सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्त्ता २६३
(२) भेदभाव विहीनता—नामदेव वर्ण व्यवस्था में विश्वास नही करते थे ।
भक्ति के क्षेत्र मे जाति पाँति के झगड़े को वे निरर्थक समझते थे । उनकी वाणी में यह
बात अनेक स्थलों पर ध्वनित की गई है । उन्होने स्पष्ट रूप से कहा है—'मैं जाति-पाँति
को लेकर क्या करूॅ ? मै तो रात दिन राम नाम का जप करता हूँ ।'१
'हिंदू अन्धा है और मुसलमान काना । इन दोनो में ज्ञानी चतुर है । मै तो ऐसे
भगवान् की आराधना करता हूँ जो न मंदिर में है और न मसजिद में ।'२
अपनी गुरु परम्परा से प्राप्त इस बात का अनुसरण कबीर ने भी किया है ।
जाति व्यवस्था जीवोत्पत्ति की दृष्टि से अप्राकृतिक है । कबीर कहते हैं—'यदि सिरजन-
हार ने चार वर्णों के भेद का विचार किया है तो जन्म से ही यह एक समान सब के
साथ भौतिक, दैहिक और दैविक ये तीन दण्ड क्यो लगा देता ? कोई हल्का ( छोटा )
नही है, जिसके मुख में राम नाम नही है वह छोटा है ।'३
सन्तो की जाति नही होती । सभी जातियो में सन्त हुए हैं । सभी लोगो को
सन्तो के चरित्र से शिक्षा लेनी चाहिए ।४
सभी मानवो को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, हिन्दू या मुसलमान नही होना
है । ये विषमता पैदा करने वाले मानवीय रूप है । ये रूप हरिजन-रूप या भक्त-रूप से
तुच्छ है । भक्त के समान ये नही है ।'५
१. का करौ जाती का करौं पाँती ।
राजाराम सेऊँ दिन राती ॥ टेक ॥
—सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली, पद १८ ।
२. हिंदू अन्हा तुरकू काणा । दोहाने गिआनी सिआणा ॥१॥
हिंदू पूजै देहुरा मुसलमानु मसीत ॥
नामे सोई सेविआ जह देहुरा न मसीत ॥
—सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २०८ ।
३. जो मै करता वरण विचारे,
तो जनमत तीनि डाँडि किन सारे ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पद ४१, पृ० १०१ ।
४. संतन जात न पूछो निरगुनियां ।
—संक्षिप्त संत-सुधा-सार, पृ० ४८ ।
५. अवरन वरन न गनिय रंक धनि, विमल बास निज सोई ।
ब्राह्मण क्षत्रिय वैस सूद्र सब गत समान न कोई ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृ० १०५

२६४ नामदेव की हिन्दी कविता
(३) ब्रह्म की निर्गुणता—प्रसिद्ध है कि सन्त नामदेव पहले मूर्ति-पूजक और
सगुणोपासक थे किन्तु बाद में वे कट्टर निर्गुणवादी हो गये। वे ब्रह्म के निर्गुण स्वरूप
में विश्वास करते थे। इस निर्गुण स्वरूप का वर्णन उन्होंने अनेक प्रकार से अनेक
स्थलों पर किया है। उस निर्गुण का वर्णन वे इस प्रकार करते हैं—'वह निर्गुण ब्रह्म
अनेक और एक सब कुछ है। सर्वत्र उसी का प्रकाश दिखाई पड़ता है।'¹
'मैं जिधर भी जाता हूँ उधर भगवान् है जो परमानन्द में लीन हो सदैव
लीलाएँ करता है। नामदेव कहते हैं—'हे भगवान् ! पृथ्वी के जल थल आदि सभी
स्थानों में तुम व्याप्त हो। इधर भगवान् है, उधर भगवान् है, भगवान् के बिना संसार
में कुछ भी नही है।'²
'प्रत्येक जीव के हृदय में भगवान् है। हाथी और चींटी एक ही मिट्टी के बने
हैं। ये सब उसी भगवान् के अदीय पात्र हैं।'³
निर्गुण ब्रह्म का वर्णन करते हुए कबीर कहते हैं कि उसके किसी प्रकार का
रूपाकार नही है। उसके 'रूप अरूप' भी नही है। वह पुष्प की सुगन्ध से सूक्ष्म अनुपम
तत्त्व है।⁴
कबीर ने अपने ब्रह्म को अनेक निर्गुणतावाचक विशेषणों से विशिष्ट किया है।
वे कहते हैं—'वह अलख है, निराकार है, उसका कोई स्थूल रूप नहीं है, उसका आदि
भी नहीं, अंत भी नहीं। वह उत्पन्न भी नहीं होता, नष्ट भी नहीं होता। समझ में
१. एक अनेक बिआपक पूरन जत देखउ तत सोई ।
माइया चित्र विचित्र विमोहित विरला बूकै कोई ।
सभु गोबिंदु है सभु गोबिंदु है गोबिंद बिनु नहि कोई ॥
—सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली, पद १५० ।
२. जत्र जाउँ तत्र बीठल भैला । बीठलियो राजाराम देवा ॥ टेक ॥
ईभै बीठलु उभे बीठलु बीठल बिनु ससार नही ॥
—सन्त नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६१ ।
३. राम बोले राम बोले राम बिना को बोले रे भाई ॥ टेक ॥
ऐकल मीटी कुंजर चीटी भाजन रे बहु नाना ।
पाँवर जंगम कीट पतंगा सब घटि राम समाना ॥
—सन्त नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६ ।
४. जाके मुंह माथा नही नाहि रूप अरूप ।
पुहुप वास ते पातरा, ऐसा तत्त्व अनूप ॥
—कबीर वचनावली, पृ० १ ।

नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्त्ता २६५
नही आता कि उसका वर्णन किस प्रकार किया जाय ।'१
वह गुण-रहित है, उसका नाम नही रखा जा सकता वह 'गुन विहूँन' है ।२
(४) सर्वात्मभाव और अद्वैतवाद—नामदेव में इन दोनों वादों की प्रतिष्ठा दृढ़
भूमिका पर पाई जाती है । उनके अनुसार परमात्मा सारे संसार में व्याप्त हैं । वे कहते
हैं—'हे परमात्मा ! जिससे सारे संसार की उत्पत्ति हुई है ऐसे तुम सारे संसार में
व्याप्त हो । संसार के लोगों ने माया से अभिभूत होकर उस सर्वव्यापी परमात्मा को
भुला दिया अन्यथा तुम घट-घट-वासी हो ।'३
'वास्तव में प्राणि-मात्र में परमात्मा का वास है । क्या स्थावर जंगम, क्या
कीट पतंग, सब में वह व्याप्त है ।'४
'मै जहाँ जाता हूँ केवल तुझे देखता । तू जल, थल, काष्ट, पाषाण, निगम,
आगम, वेद तथा पुराणो में भी है ।'५
अद्वैतवाद के लिए हम नामदेव की निम्नलिखित पंक्तियां उद्धृत कर सकते हैं—
'लोग मनुष्य द्वारा निर्मित मूर्ति के आगे नाचते हैं और स्वयंभू परमात्मा को भुला देते
[

