सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
२४० नामदेव की हिन्दी कविता
पंजाबी
पंजाबी के केवल ये दो उदाहरण हैं—
मिलसी (१०१-१) 'मिलना' का भविष्यत् काल का रूप
मुनै (१०१ १) मुझे
अरबी और फारसी का प्रभाव
नामदेव की हिंदी में निम्नलिखित अरबी के शब्द मिलते हैं—
कलमा (६४-६) कलमा = प्रार्थना
अलह (६४-१०) अल्हा-परमात्मा
रोजा (६४-६) रोजा = व्रत, उपवास
कूं त मसाहति (२-८) तर्क वितर्क
फारसी के शब्द
आलम (१३१-३) विश्व
दुनी (१३१-३) दुनिया
अवदालव (६४-१) साधु, फकीर जैसा
इजार (६४-५) रस्सी, डोरी, नाड़ा
गुजार (६४-६) गुजारना = बीताना
ताज कुलह (६४-२) मुकुट और टोपी
निवाजी (६४-६) नमाज
पोस (६४-३) पोश = आवरण
मसीती (६४-६) मसजिद
मुलाना (६४-६) उपाध्याय
सहर (६४-८) शहर
सहनक (६०-४) थाली, प्लेट
बाँग (६४-६) बुलावा
खसम (७६-२) खसम = पति
साहिब (४१-१०) स्वामी
स्याही (७७-१) स्याही—
रूप रचना
रूप रचना की दृष्टि से नामदेव की हिंदी ब्रजभाषा के रूपों से बहुत साम्य
रखती है। सभी नव्य भारतीय आर्य भाषाओं की तरह इसमे भी दो वचन हैं। यद्यपि
नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २४१
अधिकतर संज्ञाओ का रूप दोनों वचनों में एक ही है किंतु तिर्यक् रूपों में बहुवचन का
निर्देश स्पष्ट रूप से प्राप्त होता है । जैसे—
वन्दहि, आंखिन, स्रवनहि आदि ।
करण कारक के रूपों में भी इसी प्रकार का संकेत है । जैसे—
भुवंगहि, भँवरहि, नैनौ, लोगनि, संवनि आदि ।
कुछ स्थानों पर बहुवचन प्रकट करने के लिए अनेकता सूचक शब्दो का प्रयोग
है । यथा—
अन्धा लोग, योगी जन आदि ।
अ, उ, ऊ, ओ ओर औ से अंत होने वाली संज्ञाएँ प्रायः पुल्लिंग हे तथा आ,
इ, ई से अन्त होने वाली संज्ञाएँ स्त्रीलिंग । इसमें कुछ अपवाद भी है ।
पुल्लिंग से स्त्रीलिंग बनाने के लिए इ या ई प्रत्यय जोड़े गये हैं । जैसे—
बेटा—पु० बेटी—स्त्री०
देव—पु० देवी—स्त्री०
भृङ्ग—पु० भृङ्गी—स्त्री०
कही-कही 'नी' प्रत्यय भी मिलता है—
जैसे नट—पु० नटनी—स्त्री०
[
२४२ नामदेव की हिन्दी कविता
भिक हिंदी की वियोगात्मक प्रवृत्ति का सूचक है। नामदेव की भाषा में निम्नलिखित
परसर्ग प्रयुक्त हुए हैं—
अन्तरि, आगे, आगै, काज, कारणि, तनि, नाई, निकटि, पर, विच, विचि,
बिन, बिना, भांति, भीतरि, मधि, मधै, महि, मझि, मारे, माहि, माही, रहित, रहिता,
लगि, लागि, लाग्यौ, स्वारथ, संगै, संगि, सनमुख, सहित, सहिता, सा, सी, से, सोह, सो,
हो, हेत।
संयुक्त परसर्ग—
के अन्तरि, के आगे, के निकटि, के मारे,
की नाई, कै संगि।
ध्वनि
नामदेव की हिंदी पदावली की भाषा में नव्य भारतीय आर्य भाषा की सभी
ध्वनियों का प्रयोग है, किन्तु अन्य भाषाओं की तरह 'ष' और 'ऋ' ध्वनि का प्रयोग
केवल परंपरागत है। उसका उच्चारण 'स' और 'रि' की तरह होता था। कुछ स्थानो
पर 'ष' के स्थान पर 'स' और 'ऋ' के स्थान पर 'रि' का प्रयोग भी मिलता है।
☐ ☐
षष्ठ अध्याय
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्य धारा के प्रारम्भकर्त्ता
हिंदी निर्गुण काव्य सम्बन्धी लेखन का परिचय
निर्गुण साहित्य सम्बन्धी आलोचनात्मक ग्रन्थ
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित निर्गुण मत सम्बन्धी आलोचनात्मक लेख
संत मत के प्रारम्भकर्ता के रूप मे नामदेव के प्रति संकेत
नामदेव के निर्गुण धारा के प्रारम्भ कर्ता न माने जाने के कारण
(क) नामदेव की रचनाओं का हिंदी में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध न होना
(ख) कबीर का प्रखर व्यक्तित्व और उनके विचारों का प्रभाव,
कबीर को क्रांतिकारी बनाने वाली परिस्थितियां,
नामदेव और कबीर की रचनाओ की तुलना
(१) कर्म और वैराग्य का समन्वय
(२) भेदभाव विहीनता
(३) ब्रह्म की निर्गुणता
(४) अनन्य प्रेम भावना
(५) सर्वात्मवाद और अद्वैत भावना
(६) निर्गुण भक्ति
(७) नाम साधना
(८) सेव्य सेवक भाव
सन्त नामदेव का निर्गुण भक्ति की ओर झुकाव
आचार्य परशुराम चतुर्वेदीजी की बताई हुई निर्गुण सन्तों की रचनाओ
की विशेषताएं
नामदेव की रचनाओ से इन विशेषताओ के उदाहरण
नामदेव तथा कबीर का काल
डॉ० मोहनसिंह 'दीवाना' का मत
श्योर का काल निर्णय
डॉ० रामप्रसाद त्रिपाठी का मत
डॉ० राजनारायण मौर्य का मत
डॉ० रामकुमार वर्मा का मत
डॉ० राममूर्ति त्रिपाठी का मत
निर्गुण पथ के प्रवर्त्तक नामदेव
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्य धारा के प्रारंभकर्त्ता
हिंदी निर्गुण काव्य सम्बन्धी लेखन का परिचय—हिंदी निर्गुण काव्य और
उसके रचयिताओं के बारे में लगभग चार सौ वर्षों से कुछ न कुछ लिखा जाता रहा है।
प्रारंभिक लेखन में 'भक्तमाल' और परिचर्या जैसी दूसरी रचनाओं का बहुत अधिक
महत्व है। नाभादास कृत 'भक्तमाल' इस परंपरा का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ है। इसमें १६ वीं
शताब्दी तक के लगभग सभी संतों और भक्तों के संबंध में कहा गया है। यह बात अवश्य
