सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७४ नामदेव की हिन्दी कविता
(८) सेव्य सेवक भाव—भक्तों में सेव्य-सेवक भाव सदैव से ही सामान्य रहा
है। नामदेव ने अपनी भक्ति में सेव्य-सेवक भाव को विशेष महत्त्व दिया है। उनकी हिंदी
पदावली में संगृहीत पदों से यह बात स्पष्ट प्रकट होती है।
नामदेव कहते हैं—'राम भक्ति की बडी प्रबल अभिलाषा मेरे मन में घर कर
गई है। शेष सभी अभिलाषाओं का मैंने त्याग किया। उस राम के चरणों की वंदना
करते हुए निष्काम नामदेव कहते हैं—'तुम मेरे स्वामी हो और मे तुम्हारा दास हूँ।'¹
'नामदेव राम के अनुरूप है और राम नामदेव के अनुरूप है। हे राम! तुम
मेरे मालिक हो और मे तुम्हारा सेवक हूँ।'²
'लोग वेदों के साथ मोह-नदी की तेज धारा में बह गये। हे नामा के स्वामी
विट्ठल ! मुझे पार उतार दो।'³
'हे स्वामी ! तुम मेरे ठाकुर हो, मेरे राजा हो, मैं तुम्हारी शरण में
आया हूँ।'⁴
नामदेव कहते हैं—'तुम मेरे स्वामी हो। तुम्हारा भक्त अपूर्ण है और तुम पूर्ण
हो। इससे उसे तुम्हारे आश्रय की आवश्यकता है।'⁵
'नामदेव के स्वामी विट्ठल ने अपने जपहीन, तपहीन, कुलहीन और कर्महीन
भक्त का उद्धार किया।'⁶
१. ऐकल चिंता राहिली निता छूटे सब आसा ।
प्रणवत नामा भये निहकामा तुम ठाकुर मै दासा ।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६
२. राम सो नामा, नाम सो रामा । तुम साहिब मै सेवक स्वामा ॥टेक॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ७ ।
३. लोग वेद के संगि बह्यो सलिल मोह की धार ।
जन नामा स्वामी बीठला मोहि घेइ उतारी पार ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ५१ ।
४. तू मेरो ठाकुर तूं मेरो राजा, हो तेरे सरने आयो हो ।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १३१ ।
५. कहत नामदेउ तूं मेरो ठाकुर जनु ऊना तू पूरा ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १६१ ।
६. जपहीन तपहीन कुलहीन कमहीन ।
नामेचे सुआमी तेउ तारे ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १४८ ।