२६६ नामदेव की हिन्दी कविता
'रे मानव ! ईश्वर की सृष्टि को अपने हृदय में विचार कर देख । एक ही
ईश्वर घट घट और चराचर में समान रूप से व्याप्त है ।' १
कबीर में भी सर्वत्र सर्वात्मवाद और अद्वैतवाद का प्रतिपादन मिलता है । कबीर
ब्रह्म को सर्वत्र व्याप्त तो कहते ही है वे ब्रह्म में जगत् को भी व्याप्त बताते है । जगत्
उसमें और वह जगत् में दोनों एक दूसरे में ओतप्रोत है ।' २
'वह ब्रह्म व्यापक है, सब मे एक भाव स व्याप्त है । पडित हो या योगी, राजा
हो या प्रजा, सबमें वह आप रम रहा और सब उसमें रम रहे है । यह जो नाना
भाँति का प्रपंच दिखाई दे रहा है, अनेक घट, जनम भांडे दिख रहे है, सब कुछ उसी
का रूप है ।' ३
अपने ब्रह्म की अद्वैतता सिद्ध करने के लिए कबीर ने उसकी अखण्डता एव
एकरसता पर विशेष जोर दिया है । वे कहते— 'जब वह अद्वैत तत्त्व अविहृड, एक रस
और अखण्ड है तो अवश्य ही पूर्ण होना चाहिए ।' ४
प्रतिबिंबवाद का आधार लेकर कबीर कहते है—'जलाशय के किनारे बैठे
मनुष्य को लहरदार जल में जैसे अपने कई प्रतिबिंब दिखाई देते है, उसी प्रकार आत्मा
स्वयंभू देवकी सेवा जाने । तो दिव दिष्टी ह्वै सकल पिछाने ॥
नामदेव भणै मेरे यही पूजा । आतमाराम अवर नही दूजा ॥
—सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २० ।
१. कहत नामदेऊ हरि को रचना देखहु रिदै विचारी ।
घट घट अंतरि सरब निरंतरि केवल एक मुरारी ॥
—सं० ना० हि० प०, पद १५० ।
२. खालिक खलक खलक में खालिक सब घट रह्यो समाई ।
कहै कबीर मैं पूरा पाया सब घटि साहिब दीठा ॥
—कबीर ग्रन्थावली पद ५१, पृ० १०४ ।
३. व्यापक ब्रह्म सबनि मै एकै, को पंडित को जोगी ।
राणा राव कवन सूं कहिये, कवन वेद को रोगी ॥
इनमें आप आप सबहिन मै आप थापसूं खेलै ।
नाना भाँति घड़े सब भांडे, रूप धरे धरि मेलै ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पद १८६, पृ० १५१ ।
४. आदि मध्य और अन्त लौं अविहड सदा अभंग ।
कबीर उस कर्ता की सेवक तजै न सत ॥
—कबीर ग्रन्थावली, अविहढ कौ अंग । पृ० ८६ ।

नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्त्ता २६७
भी एक है जो अनेक दिखाई देती है ।'१
कबीर इससे भी आगे बढ़ कर कहते हैं—'सकल विश्व में आत्म तत्त्व के
अतिरिक्त कोई दूसरा पदार्थ अन्त-तम अस्तित्व के रूप में है ही नहीं । केवल आत्मा
पारमार्थिक सत्य है ।'२
(५) अनन्य प्रेम साधना—भक्त जब अपने इष्टदेव की आराधना करता है तब
उसमें अनन्यता का भाव ही प्रधान होता है । नामदेव की रचना में सर्वत्र अनन्य प्रेम
साधना को महत्त्व दिया गया है । वे कहते है—'राम की वंदना करने पर मैं और किसी
की वंदना न करूँगा । यदि मेरा लौकिक जीवन नष्ट हो जाता है तो अपना पारमार्थिक
जीवन क्यों नष्ट करूँ ? मै अपनी रसना से राम-रसायन का परम स्वाद लूँगा ।'३
जिस निधि के लिये मैं त्रिभुवन का चक्कर काट कर आया वह मुझे अपने हृदय
में ही मिली । नामदेव कहते हैं—तुमको कहीं जाने की आवश्यकता नहीं । अपने घर
बैठकर तुम राम-नाम का जप करो ।'४
सचमुच उनके हृदय मे सब कुछ है । 'माला हृदय में है तथा गोपाल भी मेरे
हृदय में हैं । संसार का पालनहार दीन दयाल परमात्मा भी मेरे हृदय में है । मेरे हृदय
में वह दीप जल रहा है जिसके आलोक से सारा संसार आलोकित है ।'५
१. ज्यूँ जल मै प्रतिब्यंब, त्यूँ सकल रामहि जाणोजे ।
—कबीर ग्रंथावली, विचार कौ अंग, पृ० ५६ ।
२. हम सब माँहि सकल हम माँही हमथैं और दूसरा नाही ।
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० २०० ।
३. राम जुहारि न और जुहारौ । जीवनि जाइ जनम कव हारौं ?
आन देव सौं दोज न भाषौ । राम रसाइन रसना चाषौ ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ३० ।
४. जा कारन त्रिभुवन फिरि आये ।
सो निधान घटि भीतरि पाये ॥
नामदेव कहै कहूँ आइये न जाइये ।
अपने राम घर बैठे गाइये ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १६ ।
५. हिरदै माला हिरदै गोपाला । हिरदै बिंणि कौ दीन दयाला ॥ टेक ॥
हिरदै दीपक घटि उजियाला । फूटि किवार टूटि गयो ताला ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १६ ।