है कि इसमें संत साहित्य की समीक्षा न करके संतों के महत्व पर ही अधिक बल दिया
गया है। 'भक्तमाल' में लगभग सभी निर्गुण संतों के कार्य और महत्त्व के संबंध में लिखा
गया है। इसी तरह प्रियादास और रूपकला के भक्तमाल भी हैं।
भक्ति काल के संतों के महान् व्यक्तित्व और कल्याणकारी संदेशों से प्रभावित
होकर उनके अनुयायियों ने इनके चरित्र और व्यक्तित्व को जनता के मार्ग दर्शन के लिए
छन्दोबद्ध किया। संतों के जीवन-चरित्र समय-समय पर अनेक बार लिखे गये। ये
जीवन-चरित्र 'परिचर्या' के रूप में लिखे गये हैं। इनमें संतों के जीवन-चरित का परिचय
बड़े विस्तृत रूप में दिया गया है। संत काव्य में निम्नलिखित संतों की परिचर्यायें प्राप्त
होती हैं—
(१) कबीरजी की परचै
(२) नामदेवजी की परचै
(३) पीपाजी की परिचई
(४) त्रिलोचनजी की परचई
(५) रैदासजी की परचई
(६) मलूकदासजी की परचई
(७) जगजीवन साहब की परचई
(८) चरनदासजी की परचई
(६) दादू जनम लीला परची
(१०) रंका बंका की परचई
२४६ नामदेव की हिन्दी कविता
इनमें अनन्तदास कृत नामदेव की परिचयी महत्वपूर्ण है। प्राचीन संत कवियों के
संबंध में नाभादास का 'भक्तमाल' बहुत प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है। अनन्तदास की
परिचयी इससे भी पूर्व की है। भक्तमाल के रचनाकाल के संबंध में पूर्ण मतैक्य नहीं
है। डॉ० दीनदयालु गुप्त ने इसका रचनाकाल सं० १६८० वि० माना है।१ अनन्त-
दास कृत नामदेव की परिचयी का रचनाकाल सं० १६४५ वि० है।२
(१) निर्गुण साहित्य सम्बन्धी आलोचनात्मक ग्रंथ—निर्गुण साहित्य संबंधी
विभिन्न भाषाओं में समीक्षात्मक ग्रंथ उपलब्ध होते हैं जिनका आधार लेकर कबीर की
विचार धारा स्पष्ट रूप से समझी जा सकती है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में भी एतद्-
विषयक निबन्ध प्रकाशित होते रहे हैं। जिन भाषाओं में निर्गुण साहित्य के ग्रंथ प्राप्त
होते हैं वे निम्नलिखित हैं—
(क) हिंदी में निर्गुण विचारधारा संबंधी आलोचनात्मक ग्रंथ
(ख) अंग्रेजी में निर्गुण विचार धारा संबंधी बालोचनात्मक ग्रंथ
(ग) उर्दू में निर्गुण विचार धारा संबंधी आलोचनात्मक ग्रंथ
(घ) विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित निर्गुण मत संबंधी आलोचनात्मक
लेख।
(क) हिंदी आलोचनात्मक ग्रन्थ
अधिकतर ग्रन्थ कबीर पर लिखे गये हैं किन्तु उनके अन्तर्गत निर्गुण साहित्य का
पूरा विवेचन मिलता है। कबीर के अध्ययन का श्रीगणेश सन् १६०० ई० के लगभग
मानना होगा। हिंदी में ऐसी अनेक पुस्तकें प्राप्त होती हैं जिनमें किसी न किसी प्रकार
कबीर तथा निर्गुण पंथ की चर्चा की गई है। उनमें से कुछ महत्वपूर्ण ग्रन्थों का बहुत ही
संक्षेप में परिचय दिया जा रहा है।
(१) कबीर मंसूर—कबीर पर सबसे पहली पुस्तक 'कबीर मंसूर' ई. स.
१६०२-३ में प्रकाशित हुई। साहित्य की दृष्टि से यह रचना साधारण कोटि की है किन्तु
कबीर पर प्रथम पुस्तक होने के कारण इसका महत्त्व बढ़ जाता है।
इसके पश्चात् 'कबीर ज्ञान' (ई. स. १६०४) 'कबीर साहब का जीवन चरित्र'
(ई. स १६०५) 'कबीर कसौटी' (ई. स. १६०६) आदि ग्रन्थ भी प्रकाशित हुए।
(२) कबीर वचनावली—इसका संपादन पं० अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध'
१. अष्टछाप और वल्लभ संप्रदाय पृष्ठ १०६।
२. नामदेव की परिचयी (हस्तलिखित ग्रन्थ) क्रमांक ३६८।
—जयकर ग्रन्थालय, पूना विश्वविद्यालय, पूना।
तृतीय भाग: गुरुग्रन्थ साहिब संकलित ६१ पद एवं सन्त नामदेव उपसंहार
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २४७
ने संवत् १९७३ में किया 'हरिऔध' जी ने कबीर को साहित्यिक, सैद्धांतिक और जीवन
संबंधी बातों की चर्चा आलोचनात्मक ढंग से की है।
(३) कबीर ग्रंथावली—इसका संपादन डॉ० श्याम सुंदरदास ने संवत् १९८५
में किया। वे रामानंद को कबीर का मानस गुरु मानते हैं। उन्होंने कबीर के प्रेमतत्त्व
पर सूफियों का प्रभाव स्वीकार किया है। साथ ही यह भी कहा है कि उनमें भारतीयता
का पुट भी कम नहीं है। वे नामदेव के महत्व को स्वीकार करते हुए भी कबीर को
निर्गुण धारा का प्रवर्तक मानते हैं।१
(४) 'मिश्र बंधु 'विनोद'—मिश्र बंधुओं द्वारा लिखित 'मिश्र बंधु विनोद' सन्
१९१३ ई० (सं० १९७०) में प्रकाशित हुआ जिसमें कबीर के सम्बन्ध में विस्तृत
विवेचन किया गया है।
(५) हिंदी साहित्य का इतिहास—आचार्य शुक्ल का यह अद्वितीय ग्रन्थ सन्
१९२९ (संवत् १९८६) में प्रकाशित हुआ। वे मानते हैं कि निर्गुण पंथ के प्रवर्तक
कबीर ही थे।२
(६) कबीर—सन् १९४१ (संवत् १९९८) में डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी का
'कबीर' नामक ग्रन्थ प्रकाशित हुआ। कबीर साहित्य पर पड़े हुए विभिन्न प्रभावों और
कबीर के दार्शनिक विचारों पर प्रकाश डालना ही उनका प्रमुख लक्ष्य रहा है।
(७) उत्तरी भारत की सन्त परम्परा—संत साहित्य के मर्मज्ञ आचार्य पं०
