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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 285, कुल 332 में से

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पृष्ठ 285

नामदेव का तत्कालीन और परवर्ती
साहित्य पर प्रभाव

नामदेव की पंजाब यात्रा का रहस्य
प्रायः नामदेव के संबंध में यह प्रश्न उठाया जाता है कि वे महाराष्ट्र छोड़कर
पंजाब क्यों गये ? क्या वे केवल भ्रमण के लिए गये थे अथवा इस भ्रमण के पीछे उनका
कोई विशेष अभिप्राय था ? इसके अनेक कारण हो सकते हैं। वास्तव में बात यह है
कि नामदेव एक जागरूक संत थे। भागवत धर्म के महान् प्रचारक थे। इस भागवत
धर्म के उपदेशों की निधि उनके हाथ आयी थी। अथवा उसके संदेश से वे भली भांति
परिचित हो चुके थे और अब उसका प्रचार और प्रसार करना चाहते थे।¹ उन्हे समाज
के लोक तथा परलोक की चिंता थी। मेरे विचार से अपनी पहली यात्रा में जब उन्होंने
इस बात का अनुभव किया कि उत्तर में धर्म और संस्कृति का ह्रास हो रहा है तो
उन्होंने उत्तर में जाकर वहाँ की जनता को जाग्रत करने का निश्चय किया। अन्यथा वे
पंढरी के विट्ठल को छोड़कर उत्तर कभी न जाते।

पंजाब की तत्कालीन परिस्थिति
इतिहास इस बात का साक्षी है कि विदेशी आक्रमणों के आघात सब से अधिक
पंजाब को ही सहने पड़े हैं। भ्रमण करते करते नामदेव जब पंजाब पहुँचे तब उन्होंने
देखा कि विदेशी के बढ़ते प्रभाव के कारण भारतीय संस्कृति को धोखा निर्माण हो गया
है। यदि नामदेव और उनसे प्रेरणा-प्राप्त गुरु नानक यदि पंजाब को अपना कार्य क्षेत्र
न बनाते तो देश के बटवारे के बाद पंजाब का जो हिस्सा आज भारत में है उससे भी
हमें हाथ धोना पड़ता।

१. आम्हा सापडले वर्म। करूं भागवत धर्म ॥
—श्रीनामदेवगाथा, अभंग १४०३ ।
(महाराष्ट्र शासन प्रकाशन)