२६८ नामदेव की हिन्दी कविता
अपने इस सत्यान्वेषण के आधार पर वे डंके की चोट पर यह निर्णय देते हैं—
'ऐ लोगो ! करोड़ो उपाय करने पर तुम्हे मुक्ति न मिलेगी। मुक्ति पाने का राम-नाम
के स्मरण बिना कोई अन्य मार्ग नहीं है।'¹ संत नामदेव की वाणी का यही मूल
भाव है।
कबीर ने भी इसी अनन्य प्रेम भावना को नामदेव के ढंग पर बरताया है। वे
कहते हैं— हे अनेक गुणो से विभूषित ईश्वर ! कबीर का एकमात्र तुझसे ही प्रेम है।
यदि मै तुझे छोड़कर किसी अन्य से प्रेम करूँ तो वह मुँह पर स्याही लगाने के
समान है।'²
अपने साँई के प्रति कबीर की भक्ति अडिग है। वे राम के कुत्ते के रूप में अपना
परिचय देते नही लजाते । 'मै राम का स्वामिभक्त कुत्ता हूँ और मेरा नाम मोतो है।
मेरे गले में राम नाम की रस्सी है। राम जिधर मुझे खींचता है उधर ही मै चलता
हूँ।'³ आत्मसमर्पण की यह हद है।
कबीर जिस साँई की साधना करते थे वह मुफत की बातों से हाथ नही आता
था। उस राम से सिर देकर ही सौदा किया जा सकता था।⁴
कबीर भक्त और पतिव्रता को एक कोटि में रखते थे। दोनों का धर्म कठोर है,
दोनों की वृत्ति कोमल है। वे कहते हैं—'मेरे नेत्रों में राम की तसवीर बनी हुई है।
उनमें और किसी के लिए स्थान नहीं है। कोई पतिव्रता सिंदूर की रेखा को छोड़कर
काजल की रेखा अपनी माँग में कैसे लगा सकती है ?'⁵
१. राम भगति बिन गति न तिरत को। कोटि उपाइ जु करही रे नर ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६२ ।
२. कबीर प्रीतड़ी तो तुझ सौ बहु गुणियाले कंत ।
जे हँसि बोलौ और सौं तौ नील रंगाऊँ दंत ॥
—कबीर ग्रंथावली निष्कर्मी पतिव्रता कौ अंग, पृ० १८ ।
३. कबीर कूता राम का मुतिया मेरा नाउँ ।
गले राम की जेवड़ी जित खैंचै तित जाउँ ॥
—कबीर ग्रंथावली, निष्कर्मी पतिव्रता को अंग, पृ० २० ।
४. साँई सैंत न पाइये बातां मिलै न कोय ।
कबीर सौदा रामसों सिर बिन कदै न होय ॥
—सत्य कबीर साखी ८५ ।
५. कबीर रेख स्यंदूर की काजल दिया न जाइ ।
नैनूँ रमइया रमि रहया दूजा कहाँ समाई ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० १६ ।

नामदेव : हिंदी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २६६
कबीर का अपने स्वामी पर अटल विश्वास है। कहते हैं—'मैं उस समर्थ का
सेवक हूँ जो महान् और असीम है। इसी कारण मेरा अनर्थ नही हो सकता। यदि
पतिव्रता नंगी रहेगी तो उसके स्वामी को ही लज्जा आयेगी ।'१
(६) निर्गुण भक्ति—भागवत में तो निर्गुण भक्ति सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। नाम-
देव में यही निर्गुण भक्ति भावना पाई जाती है।
नामदेव कहते हैं—'हे परमात्मा ! तेरी गति तू ही जानता है; मैं अल्प मति
तेरा क्या बखान करूँ ? तू वैसा नहीं है जैसा कि तेरा वर्णन किया जाता है।
तू जैसा है, वैसा है।'२
'जो परम सुख का निधान है उसको छोड़कर लोग अन्य धंधों में लग जाते
हैं। ये पत्थर की मूर्ति के आगे सजीव प्राणी की बलि चढ़ाते हैं। जिसके प्राण नहीं
उसको पूजते हैं। पत्थर को पूजा कर मनुष्य कुछ और ही हुआ है।'३
'मैं फूल तथा पत्तियों को चढ़ाकर परमात्मा की पूजा न करूँगा क्योंकि परमात्मा
मंदिर में नहीं है। नामदेव कहते हैं कि मैंने उसके चरणों पर आत्मसमर्पण कर दिया
है अतः मेरा पुनर्जन्म न होगा।'४
नामदेव के अनुसार वह परम तत्त्व ऐसा है जिसका न कोई रूप है, न रंग है,
न आकार है। उसका वर्णन नहीं किया जा सकता ।'५
१. उस संम्रथ का दास हौं, कदे न होइ अकाज ।
पतिव्रता नांगी रहै तो उसही पुरिस कौ लाज ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० २० ।
२. तेरी तेरो गति तूँ ही जानै । अल्प जीव गति कहा बखाने ।
जैसा तूँ कहिये वैसा तूँ नाही । जसा तूँ है तैसा आछि गुसाईं ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १४ ।
३. कहा करूँ जग देखत अंधा । तजि आनंद विचारे धंधा ॥ टेक ॥
पाहन आगे देव कटीला । याकौ प्राण नही वाकी पूजा रचीला ॥
निरजीव आगे सरजीव मारै । देखत जनम आपनौ हारै ॥
आंगणि देव पिछोड़हि पूजा । पाहन पूजि भए नर दूजा ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ४७ ।
४. पाती तोड़ि न पूजूं देवा । देवलि देव न होई ।
नामा कहै मैं हरि की सरना । पुनिरांव जनम न होई ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६५ ।
५. कहै नामदेव परम तत है देता ।
जाके रूप न रेख वरण कहौ कैसा ॥ —संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ७६ ।