परशुराम चतुर्वेदी का यह ग्रन्थ संवत् २००७ में प्रकाशित हुआ। इसमें लगभग २००
पृष्ठों में कबीर के जीवन, साहित्य, सिद्धांत और साधना के सम्बन्ध में स्वतन्त्र रूप से
विचार किया गया है। संत मत एवं इससे संबंधित पंथों का विशेष ज्ञान प्राप्त करने के
लिए इसका अध्ययन महत्त्वपूर्ण है।
(८) हिंदी की निर्गुण काव्य धारा और उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि—डॉ०
गोविंद त्रिगुणायत का यह आगरा युनिवर्सिटी द्वारा डी० लिट्० की उपाधि के लिए
स्वीकृत शोध प्रबन्ध है। इसका प्रथम संस्करण सं० १९६१ ई० में प्रकाशित हुआ।
इस ग्रन्थ में हिंदी की निर्गुण काव्यधारा और उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि का सांग,
१. 'कबीर इस निर्गुण भक्ति प्रवाह के प्रवर्तक हैं परंतु भक्त नामदेव इनसे भी पहले
हो गये थे; ये पहले सगुणोपासक थे परंतु आगे चलकर इनका झुकाव निर्गुण
भक्ति की ओर हो गया।'
—कबीर ग्रंथावली—भूमिका, पृष्ठ १५।
२. 'जहाँ तक पता चलता है निर्गुण मार्ग के निर्दिष्ट प्रवर्तक कबीर ही थे।'
—हिंदी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ ७२।
२४८ नामदेव की हिन्दी कविता
व्यवस्थित, पाण्डित्यपूर्ण और अनुसंधानात्मक विवेचन किया गया है। अब तक निर्गुण
विचार धारा और उसके मूल स्रोतों का अध्ययन उपेक्षित रहा। डॉ० त्रिगुणायत ने
प्रस्तुत ग्रंथ द्वारा इस अभाव की पूर्ति की है। इनके अनुसार निर्गुण काव्य धारा के
प्रवर्त्तक कबीर हैं।१
(६) हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास- डॉ० रामकुमार वर्मा का यह
इतिहास सन् १९३८ ई० में प्रकाशित हुआ। इसमें साहित्य की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को
अपनी विशेष दृष्टि से देखने का प्रयत्न किया गया है। डॉ० वर्मा ने कबीर को संत मत
का प्रचारक माना है।२
(१०) हिंदी काव्य में निर्गुण सम्प्रदाय-डॉ० पीतांबरदत्त बड़थ्वाल । रचना-
काल सन् १९३६ ई०। इस पुस्तक की मूल प्रति डॉक्टरेट की उपाधि के निमित्त
थीसिस के रूप में लिखी गई थी। इसमें निर्गुण कवियों का व्यवस्थित अध्ययन प्रस्तुत
किया गया है। पुस्तक अपने ढंग की अकेली है। मेरे विचार से निर्गुण काव्य के
सम्बन्ध में यह सर्वाधिक प्रामाणिक और अधिकारपूर्ण रचना है। इसके महत्त्व को
समझकर ही आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने सन् १६५० ई० (संवत् २००७) में मूल
अंग्रेजी पुस्तक का हिंदी अनुवाद प्रकाशित कराया है।
यद्यपि इसके पूर्व भी हिन्दी साहित्य के इतिहास ग्रन्थो और दूसरो रचनाओ में
निर्गुण साहित्य के बारे में चर्चा की गई है किन्तु जिस गम्भीरता और प्रामाणिकता के
साथ डॉ० बड़थ्वाल ने निर्गुण साहित्य पर लिखा है उतनी गंभीरता और प्रामाणिकता
अन्यत्र नहीं है। डॉ० बड़थ्वाल के पूर्व तक निर्गुण काव्य धारा के प्रवर्त्तक संत कबीर
माने जाते रहे। यद्यपि आज भी निर्गुण काव्य धारा के प्रवर्त्तक रूप में कबीर को ही
मान्यता है किन्तु सम्भवतः डॉ० बड़थ्वाल पहले विद्वान् थे जिन्होंने निर्गुण काव्य धारा के
प्रवर्त्तक के रूप में नामदेव की ओर संकेत किया है।३ डॉ० बड़थ्वाल के बाद भी कबीर
१. निर्गुण काव्य धारा के प्रमुख प्रवर्त्तक संत कबीर माने जाते हैं।'
—हिन्दी की निर्गुण काव्य धारा और उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि, पृ० १४।
२. 'इस मत ( संत मत ) के प्रचारक कबीर थे। उन्होंने उसको एक विशिष्ट रूप
दिया।'
— हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास, पृ० ६३
३. 'निर्गुण संत विचार धारा को कबीर के द्वारा पूर्णता प्राप्त हुई।'
—हिन्दी काव्य में निर्गुण सम्प्रदाय, पृ० १४।
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २४६
तथा निर्गुण काव्य धारा पर विचार करने वाले लोगो ने अधिकतर कबीर को ही
उसका प्रवर्तक माना है ।
कबीर सम्बन्धी उर्दू आलोचनात्मक ग्रन्थ
(१) 'सम्प्रदाय' ( रचना काल सन् १६०६ ई० )
लेखक: प्रोफेसर बी० बी० रॉय ।
(२) 'कबीर और उनकी तालीम' ( रचना काल सन् १६१२ ई० )
(३) 'कबीर पंथ ।'
इन दोनो ग्रन्थों के लेखक महर्षि शिवव्रतलाल हैं ।
(४) 'कबीर साहब' (रचना काल ई० स० १६३०)
लेखक : मनोहरलाल जुत्शी ।
ये सभी साधारण कोटि की पुस्तकें हैं । कबीर संबन्धी प्रारम्भिक ज्ञान प्राप्त
करने के लिए इनका महत्त्व अवश्य है ।
कबीर सम्बन्धी अंग्रेजी आलोचनात्मक ग्रन्थ
(१) प्रॉफिट्स ऑफ इंडिया:—सन् १६०४ ई० में श्री मन्मथनाथ गुप्त की इस
पुस्तक का उर्दू अनुवाद 'रहनुमायाने हिंद' बाबू नारायणप्रसाद वर्मा द्वारा अहमदी प्रेस
अलीगढ़ से प्रकाशित कराया गया है ।
इस ग्रन्थ के प्रकाशन के बाद अंग्रेजी में कबीर सम्बन्धी जितनी भी पुस्तकें
प्रकाशित हुई है प्रायः सभी में 'प्रॉफिट्स ऑफ इंडिया' का किसी न किसी रूप में उपयोग
अवश्य किया गया है ।
