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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 287, कुल 332 में से

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पृष्ठ 287

नामदेव का साहित्य पर प्रभाव २६५
विस्तार किया। एकनाथ ने अपने 'भागवत' की पताका फहराई और तुकाराम ने
अभंगों की रचना कर इसके ऊपर कलश स्थापन किया।"१
संत ज्ञानेश्वर नामदेव की काव्य-कला के विषय में लिखते हुए कहते हैं—'नाम-
देव में कथन मात्र नहीं कवित्व है—उसका रस अद्भुत और निरुपम है।'२
एक अन्य स्थल पर वे लिखते हैं—'हे नामदेव ! तेरी रचना सागर से भी
अगाध तथा सरस है। वह रस-सिक्त है। उसे सुनने के लिए मेरा मन अधीर हो रहा
है। अविलम्ब मुझे अपनी कोई रचना सुना।'३
नामदेव के यहाँ की दासी संत जनाबाई ने नामदेव के आध्यात्मिक ऋण को सहर्ष
स्वीकार किया है। वे कहती हैं कि मेरे माता-पिता नामदेव धन्य हैं। उन्होंने मुझे
पंढरीराया के दर्शन कराये।४
नामदेव की मधुर वाणी का वर्णन करते हुए उनके शिष्य परिसा भागवत कहते
हैं—'नामदेव की अमृत-मधुर वाणी दूध की मलाई के समान है। उसका वर्णन करने
में मैं असमर्थ हूँ।'५
१. संत कृपा झाली । इमारत फळा आली ॥
ज्ञानदेवे रचिला पाया । उभारिले देवालय ॥
नामा तयाचा किंकर । तेणे केला हा विस्तार ॥
जनार्दन एकनाथ । ध्वज उभारिला भागवत ॥
भजन करा सावकाश । तुका झाला ये कलस ॥ —भागवत संप्रदाय, पृष्ठ ५७२ ।
२. भक्त भागवत बहुतसाल ऐकिले । बहु होऊनी गेले होती पुढे ॥
परी नामयाचे बोलणे नव्हे हे कवित्व । हा रस अद्भुत निरुपमु ॥
—सकल संत गाथा, पृष्ठ ८७, अभंग ६२७ ।
३. सिंधुहूनि सखोल सुरस तुझे बोल । आनंदाची बोल नित्य नवी ॥
ते मज सादर ऐकवी सत्वर । श्रवण क्षुधातुर झाले माझे ॥
—सकल संत गाथा, पृष्ठ ८७, अभंग ६२५ ।
४. धन्य माय बाप नामदेव माझा । तेणे पंढरी राया दाखविले ॥
—सकल संत गाथा, भाग छठा, जनाबाई के अभंग, अभंग ७८ ।
५. कवित्वा परीस कवित्व आगले पै आहे ।
परि तें न कळे सोय नामयाची ॥
दुधावरोल साय तें मी वाणू काय ।
तैसे गाणे गाय नामदेव ॥
—सकल संत गाथा, अभंग १, परिसा भागवत के अभंग ।