२७० नामदेव की हिन्दी कविता
वैरागी होकर मैं राम के गुण गाऊँगा। मैं उस परम तत्व के निवास स्थान
तक जाऊँगा जो वर्णनातीत अनहद नाद में रत है तथा अगम्य है।१
अपने मराठी के एक अभंग में नामदेव कहते हैं—'पत्थर की मूर्ति भक्तों के
साथ बातें करती है ऐसा कहने वाले तथा सुनने वाले दोनों मूर्ख हैं।'२
कबीर की भक्ति भी निर्गुण भक्ति ही थी। कबीर ने ब्रह्म को निर्गुणवाचक
विशेषणों से युक्त करके उसका वर्णन किया है —'ब्रह्म आँखों से देखा नहीं जा सकता
अतः वह अलख है।'३ 'वह अत्यंत सुन्दर है, सदा सर्वदा रहने वाला है, वह अनुपम
है।'४ 'ब्रह्म का भेद पाना असंभव है, उसे इन्द्रियों से पाया नहीं जा सकता अतः वह
अगम और अगोचर है।'५
'ब्रह्म को अजर-अमर तो कहते ही हैं परन्तु वह अरूप है। उसे आँखों के द्वारा
देख पाना असंभव है, इसी से वह अलख है।'६
'वह सभी कर्मों से अलिप्त है, निर्भय है। उसका कोई आकार नहीं, वह निरा-
कार है।'७
१. बैरागी रामहि गाऊँगा ।
सब्द अतीत अनाहद राता । अकुला के घरि जाऊँगा ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६६ ।
२. पाषाणाचा देव बोलत भक्तांतें ।
सांगते ऐकते मूर्ख दोघे ॥
—पांच संत मणी, पृ० १५० ।
३. अलख निरंजन लखै न कोई ।
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० २३० ।
४. अविगत अकल अनुपम देखा कहतौ कह्या न जाई ।
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ६० ।
५. अगम अगोचर गमि नही तहाँ जगमगै जोति ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १२ ।
६. अजरा अमरा कथै सब कोई ।
अलख न कथणा जाई ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १४६ ।
७. निरभय निराकार है सोई ।
कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ २३०

नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्त्ता २७१
अंत में कबीर ने 'नेति नेति' का प्रश्रय लिया। वह ऐसा है, वैसा नहीं। इस
वाद विवाद पर समय व्यर्थ खर्च न करके उसका गुणगान करना ही श्रेयस्कर है।'१
(७) नाम साधना—यों तो नाम-साधना भक्ति के क्षेत्र में प्राचीन काल से ही
प्रचलित है किंतु नामदेव ने उसको बहुत अधिक महत्त्व दिया था।
हरिनाम की महिमा अपार है। वही तो इस विश्व में एक तत्त्व है। नामदेव
कहते हैं—'हरि का नाम सारे संसार का सार है। मैंने हरिनाम रूपी नाव से भव-
सागर को पार किया।'२
'संसार माया है, तुम्हारा नाम सार-स्वरूप है। इस कलियुग में तुम्हारा नाम
एकमात्र आधार है।'३
हरि नाम ने संसार में साधारण काम नहीं किया है। 'हरि का नाम स्मरण
करने से कमला श्री विष्णु का दासी हुई। शंकर अविनाशी हुए, ध्रुव को अटल स्थान
प्राप्त हुआ और प्रह्लाद का उद्धार हुआ।'४
'राम का नाम लेने से किसका कलंक दूर नहीं हुआ? राम कहते ही, उनके
स्मरण मात्र से पापी जना का उद्धार हुआ।'५
नाम की इस महत्ता को देखकर नामदेव कहते हैं—'राम नाम रूपी पूँजी में
मैंने अपना सब कुछ लगा दिया। मुझे राम नाम से लो लगी! मैं उससे अनुरक्त
१. दीठा है तो कस कहूँ कहिया न कोई पतिआइ।
हरि जैसा है तैसा रहौ, तू हरषि हरषि गुण गाई॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ११८।
२. हरि नाँव सकल भुवन तत सारा।
हरि नाँव नामदेव उतरे पारा॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १।
३. सार तुम्हारा नाँव है झूठा सब संसार।
मनसा वाचा कर्मना कलि केवल नाव अधार॥
—सत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ५१।
४. हरि नाव मै निज कवला दासी। हरि नावै संकर अविनासी।
हरि नाव मे ध्रू निश्चल कराया। हरि नाव मे प्रहलाद उधरीय॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १४।
५. कोन के कलंक रह्यो राम नाम लेत हो।
पतित पावन भयो राम बहुत हो॥ टेक॥
—सत नामदेव की हिंदी पदाविली, पद २८।

२७२ नामदेव की हिन्दी कविता
हुआ ।'¹
'जिसके पास राम नाम रूपी धन हो उसे किस बात की कमी है ? अष्ट सिद्धि
तथा नव निधि उसकी सेवा में तत्पर है ।'²
यही कारण है कि नामदेव ने अपने मनको पूर्णत 'नाम' पर केंद्रित किया । वे
कहते है— मेरा मन राम नाम पर इस प्रकार केंद्रित हुआ है जिस प्रकार सुवर्णकार का
सोने की तुला पर होता है ।'³
'जब तक राम नाम के लिए हृदय म सच्चा प्रेम न हो, आकर्षण न हो तब
तक 'यह मेरा है' 'यह मेरा है' कहने कहते जीवन व्यर्थ जायगा ।'⁴
नाम साधना की दिसा मे कबीर ने नामदेव का पूरा अनुसरण किया । उन्होंने
भक्ति-क्षेत्र में नाम जप को विशेष महत्त्व दिया है । कबीर साहब हाथ उठाकर कहते
हैं—'राम का नाम लेने से ही भला होगा । मैने तो कहा ही है, ब्रह्मा और महेश ने
भी कहा है कि राम का नाम ही जीवन में सार तत्त्व है ।'⁵
कबीर उस नाम स्मरण को सबसे बढ़कर मानते हैं जो मनसा, वाचा व कर्मणा
किया जाय ।⁶
१. राम नाम मेरे पूँजी धना ।
ता पूँजी मेरो लागो मना ॥ टेक ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १२८ ।
२. रामसा धन ताको कहा अब थोरी ।
अठ सिद्धि नव निधि करत निहोरी ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ३ ।
३. ऐसै मन राम नामै बेधिला । जसै कनक तुला चित राखिला ॥ टेक ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १६ ।
४. जो लग राम नामै हित न भयो ।
तो लग मेरो मेरो करता जनम गयो ।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २२ ।
५. कबीर कहता जात हूँ सुणता है सब कोई ।
राम कहे भला होइगा नहि तर भला न होइ ॥
कही कहै मैं कहि गया, कहि गया ब्रह्म महेस ।
राम नाँव तन सार है सब काहू उपदेस । —कबीर ग्रन्थावली पृ० ४, ५, ।
६ भगति भजन हरि नांव है दूजा दुक्ख अपार ।
मनसा वाचा क्रमना कबीर सुमिरण सार ॥ —कबीर ग्रंथावली, पृ० ५ ।

नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २७३
कबीर ने स्पष्ट घोषणा की है कि समस्त साधनो का सार तत्त्व सुमिरन ही
है । धर्म, उपासना और साधना के समस्त अंग नाम सुमिरन की समानता नही कर
सकते ।१
कबीर ने भगवान की शरण में जाकर नाम-जप करने का उपदेश दिया है ।२
कबीर ने नाम रस का वर्णन प्रेम रस और राम रस के रूप में किया है ।
उन्होने नाम-रस का प्याला पीने का अनुरोध किया है ।३
कबीर कहते है—नाम स्मरण के बिना जप, तप, ध्यान सब झूठ हैं ।४
कबीर के अनुसार भक्त को अखंड नाम-जप करना चाहिए ।५
किन्तु नाम-स्मरण ऐसा न हो कि मुँह मे तो राम का नाम हो और मन विषयो
का ध्यान करे । राम का स्मरण तो सभी करते है लेकिन उसकी भी अनेक विधियाँ हैं ।
उसी राम के नाम का उच्चारण साध्वी और पतिव्रता भी करती है और तमाशबीन
भी करते है । जिस प्रकार आग का नाम मात्र लेने से मनुष्य जलता नही उसी प्रकार
राम का नाम लेने से वह मुक्त नही हो जाता । उसे राम के सत्य स्वरूप की अनुभूति
कर लेनी चाहिए ।६
१. कबीर सुमिरन सार है और सकल जंजाल ।
—कबीर साखी संग्रह पृ० ६६ ।
२. कहत कबीर सुनहु रे प्रानौ छाड़इ मन के भरमा ।
केवल नाम जपहु रे प्रानी परहु एक की सरना ॥
—कबीर ग्रन्थावली पृ० २६७ ।
३. पी ले प्याला हो मतवाला । प्याला नाम अमी रस का ।
—संक्षिप्त संत सुधा-सार, पृ० ५३ ।
४. हरि बिन झूठे सब व्योहार केते कोऊ करो गंवार ।
झूठा जप, तप झूठो ग्यान, राम नाम बिन झूठा ध्यान ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० १७४ ।
५. काम परे हरि सिमिरिये ऐसा सिमरो नित ।
अमरापुर बासा करहु हरि गया बहोरै चित ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० २५० ।
६. राम नाम सबको कहै, कहिबे बहुत विचार ।
सोई राम सती कहे सोई कौलिगहार ॥
आगि कह्या दाझे नही जे नही चंपै पाइ ।
जब लग भेद न जाणिये राम कहया तो काइ ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पद १२२, पृ० १२७ ।
१८

२७४ नामदेव की हिन्दी कविता
(८) सेव्य सेवक भाव—भक्तों में सेव्य-सेवक भाव सदैव से ही सामान्य रहा
है। नामदेव ने अपनी भक्ति में सेव्य-सेवक भाव को विशेष महत्त्व दिया है। उनकी हिंदी
पदावली में संगृहीत पदों से यह बात स्पष्ट प्रकट होती है।
नामदेव कहते हैं—'राम भक्ति की बडी प्रबल अभिलाषा मेरे मन में घर कर
गई है। शेष सभी अभिलाषाओं का मैंने त्याग किया। उस राम के चरणों की वंदना
करते हुए निष्काम नामदेव कहते हैं—'तुम मेरे स्वामी हो और मे तुम्हारा दास हूँ।'¹
'नामदेव राम के अनुरूप है और राम नामदेव के अनुरूप है। हे राम! तुम
मेरे मालिक हो और मे तुम्हारा सेवक हूँ।'²
'लोग वेदों के साथ मोह-नदी की तेज धारा में बह गये। हे नामा के स्वामी
विट्ठल ! मुझे पार उतार दो।'³
'हे स्वामी ! तुम मेरे ठाकुर हो, मेरे राजा हो, मैं तुम्हारी शरण में
आया हूँ।'⁴
नामदेव कहते हैं—'तुम मेरे स्वामी हो। तुम्हारा भक्त अपूर्ण है और तुम पूर्ण
हो। इससे उसे तुम्हारे आश्रय की आवश्यकता है।'⁵
'नामदेव के स्वामी विट्ठल ने अपने जपहीन, तपहीन, कुलहीन और कर्महीन
भक्त का उद्धार किया।'⁶
१. ऐकल चिंता राहिली निता छूटे सब आसा ।
प्रणवत नामा भये निहकामा तुम ठाकुर मै दासा ।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६
२. राम सो नामा, नाम सो रामा । तुम साहिब मै सेवक स्वामा ॥टेक॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ७ ।
३. लोग वेद के संगि बह्यो सलिल मोह की धार ।
जन नामा स्वामी बीठला मोहि घेइ उतारी पार ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ५१ ।
४. तू मेरो ठाकुर तूं मेरो राजा, हो तेरे सरने आयो हो ।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १३१ ।
५. कहत नामदेउ तूं मेरो ठाकुर जनु ऊना तू पूरा ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १६१ ।
६. जपहीन तपहीन कुलहीन कमहीन ।
नामेचे सुआमी तेउ तारे ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १४८ ।

नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २७५
'हे नरहरि । मैं तुम्हारा सेवक हूँ, आवागौन के फेर से मुझे मुक्त करो ।'१
'नामदेव का स्वामी नरहरि खंभे में से प्रगट हुआ ।'२
'मुक्ति मिलने पर तथा नाम का उच्चारण करने पर स्वामी और सेवक (भक्त
और भगवान्) साथ रहे ।'३
'देवता मैले हैं, गंगाजल भी अशुद्ध है। केवल नामदेव के स्वामी निर्मल हैं,
शुद्ध है ।'४
कबीर ने भी सेव्य-सेवक भाव पर विशेष जोर दिया है। भगवान् के प्रति कबीर
का आत्मसमर्पण देखने योग्य है। वे कहते हैं—'हे स्वामी। मै तुम्हारा गुलाम हूँ। तू
मुझे जहाँ चाहे बेच डाल। तूने तो मुझे ऐसे हाट में उतार दिया है जहाँ पर तू ही
गाहक है और बेचनेवाला भी तू ही है ।'५
कबीर के विनयभाव की उत्कृष्टता अवलोकनीय है। कबीर कहते हैं—'मैं राम
का स्वामिभक्त कुत्ता हूँ और मेरा नाम मोती है। मेरे गले में राम नाम की रस्सी है
अर्थात् राम के प्रेम की रस्सी से मैं बँधा हूँ। जिधर राम मुझे खींचता है उधर ही मैं
चलता हूँ ।'६
१. नामदेव कहै मैं सेवक तेरा ।
आवा गवण निवारि हो नरहरी ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १६७ ।
२. खंभा मांहि प्रगट्यो हरी । नामदेव को स्वामी नरहरी ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १२७ ।
३. मुक्ति भऐला जाप जपेला । सेवक स्वामो संग रहेला ॥
संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ४५ ।
४. मैला सुर मैली सुरसरी । नामदेव कौ ठाकुर निरमल हरी ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १२१ ।
५. मैं गुलाम मोहि बेचि गुसाईं ।
तन मन धन मेरा रामजी के तांईं ॥ टेक ॥
आनि कबीरा हाटि उतारा ।
सोई गाहक सोई बेचनहारा ॥
—कबीर ग्रंथावली पृष्ठ १२४ ।
६. कबीर कूता राम का मुतिया मेरा नाउ ।
गले राम की जेवड़ी जित खेंचे तित जाऊँ ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ २० ।