(२) कबीर एण्ड कबीर पंथ—प्रकाशन काल सन् १६०७ ई० । इसके लेखक
रेह्वरंड जी० जी० एच० वेस्टकट है। इस पुस्तक से कबीर की विचार धारा के सम्बन्ध
में बहुत ज्ञात नही होता ।
(३) हंड्रेड पोएम्स ऑफ कबीर—कवीन्द्र रवीन्द्र ने सन् १६१५ में कबीर के
चुने हुए १०० पदों का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया । इसकी भूमिका अंग्रेजी की
प्रसिद्ध विदुषी ईवोलिन अंडरहिल ने लिखी है ।
(४) 'वैष्णविज्म शैविज्म ॲण्ड अदर मायनर रिलीजस सिस्टम्स'—डॉ०
रा० गो० भांडारकर ने अपनी इस पुस्तक में वैष्णव धर्म, शैव धर्म आदि विभिन्न
सम्प्रदायों के उदय और विकास का इतिहास प्रस्तुत किया है और प्रसंगवश रामानन्द
तथा कबीर की भी चर्चा की है । कबीर के जन्म और उनके दार्शनिक विचारों का विशेष
रूप से प्रतिपादन लेखक के मौलिक दृष्टिकोण का परिचायक है ।
२५० नामदेव की हिन्दी कविता
(५) कबीर अंड हिज फॉलोअर्स—डॉ० एफ० ई० की द्वारा लिखित यह शोध
प्रबन्ध ऑक्सफर्ड युनिव्हर्सिटी में डी० लिट्० की थीसिस के रूप में प्रस्तुत किया गया
था और स्वीकृत होकर सन् १६३१ में प्रकाशित हुआ । कबीर सम्बन्धी निर्णय में डॉ०
की ने वेस्टकाट की अपेक्षा उदारता का परिचय दिया है । उन्होंने कबीर के दार्शनिक
सिद्धान्तो एवं विचारो पर अधिक प्रकाश डालकर कबीर के जीवन वृत्त और कबीर पंथ
का ही खोजपूर्ण विवेचन प्रस्तुत किया है ।
(६) दि निर्गुंण स्कूल ऑफ हिंदी पोएट्री—रचना काल सन् १६३६ ई० ।
लेखक डॉ० पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल । इस पुस्तक का परिचय हिंदी के आलोचनात्मक
ग्रन्थो में दिया जा चुका है ।
पत्र-पत्रिकाएं
इन ग्रन्थों के अतिरिक्त कबीर पर समय-समय पर विद्वत्तापूर्ण लेख लिखे गये
हैं । ये प्राय निम्नलिखित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं—
(१) नागरी प्रचारिणी—इस पत्रिका के चौदहवें भाग में पंडित चन्द्रबली पाण्डेय
का 'कबीर का जीवन वृत्त' नामक निबन्ध छपा है और भाग १६ में डॉ० पीताम्बरदत्त
बड़थ्वाल ने कबीर का जीवन वृत्त प्रस्तुत किया है । इसी भाग में सूर्यकिरण पारीक का
'राजस्थानी हिंदी और कबीर' शीर्षक निबंध भी प्रकाशित हुआ है ।
(२) हिन्दुस्तानी—'हिन्दुस्तानी' भाग दो (अप्रैल १६३२) में डॉ० रामप्रसाद
त्रिपाठी का 'कबीर जी का समय' शीर्षक निबन्ध विशेष महत्त्वपूर्ण है जिसमें कबीर का
समय निश्चित करने का प्रयास किया गया है ।
इसी त्रैमासिक पत्रिका के भाग २३ अंक १ (जनवरी मार्च १६६२) में
डॉ० राजनारायण मौर्य का 'हिन्दी साहित्य में संत मत के आदि प्रवर्तक : संत नामदेव'
शीर्षक विद्वत्तापूर्ण लेख छपा है ।
(३) सम्मेलन पत्रिका—'सम्मेलन पत्रिका' भाग ५३, संख्या—१, २ (पौष-
ज्येष्ठ शक १८८६) में राममूर्ति त्रिपाठी का 'निर्गुंण मत के प्रवर्तक नामदेव या कबीर'
शीर्षक लेख प्रकाशित हुआ है । उनके अनुसार निर्गुंण सम्प्रदाय के प्रवर्तन का श्रेय
कबीर को ही दिया जाना चाहिए ।
(४) कल्याण—'कल्याण' के 'योगांक' में आचार्य क्षितिमोहन सेन का 'कबीर
का योग वर्णन' नामक निबन्ध कबीर पर योगिक प्रभाव सिद्ध करने की दिशा में एक
स्तुत्य प्रयास है ।
(५) परिषद् निबन्धावली—इस पत्रिका के भाग २ में डॉ० सोमनाथ गुप्त का
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्त्ता २५१
'कबीर का सिद्धांत और रहस्यवाद' नामक निबन्ध महत्त्वपूर्ण है ।
(६) वीणा—'वीणा' के फरवरी सन् १९३८ के अंक में डॉ० बड़थ्वाल का
'कबीर के कुल का निर्णय' और जून सन् १९४३ के अंक मे डॉ० रामकुमार वर्मा का
'कबीर का शुद्ध पाठ' नामक निबन्ध पठनीय है ।
इन पत्र-पत्रिकाओं के अतिरिक्त 'साहित्य सन्देश' 'हिन्दी अनुशीलन' आदि में
भी कबीर सम्बन्धी अनेक लेख प्रकाशित होते रहे है ।
सन्त मत के प्रारम्भकर्त्ता के रूप में नामदेव के प्रति संकेत
ऊपर के उद्धरणों में एक ओर जहां कबीर को संत मत के प्रवर्तक के रूप में
स्वीकार किया गया है वहां उनमें शंकाएं भी की गई है । उपरिलिखित विद्वानों ने,
जिनके मत ऊपर उद्धृत किये गये है, कबीर को संत मत का प्रवर्तक मानते हुए भी
नामदेव की ओर उसका प्रारम्भ कर्त्ता होने का संकेत किया है। फिर भी संत मत के
प्रवर्तक के रूप में संत नामदेव को स्वीकार करने के लिए वे तैयार नही है ।
निम्नलिखित विद्वानों की रचनाओ से इस बात का संकेत मिलता है कि नामदेव
कबीर से पहले हो गये थे और उनकी हिंदी रचनाओं में निगुंण पंथ की सारी प्रवृत्तियां
पाई जाती है—
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार नामदेव निगुंण पंथ के प्रारम्भ कर्त्ता है ।¹
डॉ० मोहनसिंह का विचार है कि कबीर के विचार तथा वर्णन शैली दोनो पर
नामदेव की छाप है ।²
संत साहित्य के मर्मज्ञ आचार्य परशुराम चतुर्वेदी लिखते है कि नामदेव उत्तर
भारत के संतों के पथ प्रदर्शक थे ।³
१. 'नामदेव की रचना के आधार पर यह कहा जा सकता है कि 'निर्गुण पन्थ' के
