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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 247, कुल 332 में से

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पृष्ठ 247

नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्त्ता २५३
होने की बात कही है और स्पष्ट संकेत भी किया है। स्पष्ट संकेत पर भी नामदेव को
निर्गुण धारा का प्रारम्भकर्त्ता क्यों नही माना गया ?
नामदेव ने उत्तर भारत की यात्रा कर सिद्धो और नाथों के निर्गुण मत मे
भक्ति का समावेश किया और इस प्रकार कबीर का पथ प्रशस्त किया। उनके पदो के
भावों की छाया कबीर में स्वभावतः मिलती है। स्वयं कबीर ने १ उनका सादर स्मरण
किया है। फिर भी किसी को यह कहने का साहस नही हुआ कि नामदेव ही निर्गुण
काव्य-धारा के प्रवर्त्तक है। मेरे विचार से इसके दो कारण हो सकते हैं-
(१) नामदेव की रचना का हिंदी में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध न होना।
(२) कबीर का प्रखर व्यक्तित्व और उनके विचारों का प्रभाव ।
श्री गुरु ग्रन्थ साहब और नामदेव
संत नामदेव ने मराठी में अभंगों की रचना की है जिनकी संख्या लगभग ढाई
हजार है। मराठी के अतिरिक्त उन्होंने हिंदी में भी रचना की है। नामदेव की कुछ
हिंदी रचनाएं 'श्री गुरु ग्रंथ साहब' में संग्रहीत हैं जिनकी संख्या ६१ है। इनके मराठी
अभंगों का संग्रह 'नामदेव की गाया' के नाम से प्रसिद्ध है। इस गाथा में भी नामदेव
के १०२ पद हिंदी के संग्रहीत हैं। इसके अतिरिक्त कई प्राचीन हस्तलिखित पोथियां हैं
जिनमें नामदेव के हिंदी पद मिलते हैं। कुल मिलाकर अब तक लगभग ढाई सौ पद
प्राप्त हो चुके हैं।
यहाँ एक प्रश्न स्वभावतः उठता है कि सिक्खों के धार्मिक ग्रंथ में महाराष्ट्रीय
संत नामदेव के हिंदी पदो का संग्रह क्यो किया गया ? 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' में नानक
तथा अन्य सिक्ख गुरुओं के अतिरिक्त कबीर, नामदेव, त्रिलोचन, वेणी, जेदेव, रैदास,
शेख फरीद आदि की रचनाएं संग्रहीत हैं। नानक और कबीर के बाद संत नामदेव के
ही पद अधिक हैं, जिससे यह प्रमाणित होता है कि संत नामदेव की हिंदी रचनाएँ •'श्री
गुरु ग्रन्थ साहब' के संकलन के समय प्रसिद्धि प्राप्त कर चुकी थी ।
संतों की परम्परा में अन्य अनेक संत भी रहे होंगे किंतु 'श्री गुरु ग्रन्थ' के
संकलनकर्त्ता ने इन्हीं संतों की रचनाएँ संकलित कीं । निश्चय ही ये संत उस समय तक
जन मानस में स्थान बना चुके थे। संत नामदेव यद्यपि महाराष्ट्रीय संत थे और उनको
१. जागे सुक उद्धव अकूर हणवंत जागे ले लंगूर ।
संकर जागे चरन सेव, कलि जागे नामा जैदेव ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० ३०२ ।