२७६ नामदेव की हिंदी कविता
'हे रामजी ! आप पर मेरा दृढ़ विश्वास है। फिर मैं और किसी का निहोरा
क्यों करूँ ? रामचंद्रजी जैसा जिसका स्वामी हो वह और को क्यों पुकारे ?'¹
मैं उस समर्थ का सेवक हूँ जो महान् और असीम है, इसी कारण मेरा अनर्थ
नहीं हो सकता। यदि पतिव्रता नंगी रहे तो ईश्वर के लिए बड़ी लज्जा का विषय
होगा।'²
'मेरा ठाकुर, मेरा स्वामी ऐसा भक्तवत्सल है कि उसकी शरण में जाने पर वह
अपने भक्तों का उद्धार करता है।'³
ऊपर नामदेव तथा कबीर दोनों की रचनाओं में समान रूप से पाई जाने वाली
निर्गुण पक्ष की जो विशेषताएँ बताई गई हैं उनसे नामदेव और उनकी रचनाओं का
कबीर और उनकी बानी पर प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। संत मत की ये सभी विशेष-
ताएँ कबीर को नामदेव से उत्तराधिकार में मिली थीं।
संत नामदेव का निर्गुण भक्ति की ओर झुकाव पंजाब आने के पूर्व संत ज्ञाने-
श्वर के संपर्क से हो चुका था। पंजाब में इसके लिए उपयुक्त वातावरण मिला। अतः
उनकी निर्गुण भक्ति खूब विकसित हुई, जिसकी अभिव्यक्ति उनके हिंदी पदों में है।
यहाँ मैं एक बात की ओर संकेत करना चाहता हूँ और वह यह कि नामदेव के हिंदी
पदों में उनके परिपक्व अनुभव साधना के संबंध में प्रौढ़ विचार और आध्यात्मिक
समन्वयवाद का स्पष्ट निखार है। इनके मराठी अभंगों में वर्णनात्मकता अधिक है और
जहाँ भावुकता अधिक है वहीं भक्ति की विह्वलता है परंतु हिंदी पदों में आत्मानुभूति
तथा ज्ञान और भक्ति का वह सुंदर पाग है जो स्वाद लेने वाले के लिए गूँगे के गुड़
की तरह है।
वस्तुतः देखा जाय तो नामदेव की हिंदी रचना का क्षेत्र बहुत विशाल है।
१ अब मोहि राम भरोसा तेरा।
ओर कोन का करौं निहोरा ॥ टेक ॥
जाके राम सरीखा साहिब भाई।
सो क्यूँ अनत पुकारन जाई ॥
—कबीर ग्रन्थावली पद १२२, पृष्ठ १२७।
२ उस सम्रथ का दास हौं कदे न होइ अकाज।
पतिव्रता नांगी रहे तो उसकी पुरिस को लाज ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ २०।
३. दास कबीर को ठाकुर ऐसो भगत की सरन उबारे।
—कबीर ग्रन्थावली, पद १२२, पृष्ठ १२७।

नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २७७
ध्यानपूर्वक इन पदो का अध्ययन करने से यह बात निश्चित रूप से दिखाई पड़ती है कि
निर्गुण संतों की रचनाओं में जो विशेषताएँ प्राप्त होती हैं वे सभी नामदेव में हैं।
आचार्य परशुराम चतुर्वेदीजी ने भी इन्ही विशेषताओं का उल्लेख किया है—
(१) प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर सत्य का अन्वेषण
(२) सद्गुरु के महत्व का प्रतिपादन
(३) परम तत्व के साथ एकात्म भाव
(४) नाम स्मरण का आग्रह, तथा
(५) वाह्याडम्बर की व्यर्थता
संत नामदेव की हिंदी रचनाओ में ये सभी विशेषताएँ प्राप्त होती है । नामदेव
और कबीर की समान विचार-धारा की तुलना में इन विशेषताओ का उल्लेख किया जा
चुका है पर यहाँ उन्हे ओर स्पष्ट रूप से रखना चाहता हूँ।
नामदेव ने सर्वदा इस बात पर जोर दिया है कि ब्रह्म अथवा सत्य का अन्वेषण
प्रत्यक्ष अनुभव के बिना नहीं हो सकता । कहना-सुनना उसके परिचय में सहायक नही
हो सकता । कहना-सुनना जब समाप्त होगा तब उसका परिचय मिलेगा ।¹
वे बार-बार आत्मानुभव की ओर संकेत करते हैं—'रे मानव ! ईश्वर की सृष्टि
को अपने हृदय मे विचार कर देख । एक ही ईश्वर घट-घट और चराचर में समान रूप
से व्याप्त है ।'²
वे वेद और पुराण पढ़ने के बाद भी स्वतः विचार करने को अधिक महत्व देते
हैं—'हे पंडित ! तुम वेदों और पुराणो को पढ़ो और सोचो कि हरि का दास संसार से
बिलकुल अलग है ।'³
गुरु के महत्त्व के अनेक उदाहरण हम पहले दे आये हैं । 'सारा संसार भ्रम में
भूला हुआ है, निर्वाण पद को कोई पहचानता ही नही । नामदेव के गुरु ने उस परम तत्त्व
१. कहिवौ सुनिबौ जब गत होइबौ तब ताहि परचौ आवै ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६६ ।
२. कहत नामदेउ हरि की रचना देखहु रिदै विचारी ॥
घट-घट अंतरि सरब निरंतरि केवल एक मुरारी ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १५० ।
३. ऐसे जगथै दास निधारा ।
वेद पुरान मुगुत किन देषी पंडित करउ विचारा ॥ टेक ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ८२ ।