लिए मार्ग निकालने वाले नाथ पंथ के जोगी और भक्त नामदेव थे ।'
—हिंदी साहित्य का इतिहास, पृ० ७२ ।
२. 'यदि ध्यानपूर्वक एवं सूक्ष्म रूप से नामदेव की रचनाओ का अध्ययन किया जाय
तो जान पड़ेगा कि कबीर साहब ने अपनी भावना-दृष्टि एवं वर्णन शैली दोनों में
ही नामदेव का स्पष्ट अनुसरण किया है ।'
—कबीर ॲण्ड दी भक्ति मुव्हमेंट, पृ० ४८ ।
३. 'इतना हम निःसंकोच भाव के साथ कह सकते हैं कि उत्तरी भारत के संत भी
नामदेव के ऋणी हैं और उनके लिए (तथा महाराष्ट्र के अनेक संतो के लिए भी)
संत नामदेव ने एक पथ-प्रदर्शक का काम किया है ।'
—उत्तरी भारत की संत परम्परा, पृ० १०७ ।
२५२ नामदेव की हिन्दी कविता
आचार्य विनयमोहन शर्मा के अनुसार नामदेव उत्तरी भारत के संतों के प्रेरणा
स्रोत रहे हैं। वे कबीर के पूर्व हुए। फिर भी हिंदी साहित्य के विद्वान् उनको निर्गुण
मत का प्रवर्तक मानने में हिचकिचाते हैं।१
डॉ० पीतांबरदत्त बड़थ्वाल संत मत के प्रवर्तक होने का श्रेय कबीर को देते
हैं किंतु इसके साथ वे यह भी स्वीकार करते हैं कि उसका बीजारोपण पहले ही हो
चुका था।२
डॉ०सरनामसिंह स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि कबीर को संत मत का प्रवर्तक
मानना भूल है। उनको हम संत मत की उज्ज्वल मणि कह सकते हैं।३
डॉ० राममूर्ति त्रिपाठी इस संदर्भ में विभिन्न मत रखते हैं। उनके अनुसार केवल
नामदेव और कबीर में पाई जानेवाली विशेषताओं के आधार पर नामदेव निर्गुण मत के
प्रवर्तक नहीं हो सकते।४
नामदेव के निर्गुणधारा के प्रारम्भकर्त्ता न माने जाने के कारण
ऊपर यह कहा गया है कि कई विद्वानों ने नामदेव के निर्गुण धारा के प्रवर्तक
१. 'नामदेव कबीर से पूर्व हुए। उन्होंने निर्गुण भक्ति का उत्तर में वर्षों प्रचार किया।
फिर भी उन्हें इस पथ का प्रवर्तक मानने में विद्वानों को क्यों झिझक होती है?'
—हिंदी को मराठी संतों की देन, पृष्ठ १२६ ।
२ 'निर्गुण संत विचार धारा को कबीर के द्वारा पूर्णता प्राप्त हुई परन्तु रूपाकार तो
यह पहले से ही ग्रहण करने लग गई थी।'
—हिंदी काव्य में निर्गुण संप्रदाय, पृ० ६४।
३. 'कबीर पंथवादी थे यह समझना भ्रम होगा। किंतु यह सत्य है कि उन्हें नया
पथ चलाने की आवश्यकता प्रतीत हुई थी क्योंकि वे समन्वयवादी थे। निर्गुण पथ
इसीलिए उनका नहीं समझ लेना चाहिए कि उसमें कोई नया चीज थी। ईंट और
रोड़े सब पुराने थे। यदि कोई नवीनता थी तो उनके भानुमती का कुनबा जोड़ने
में थी।'
—कबीर एक विवेचन, पृ० १०३।
४ 'निष्कर्ष यह कि निर्गुण धारा के कबीर जैसे संत से पूर्ववर्ती साधकों में भी यदि
समान विशेषताएँ ढूँढ़ी जायें तो मिल सकती हैं। अतः केवल समान विशेषताओं
के आधार पर नामदेव को निर्गुण मत का प्रवर्तक सिद्ध नहीं किया जा
सकता।'
'निर्गुण मत के प्रवर्तक नामदेव या कबीर'
—सम्मेलन पत्रिका भाग ५३ संख्या १, २ पौष-ज्येष्ठ शक १८८६।
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्त्ता २५३
होने की बात कही है और स्पष्ट संकेत भी किया है। स्पष्ट संकेत पर भी नामदेव को
निर्गुण धारा का प्रारम्भकर्त्ता क्यों नही माना गया ?
नामदेव ने उत्तर भारत की यात्रा कर सिद्धो और नाथों के निर्गुण मत मे
भक्ति का समावेश किया और इस प्रकार कबीर का पथ प्रशस्त किया। उनके पदो के
भावों की छाया कबीर में स्वभावतः मिलती है। स्वयं कबीर ने १ उनका सादर स्मरण
किया है। फिर भी किसी को यह कहने का साहस नही हुआ कि नामदेव ही निर्गुण
काव्य-धारा के प्रवर्त्तक है। मेरे विचार से इसके दो कारण हो सकते हैं-
(१) नामदेव की रचना का हिंदी में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध न होना।
(२) कबीर का प्रखर व्यक्तित्व और उनके विचारों का प्रभाव ।
श्री गुरु ग्रन्थ साहब और नामदेव
संत नामदेव ने मराठी में अभंगों की रचना की है जिनकी संख्या लगभग ढाई
हजार है। मराठी के अतिरिक्त उन्होंने हिंदी में भी रचना की है। नामदेव की कुछ
हिंदी रचनाएं 'श्री गुरु ग्रंथ साहब' में संग्रहीत हैं जिनकी संख्या ६१ है। इनके मराठी
अभंगों का संग्रह 'नामदेव की गाया' के नाम से प्रसिद्ध है। इस गाथा में भी नामदेव
के १०२ पद हिंदी के संग्रहीत हैं। इसके अतिरिक्त कई प्राचीन हस्तलिखित पोथियां हैं
जिनमें नामदेव के हिंदी पद मिलते हैं। कुल मिलाकर अब तक लगभग ढाई सौ पद
प्राप्त हो चुके हैं।
यहाँ एक प्रश्न स्वभावतः उठता है कि सिक्खों के धार्मिक ग्रंथ में महाराष्ट्रीय
संत नामदेव के हिंदी पदो का संग्रह क्यो किया गया ? 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' में नानक
तथा अन्य सिक्ख गुरुओं के अतिरिक्त कबीर, नामदेव, त्रिलोचन, वेणी, जेदेव, रैदास,
शेख फरीद आदि की रचनाएं संग्रहीत हैं। नानक और कबीर के बाद संत नामदेव के
ही पद अधिक हैं, जिससे यह प्रमाणित होता है कि संत नामदेव की हिंदी रचनाएँ •'श्री
गुरु ग्रन्थ साहब' के संकलन के समय प्रसिद्धि प्राप्त कर चुकी थी ।
