओं का उल्लेख किया है—
(१) प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर सत्य का अन्वेषण
(२) सद्गुरु के महत्व का प्रतिपादन
(३) परम तत्व के साथ एकात्म भाव
(४) नाम स्मरण का आग्रह, तथा
(५) वाह्याडम्बर की व्यर्थता
संत नामदेव की हिंदी रचनाओ में ये सभी विशेषताएँ प्राप्त होती है । नामदेव
और कबीर की समान विचार-धारा की तुलना में इन विशेषताओ का उल्लेख किया जा
चुका है पर यहाँ उन्हे ओर स्पष्ट रूप से रखना चाहता हूँ।
नामदेव ने सर्वदा इस बात पर जोर दिया है कि ब्रह्म अथवा सत्य का अन्वेषण
प्रत्यक्ष अनुभव के बिना नहीं हो सकता । कहना-सुनना उसके परिचय में सहायक नही
हो सकता । कहना-सुनना जब समाप्त होगा तब उसका परिचय मिलेगा ।¹
वे बार-बार आत्मानुभव की ओर संकेत करते हैं—'रे मानव ! ईश्वर की सृष्टि
को अपने हृदय मे विचार कर देख । एक ही ईश्वर घट-घट और चराचर में समान रूप
से व्याप्त है ।'²
वे वेद और पुराण पढ़ने के बाद भी स्वतः विचार करने को अधिक महत्व देते
हैं—'हे पंडित ! तुम वेदों और पुराणो को पढ़ो और सोचो कि हरि का दास संसार से
बिलकुल अलग है ।'³
गुरु के महत्त्व के अनेक उदाहरण हम पहले दे आये हैं । 'सारा संसार भ्रम में
भूला हुआ है, निर्वाण पद को कोई पहचानता ही नही । नामदेव के गुरु ने उस परम तत्त्व
१. कहिवौ सुनिबौ जब गत होइबौ तब ताहि परचौ आवै ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६६ ।
२. कहत नामदेउ हरि की रचना देखहु रिदै विचारी ॥
घट-घट अंतरि सरब निरंतरि केवल एक मुरारी ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १५० ।
३. ऐसे जगथै दास निधारा ।
वेद पुरान मुगुत किन देषी पंडित करउ विचारा ॥ टेक ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ८२ ।