२७८ नामदेव की हिन्दी कविता
को नामदेव के बहुत ही समीप बताया ।'१
उस परम तत्त्व, पर ब्रह्म के साथ नामदेव जैसे एकाकार हो गये हैं। वे कबीर
की विरहिणी की तरह उस प्रिय से अपना संबंध जनम-जनम का बतलाते हैं ।२
और यह प्रीति कच्ची नहीं है। यह तो चातक के अनन्य भाव से भी बढ़कर
है । 'चातक पानी से भरे हुए घड़े की ओर नही जाता । मेघ से टपकने वाली बूंद का
पान किये बिना उसको संतोष नही होता । उसके स्नेह की ओर देखो ।'३
नामदेव का उस परम तत्त्व से जो संबंध है वह लहर और सरोवर तथा मछली
और पानी का है ।४
नामदेव की हिंदी रचनाओं में नाम-स्मरण का आग्रह बारंबार दिखाई पड़ता
है। वे यहाँ तक कहते हैं कि यदि जीभ से राम नाम का उच्चारण न हो तो वह किस
काम की ?५
उन्हें ज्ञात है कि राम-नाम के स्मरण बिना यम के जाल से छुटकारा नहीं है।
अत. वे अपने आलसी मन को सचेत करते हैं ।६
नामदेव को पूरा विश्वास है कि राम के भजन के अतिरिक्त उद्धार का अन्य
१. निरबाने पद कोइ चौन्है झूठे भरम भुताइला ।
प्रणवत नामा परम तत रे सत गुरु निकटि बताइला ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १६ ।
२. लागो जनम जनम की प्रीति, चित नही बीसरै रे ॥ टेक ॥
—संत नामदेव को हिंदी पदावली, पद १३६ ।
३. भर्यो सरवर लहरया जाइ धायौ नहीं पपीहरो रे ॥
तेन्हो घन बिन तपति न याइ, जोवो तेन्हौ नेहरो रे ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १३६ ।
४. हरि सरवर जन तरंग कहावै ।
सेवग हरि तजि कहूँ कत जावै ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ७ ।
तू सायर मे मछ्छा तोरा । —संत नामदेव को हिंदी पदावली, पद ४६ ।
५. जो बोले तौ रामहि बोलि ।
नही तर वदन कपाट न खोलि ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ११६ ।
६. अपने राम कूँ भज ले आलसीया । राम बिना जम जाल सीया ॥टेक॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६३ ।

नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २७६
कोई मार्ग है ही नहीं। 'तुम करोड़ो उपाय क्यों नही करते, राम भजन के बिना भव
सागर को पार करना दुस्तर है।'१
नामदेव बाह्याडम्बर के बहुत विरोधी है। ब्राह्मण वेद पढ़ने का आडम्बर करते
है तो मुसलमान रोजा और नमाज का । नामदेव कहते है कि जब तक मन में भ्रान्ति है
तब तक इन सबका कुछ उपयोग नही।२
ऐसे आडम्बर-प्रेमियों को नामदेव ने पूरी खबर ली है। साधनो ही को महत्त्व
देने वाले भक्तों पर वे व्यंग्य करते है ।३
उपरि-उल्लिखित सब तथ्यो पर विचार करने पर आचार्य विनयमोहन शर्मा का
यह निष्कर्ष समीचीन जान पड़ता है।४
नामदेव तथा कबीर का काल
यद्यपि यह सर्वमान्य तथ्य है कि संत नामदेव कबीर के पहले हुए थे किन्तु यहाँ
में एक बार पुनः इन दोनों के कालों पर विचार कर लेना चाहता हूँ ताकि दोनों का
काल-क्रम स्पष्ट रूप से निश्चित किया जा सके। बड़े खेद की बात है कि कुछ लोगों ने
नामदेव और कबीर को समकालीन भी माना है।
नामदेव का जन्मकाल शके ११९२ (सन १२७० ई०) प्रसिद्ध है।५ महाराष्ट्र
१. राम भगति बिन गति न तिरन की। कोटि उपाइ जु करही रे नर ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६२ ।
२. ब्रह्मा पढ़ि गुणि वेद सुनावै । मन की भ्रांति न जावै ॥
करम करै सो सूझै नाही। बहुतक करम कराई ॥
मास दिवस लग रोजा साधै । कलमा बांग पुकारै ।
मनमें काती जीव संघारै । नाव अलह का सारै ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६४ ।
३. मन मैले की सुधि नहिं जाणी । साबन सिला सराह्रै पाणी ॥
४. 'नामदेव में उत्तरी भारत के संत मत की सारी विशेषताएँ विद्यमान हैं। इसीलिए
हम उन्हे उत्तर भारत में निर्गुण भक्ति मत का प्रथम प्रचारक और प्रवर्तक तथा
कबीर आदि संतों का पथ-प्रदर्शक मानते हैं।'
—हिंदी को मराठी संतों की देन, पृष्ठ १२८ ।
५. अधिक ब्याण्णव गणित अकरा शतें । उगवता आदित्य तेजोराशी ।
शुक्ल एकादशी कार्तिकी रविवार । प्रभव संवत् शालिवाहन शके ॥
—सकल संत गाथा, अभंग १२५४ ।