संतों की परम्परा में अन्य अनेक संत भी रहे होंगे किंतु 'श्री गुरु ग्रन्थ' के
संकलनकर्त्ता ने इन्हीं संतों की रचनाएँ संकलित कीं । निश्चय ही ये संत उस समय तक
जन मानस में स्थान बना चुके थे। संत नामदेव यद्यपि महाराष्ट्रीय संत थे और उनको
१. जागे सुक उद्धव अकूर हणवंत जागे ले लंगूर ।
संकर जागे चरन सेव, कलि जागे नामा जैदेव ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० ३०२ ।
२५४ नामदेव की हिन्दी कविता
हिंदी रचनाएँ भी पर्याप्त मात्रा में नही थी फिर भी 'श्री गुरु ग्रन्थ' में महत्त्वपूर्ण स्थान
पाने की अधिकारी हुई ।
यहाँ एक बात और विचारणीय है । जिस समय 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' का
संकलन हुआ था, उसका स्वरूप सांप्रदायिक नहीं था । गुरु अर्जुनदेव ने तत्कालीन
प्रसिद्ध संतो की रचनाओ का संग्रह किसी विशिष्ट सांप्रदायिक आधार पर नही किया
था । यदि इसमें जरा भी सांप्रदायिक भावना होती तो नानक तथा गुरुओ के अतिरिक्त
अन्य संतो के पद संगृहीत न होते ।
'श्री गुरु ग्रंथ साहब' में प्राप्त होनेवाले संत नामदेव के ६१ पद उसमें किस स्रोत
से आये यह अभी तक ज्ञात नही हो सका है । वैसे नामदेव की हिंदी रचना सम्बन्धी
'श्री गुरु ग्रन्थ' ही सबसे प्राचीन प्रमाण है । अन्य हस्तलिखित ग्रंथ जो प्राप्त हुए है वे
उसके बाद के ही हैं । यद्यपि लगभग ४०० वर्ष पूर्व संकलित होने के कारण इसका पाठ
अधिक विश्वसनीय होना चाहिए था पर दुर्भाग्यवश ऐसा नही है । नामदेव की रचना
संबंधी जितनी मुद्रित और अमुद्रित प्रतियां अब तक प्राप्त हुई है उनमें 'श्री गुरु ग्रन्थ' का
पाठ सबसे अधिक स्वच्छंद है । इस स्वच्छंदता पर आश्चर्य भी होता है क्योकि धर्म ग्रंथ
होने के कारण इसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन नही किया गया । यदि शुद्ध अशुद्ध
लिखे है तो अन्य प्रति मे भी वैसे ही लिखे गये । इस संदर्भ में डॉ० पारसनाथ तिवारी
का मत दृष्टव्य है । १ किन्तु 'गुरु ग्रन्थ' के कम से कम नामदेव के पदों का पाठ देखकर
इसकी प्राचीनता पर संदेह होने लगता है । यह जाँच करना आवश्यक है कि 'गुरु ग्रन्थ
साहब' अपने संकलन के साथ ही स्थायित्व को प्राप्त हो गया था या बाद में उसको
स्थायित्व मिला । इसमे कोई संदेह नही कि इसका संकलन सिक्खो के पांचवें गुरु अर्जुन
सिंह ने किया है जिनका काल ई० स० १५६३-१६०६ माना जाता है ।
परन्तु 'गुरु ग्रंथ साहब' को उसी समय स्थायित्व प्राप्त नही हुआ । गुरु गोविद-
सिंह (ई० स० १६७५-१७०८) ने आगे चलकर इसमें कुछ वृद्धि भी की और कुछ
रचनाओ को हटा भी दिया । उन्होने मूल 'ग्रन्थ साहब' का पूरा पाठ भाई मनीसिंह को
बैठा कर लिखवाया था और उसमें गुरु तेग बहादुर की भी कुछ रचनाएँ सम्मिलित
कर ली थी । इसी के साथ कुछ नये संतों की रचनाएँ भी सम्मिलित कर ली गई होगी ।
गुरु गोविन्दसिंह जैसे प्रतिभाशाली और महत्त्वाकांक्षी कवि के लिए यह स्वाभाविक भी
१. 'गुरु ग्रन्थ साहब' का प्रकाशित संस्करण जो हमारे सामने है निरापद रूप से सं०
१६६१ की मूल प्रति का प्रतिरूप माना जा सकता है । ॰॰॰वह किसी सम्पादक या
लिपिकर्त्ता द्वारा न तो शोधा गया है और न परिवर्तित किया गया है ।'
—कबीर ग्रंथावली, पृ० ७२ ।
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्त्ता २५५
कहा जा सकता है। अतः ऐसा लगता है कि ई० स० १७०० के आसपास या उसके
पश्चात् ही 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' को स्थायित्व प्राप्त हुआ होगा। इतने लम्बे काल तक
मौखिक परम्परा में रहने वाले इन पदों की पंक्तियों और पाठों में इतना परिवर्तन हो
गया जो असम्भव नही।
'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' में प्राप्त होनेवाले ६१ पदों में से ४० पद मराठी गाथा
में प्राप्त होते हैं। विभिन्न स्थानो से जो हस्तलिखित प्राचीन प्रतियाँ मिली हैं उनमें भी
'गुरु ग्रन्थ' के केवल ३० पद प्राप्त होते हैं। 'गुरु ग्रंथ' में १६ पद ऐसे हैं जो कही भी
नही मिलने। जो पद मराठी गाथा तथा हस्तलिखित प्रतियो में प्राप्त हुए हैं उनके
नामदेव रचित होने में कोई संदेह नहीं है पर शेष पदों के सम्बन्ध में निश्चित रूप से
यह नही कहा जा सकता कि ये नामदेव के पद हैं। इनमें से अधिकांश पद किसी अन्य
कवि के हैं जो नामदेव के नाम पर प्रसिद्ध हो गये।
रज्जब की 'सर्वंगी' का महत्त्व इस संबंध में अधिक है। 'सर्वंगी' का संग्रह गुरु
अर्जुनसिंह के काल में ही अथवा कुछ
२५६ नामदेव की हिन्दी कविता
कबीर की रचना और पाठ निर्णय का अभी पहला प्रयास डॉ० पारसनाथ तिवारी
(प्रयाग) द्वारा हो पाया है तब नामदेव की प्राप्त रचनाओं की प्रामाणिकता का निर्णय
और भी कठिन माना जा सकता है। वास्तविक बात यह है कि संत नामदेव की
रचनाओं का अभी तक हिंदी संसार को पता नहीं था। 'ग्रन्थ साहब' के ६१ पद ही