२८० नामदेव की हिन्दी कविता
के विद्वानों में इस काल के संबंध में कोई मतभेद नहीं है। कुछ विद्वानों ने हिंदी कविता
में वर्णित घटनाओं के आधार पर नामदेव का काल कुछ बाद में खींचने का प्रयत्न
किया है।
डॉ० मोहनसिंह 'दीवाना' ने अपनी पुस्तक 'भक्त शिरोमणि नामदेव' की नई
जीवनी, नई पदावली, में नामदेव के काल को ई० स० १३६० और १४५० के बीच
माना है। इसका आधार उन्होंने नामदेव का मृत गाय जिलानेवाला पद¹ माना है।
इस संदर्भ में डॉ० राजनारायण मौर्य का मत दृष्टव्य है।²
डॉ० मोहनसिंह ने फिरोजशाह बहमनी को ही वह सुलतान माना है जिसने
नामदेव को मृत गाय जिलाने की आज्ञा दी थी। वह दक्षिण में था और उसका काल
सन् १३६७ से १४२२ ई० के मध्य का है। अन्य फिरोज सुलतान फिरोज शाह खिलजी
(राज्य काल सन् १२८२ से १२६६ तक) के साथ नामदेव के काल का मेल नहीं बैठता
और फिरोज शाह तुगलक (राज्य काल १३५१ ई० से १३८८ ई० तक) के साथ स्थान
का मेल नहीं बैठता क्योंकि फिरोज शाह न तो दक्षिण में आया था और न संत नामदेव
दिल्ली ही गये थे। अत इसी आधार पर डॉ० मोहनसिंह ने नामदेव का काल खींचकर
आगे बढ़ा दिया है। उन्होंने एक और तर्क दिया है। वह है संत नामदेव का रामानन्द
का शिष्य होना। वे रामानन्द का जन्म सन् १४२० और ३० ई० के बीच तथा कबीर
का सन् १४५० और ६० ई० के बीच मानते हैं।
डॉ० मोहनसिंह के इन दोनों तर्कों में कोई तथ्य नहीं है। इसका तो कहीं उल्लेख
भी नहीं है कि रामानन्द नामदेव के गुरु थे। महाराष्ट्र और हिंदी साहित्य में भी यह
१ सुलतानु पूछे सुनु बे नामा। देखउ राम तुम्हारे कामा॥
—गुरु ग्रन्थ साहब, नामदेव के हिंदी पद, पद ४७।
२. 'यहाँ एक बात विशेष उल्लेखनीय है कि डॉ० मोहनसिंह ने गुरु ग्रंथ साहब के
जिस पद के आधार पर गाय जिलाने की घटना का जिक्र किया है वह पद नामदेव
रचित मानने में मुझे संदेह है। काशी नागरी प्रचारिणी सभा में मुझे एक हस्त
लिखित संतों की परचई प्राप्त हुई है जिसमें नामदेव की भी परचई है। इसका
लिपिकाल स० १७४० और रचयिता कृष्णानंद हरीदास हैं। नामदेव की परचई
में (जो दोहे और चौपाई में है) मृत गाय जिलाने का वर्णन है जिसकी शब्दावली
गुरु ग्रंथ साहब के इस पद से बहुत मिलती जुलती है। भाषा और वर्ण्य विषय की
दृष्टि से भी यह पद संदेहात्मक है।'
—हिंदुस्तानी (जनवरी १९६२), पृष्ठ ११२।

नामदेव . हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २८१
प्रचलित है कि संत ज्ञानेश्वर के पिता के गुरु रामानन्द थे । किन्तु श्री भावे १ के अनुसार
उनके गुरु श्रीपाद स्वामी थे । रामानन्द का काल आज भी निश्चित नहीं है । पर इतना
अवश्य निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि ये संत नामदेव के गुरु नहीं हो सकते ।
नामदेव के गुरु विसोबा खेचर थे जो नाथ परंपरा के एक सिद्ध योगी थे ।
कबीर की रचनाओं में नामदेव का नाम आया है ।२ परन्तु नामदेव की रचना
में कबीर का नाम कहीं भी नहीं आया है । अतः यह निर्विवाद सिद्ध हो जाता है कि
नामदेव कबीर के पूर्ववर्ती है । एक ओर ध्यान देने योग्य बात यह है कि नामदेव और
कबीर के परवर्ती संतों ने बड़ी ही श्रद्धा से इन दोनों का नाम लिया है पर प्रायः नाम-
देव का नाम कबीर के पहले मिलता है ।
इसका तात्पर्य यह नहीं है कि कबीर का नाम नामदेव के पूर्व कही आया ही
नहीं है । छंद रचना में जहाँ जो शब्द बैठ गया वहाँ रख दिया गया है । फिर भी नामों
का क्रम देखकर लगता है कि ये रचयिता संत नाम-क्रम के प्रति सचेत अवश्य थे ।
१. महाराष्ट्र सारस्

२८२ नामदेव की हिन्दी कविता
कबीर का काल निर्णय
संत कबीर का जन्म-काल यद्यपि आज भी विवाद-रहित नहीं है फिर भी कबीर
के काल निर्णय के संबंध में जितने भी लोगों ने विचार किया है, उनमें से अधिकांश ने
उनका जन्म काल संवत् १४५५ और मृत्युकाल संवत् १५७५ माना है।
कबीर पंथियों में कबीर के आविर्भाव के सम्बन्ध में निम्नांकित दोहा प्रचलित
है।१ इस उल्लेख से कबीर की जन्म-तिथि संवत् १४५५ को ज्येष्ठ की पूर्णिमा प्रामा-
णिक प्रतीत होती है।
कबीर के काल निर्णय में तीन ऐसे प्रमुख ऐतिहासिक व्यक्ति हैं जो बाधक या
सहायक हैं—रामानन्द, सिकंदर लोदी और नवाब बिजली खाँ।
रामानन्द को कबीर का गुरु कहा जाता है। इसी बात को सिद्ध करने के लिए
दोनों को खींचकर, तान कर, एक साथ लाने का प्रयत्न किया जाता है।
सिकन्दर लोदी (सन् १४८८-१५१७ ई०) और कबीर की भेंट काशी में
बताई जाती है। अतः कबीर और सिकंदर लोदी का भी एक साथ होना आवश्यक है।
वेस्टकॉट, स्मिथ, भांडारकर, मेकालिफ, फहूँहर, ईश्वरी प्रसाद आदि इतिहासकारों ने
भी कबीर को सिकंदर लोदी का समकालीन माना है।
'आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया' में लिखा है कि बिजली खाँ ने कबीर
का स्मारक बनवाया था। अतः बिजली खाँ को भी कबीर का समकालीन होना
चाहिए।
परिणाम-स्वरूप इन चारों ऐतिहासिक व्यक्तियों को किसी प्रकार आगे पीछे
करके एक साथ लाया जाता है। देखना यह है कि क्या सचमुच ये चारों सम-
कालीन हैं?
(१) रामानन्द का काल, सं० १३५६-१४६७।
(२) सिकन्दर लोदी का शासन काल, सं० १५४५-१५७५।
(३) नवाब बिजली खाँ द्वारा बनाया गया कबीर का स्मारक, सं० १५०७।
यदि कबीर का काल सं० १४५५ से १५७५ तक माना जाय तो वे रामानन्द
के शिष्य नहीं हो सकते, इसलिए लोगों ने रामानन्द की प्रामाणिक तिथि और आगे

१. चौदह सौ पचपन साल गए चंद्र वार एक ठाट ठए।
जेठ सुदी बरसायत को पूरनमासी प्रकट भए ॥
—कबीर चरित्र बोध, पृष्ठ ६।
(बोधसागर, स्वा० युग़लानन्द द्वारा संशोधित)