अभी तक नामदेव की संपूर्ण हिंदी रचना समझी जाती रही है।
आचार्य विनयमोहन शर्मा ने अपनी पुस्तक 'हिंदी को मराठी संतों की देन' में
११ और पद दिये हैं जो 'ग्रन्थ साहब' से भिन्न हैं। इसके अतिरिक्त संत नामदेव की
गाथा में १०३ हिंदुस्तानी पद हैं जिनमें कुछ ग्रन्थ साहब के हैं और कुछ दूसरे। किंतु
नामदेव की हिंदी रचनाएँ इतनी ही नहीं हैं। मुझे विभिन्न प्रकाशित और हस्तलिखित
प्रतियों से कुल ३०० पद नामदेव के प्राप्त हुए हैं। हस्तलिखित प्रतियां नागरी प्रचारिणी
सभा, काशी, सेंट्रल पब्लिक लायब्रेरी, पटियाला, बाबा नामदेवजी का गुरुद्वारा घुमान
(गुरदासपुर), पंढरपुर, पूना विश्वविद्यालय आदि स्थानों से प्राप्त हुई हैं। कुछ
प्रतियाँ जयपुर में भी हैं जिन्हें देखने का अभी तक अवसर नहीं मिला। रज्जब की
'सर्वङ्गी' में भी नामदेव के ५० से ऊपर पद संग्रहीत हैं। और भी अनेक संत वाणियों
के संग्रहों में नामदेव के पद पाये जाते हैं।
देखना यह है कि इन रचनाओं में प्रामाणिकता कहाँ तक है। 'गुरु ग्रंथ साहब'
का संकलन १६०४ में हुआ। नामदेव की रचना सम्बन्धी यही सबसे प्राचीन ग्रन्थ
अब तक माना गया है। मुझे एक हस्तलिखित प्रति सन् १६५८ ई० की देखने को मिली
है। जिसमें नामदेव के पदों की संख्या १२८ है। यही सबसे पुरानी प्रति अभी तक
मिली है। इसके अतिरिक्त १८ वीं, १६ वीं शताब्दी की कई प्रतियाँ भी मिली हैं। पाठ
की दृष्टि से 'गुरु ग्रन्थ साहब' का पाठ सबसे भ्रष्ट है। इसके कुछ पद तो अभी तक
कहीं भी नहीं प्राप्त हुए हैं। जैसे अन्य संत कवियों के नाम पर बहुत सी रचनाएँ
प्रसिद्ध हो गई हैं वैसे नामदेव के नाम पर भी हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। पर पाठमात्र
के आधार पर लगभग १५० पद निश्चित ही नामदेव के हैं। ५० पद ऐसे हैं जो आधे
मराठी के, आधे हिंदी के हैं या सम्पूर्ण मराठी के भ्रष्ट रूप में हैं और शेष ५० अभी तक
संदिग्ध हैं। उनमें से कुछ गोरखनाथ, कबीर आदि के नाम से भी प्रसिद्ध हैं।
उदाहरणार्थ—
'देवा बेन बाजे, गगन गाजे, शब्द अनाहद बोले ।।' यह पद कबीर ग्रन्थावली
(ना० प्र० स०) के पद १६६ पृ० १४४ से बिल्कुल मिलता-जुलता है। कबीर की
पाठ समस्या पर काम करने वाले डॉ० पारसनाथ तिवारी ने इसे कबीर की प्रामाणिक
रचना नहीं माना है। गुरु ग्रन्थ साहब में प्राप्त पद १६ 'तीन छंद धेनु बाछै' गोरख-
बानी (डॉ० बड़थ्वाल द्वारा संपादित) के पद ४२ से मिलता-जुलता है। इस प्रकार
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २५७
अनेक ऐसे पद हैं जिनके संबंध में निर्णय करना अभी शेष है।
ये हस्तलिखित प्रतियाँ, जो विभिन्न स्थानों से प्राप्त हुई हैं और नामदेव की
हिंदी पदों की परंपरा तथा नामदेव के पश्चात् होनेवाले हिंदी संत कवियों द्वारा नामदेव
की प्रशस्ति निश्चित रूप से यह प्रमाणित करती है कि नामदेव ने हिंदी में कविता की
थी और वह भी नमूने के लिए नहीं बल्कि सैकड़ों की संख्या में।
नामदेव की उपलब्ध हिंदी पदावलियों में डॉ० भगीरथ मिश्र तथा डॉ० राज-
नारायण मौर्य द्वारा संपादित तथा पूना विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित 'संत नामदेव की
हिंदी पदावली' अद्यतन और प्रमाणित पदावली है। इस पदावली में नामदेव के २३०
पद तथा १३ साखियां संग्रहीत हैं।
पर्याप्त काल तक बहुत को यह विदित न था कि नामदेव ने हिंदी में भी रचना
की है। हिंदी जगत् में इनकी रचनाओं का प्रचार पर्याप्त मात्रा में नहीं था। जहाँ
संतों की रचनाएँ संकलित की जाती थीं वहाँ नामदेव की रचनाओं को भी स्थान दिया
जाता था। इसका प्रमाण है सैकड़ों की संख्या में पाये जाने वाले नामदेव के हस्तलिखित
ग्रंथ।
इन सभी तथ्यों पर विचार करने पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि नामदेव
की हिंदी रचनाएँ अल्प मात्रा में उपलब्ध होने के कारण उनको वह प्रधानता न मिल
सकी जो कबीर को मिली। इस संदर्भ में आचार्य विनयमोहन शर्मा की सम्मति उल्ले-
खनीय है।¹
कबीर का प्रखर व्यक्तित्व और उनके विचारों का प्रभाव
हिंदी साहित्य में कबीर से अधिक क्रांतिकारी व्यक्तित्व रखनेवाला कोई दूसरा
कवि नहीं हुआ। उनके व्यक्तित्व को क्रांतिकारी बनाने वाली वे परिस्थितियाँ हैं जिनमें
उन्होंने जन्म लिया और जिनमें उन्हें जीना और मरना पड़ा। इन परिस्थितियों
१. यह सत्य है कि कबीर के समान नामदेव की हिंदी रचनाएँ प्रचुर मात्रा में नहीं
मिलतीं परन्तु जो कुछ भी प्राप्त हैं उनमें उत्तर भारत की संत परंपरा का पूर्व
आभास मिलता है और उनके परवर्ती संतों पर निश्चय ही उनका प्रभाव पड़ा है
जिसे उन्होंने मुक्त कंठ से स्वीकार किया है। ऐसी दशा में उन्हें उत्तर भारत में
निर्गुण भक्ति का प्रवर्तक मानने में हमें कोई झिझक नहीं होनी चाहिए। संभवतः,
हिंदी जगत् तक उनके संबंध में पर्याप्त जानकारी न पहुँच सकने के कारण उन्हें
वह स्थान नहीं प्राप्त हो सका, जिसके वे अधिकारी हैं।
—हिंदी को मराठी संतों की देन, पृष्ठ १२६।
१७
२५८ नामदेव की हिन्दी कविता
के आलोक में ही हम इस तथ्य को हृदयंगम कर सकते हैं कि कबीर ने क्यों अपनी प्रखर
भाषा और तीखी भाव-व्यंजना से ऐसे काव्य का सृजन किया जो साहित्यिक मर्यादा की
चिंता न करते हुए साहित्य और धर्म में युगान्तर लाने वाला सिद्ध हुआ ।
कबीर को क्रांतिकारी बनाने वाली परिस्थितियां
वस्तुत कबीर के जन्म के समय राजनीति, समाज और धर्म में सर्वत्र एक अशान्ति
और अव्यवस्था की स्थिति थी । राजनीतिक दृष्टि से देखें तो मुसलमानों के आतंक से
पीड़ित हिंदू जनता राजाओं का भरोसा छोड़कर हताश हो गई थी और अपने को ईश्वर
के अधीन कर बैठी थी । धार्मिक दृष्टि से देखें तो नाथ पंथियों और सिद्धों ने रहस्यात्मक
और चमत्कारात्मक तंत्र मंत्र आदि के प्रचार द्वारा जनता को धर्म पथ से हटा दिया
था । तीर्थयात्रा, व्रत, पथ, स्नान आदि की निःसारता बताकर ये लोग जनता को
ईश्वर प्राप्ति का एक ही मार्ग दिखला रहे थे और वह था हठयोग तथा अन्य शारीरिक
क्रियाएं । भक्ति और प्रेम जैसी कोमल भावनाओं का इनके लिए कोई महत्व नहीं था ।
सामाजिक दृष्टि से देखें तो हिंदू मुसलमानों में पारस्परिक कलह और कटुता के बीज
मौजूद थे । संकीर्णता, द्वेष और अविश्वास से दोनों ओर खिंचाव था ।
ऐसी विषम परिस्थिति में एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी जो कलह के
कुहरे को चीरता हुआ सूरज की भांति प्रकाशित होकर किंकर्तव्य विमूढ जनता को
नवीन मार्ग पर ले जाय । निरीह और निष्प्राण जनता को आत्मविश्वास और मनुष्यता
के प्रति श्रद्धा और विश्वास से सशक्त बनाकर परिस्थिति का सामना करने के लिए
खड़ा कर दे । कबीर ऐसे ही युग द्रष्टा पुरुष थे ।
कबीर के व्यक्तित्व, उनके धार्मिक आदर्शों, समाज के प्रति उनका पक्षपात रहित
स्पष्ट दृष्टिकोण तथा उनकी कथन शैली पर नाभादास के इस छप्पय में सम्यक् प्रकाश
डाला गया है ।¹ भक्ति रहित धर्म को कबीर ने अधर्म कहा और भजन के बिना तप,
योग, दान, व्रत आदि सब को तुच्छ बताया । उन्होंने हिंदू मुसलमान दोनों के लिए
१. भक्ति विमुख जो धरम ताहि अधरम करि गायो ।
जोग, जग्य, जप, दान, भजन बिनु तुच्छ दिखायो ॥
हिंदू तुरक प्रमान रमैनी सबदी साखी ।
पक्षपात नहिं वचन सबंहि के हित की भाखी ॥
आरुढ दसा ह्वै जगत पर मुख देखी नाहिन भनी ।
कबीर कानि राखी नहीं वर्णाश्रम षठ दरसनी ॥
भक्तमाल (नाभादास) पृष्ठ ४६१ ।
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २५६
साखी, सबद और रमैनी की रचना की और बिना पक्षपात किये, बिना किसी की
तरफदारी किये सब के हित की बातें कही अर्थात् मानव मात्र के हित की बातें उन्होंने
कहीं। सारे संसार पर छा गये परंतु किसी के दबाव में आकर उन्होंने मुंह-देखी नहीं
कही, किसी की ठाकुर-सुहाती नहीं की। कबीर ने परंपरा से चले आये चार वर्ग, चार
आश्रम, छह दर्शन किसी को स्वीकार नहीं किया।
सच तो यह है कि कबीर अपना घर फूंक कर लाठी लेकर बाजार में आकर
खड़े हो गये थे और उन्होंने अपने साथ आने वालों को भी वैसा ही करने की सम्मति
दी थी ।१ यही नहीं वे शब्द-प्रमाण की अपेक्षा प्रत्यक्ष अनुभव को अधिक महत्त्व देते
थे ।२ वे प्रेम के उपासक थे। इस कारण उनको पाखंड और ढोंग से चिढ़ हो गई थी।
भक्त या संत को जैसा होना चाहिए उसके विपरीत लोग आडम्बर के फेर में पड़कर
जनता को पथ भ्रष्ट कर रहे थे।
कबीर जैसा भक्त जो सभी प्रकार के धार्मिक, सामाजिक और शास्त्रीय बंधनों
का तिरस्कार कर के 'मानव धर्म' की प्रतिष्ठा करना चाहता था, उस आडम्बर का
विरोध किए बिना कैसे रह सकता था जो मनुष्य के लोक-परलोक को बिगाड़ने वाला
था। यही कारण था कि कबीर ने उस भक्ति काल में, जिसमें 'मो सम कौन कुटिल
खल कामी' कहने वाले सूर तथा 'तू दयालु दीन हौं' कहने वाले तुलसी तथा उनके जैसे
अनेक भक्त कवि विनयशीलता तथा आत्मभर्त्सना का प्रदर्शन कर रहे थे, अपनी सार-
ग्राहिणी प्रतिभा और तर्क-व्यंग्य-मय अभिव्यक्ति से धार्मिक और सामाजिक जीवन पर
पड़े हुए आडम्बर के पर्दे को छिन्न भिन्न कर दिया।
कबीर स्वभाव से फक्कड़ थे। अच्छा हो या बुरा, खरा हो या खोटा जिससे
एक बार चिपट गये उसमें जिंदगी भर चिपटे रहे, यह सिद्धांत उन्हें मान्य नहीं था।
वे सत्य के जिज्ञासु थे और कोई मोह-ममता उन्हें अपने मार्ग से विचलित नहीं कर
सकती थी।
कबीर स्वाधीन-चिंता के पुरुष थे। उन्होंने समय का प्रवाह देखकर धर्म और
देश के उपकार के लिए जो बातें उचित और उपयोगी समझीं उनको अपने विचारों पर
आरूढ़ होकर निर्भीक चित्त से कहा। झूठे संस्कारों के कारण लोग नाना प्रकार के कर्म
१. हम घर जारा आपना, लिया मुराडा हाथ ।
अब घर जालौं तासुका जो चले हमारे साथ ॥
—संत कबीर की साखी ५।८ ।
२. मै कहता हौं आँखिन देखी, तूं कागद की लेखी रे ॥
संक्षिप्त संत सुधा-सार पृष्ठ ५६