सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 244, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ें२५० नामदेव की हिन्दी कविता
(५) कबीर अंड हिज फॉलोअर्स—डॉ० एफ० ई० की द्वारा लिखित यह शोध
प्रबन्ध ऑक्सफर्ड युनिव्हर्सिटी में डी० लिट्० की थीसिस के रूप में प्रस्तुत किया गया
था और स्वीकृत होकर सन् १६३१ में प्रकाशित हुआ । कबीर सम्बन्धी निर्णय में डॉ०
की ने वेस्टकाट की अपेक्षा उदारता का परिचय दिया है । उन्होंने कबीर के दार्शनिक
सिद्धान्तो एवं विचारो पर अधिक प्रकाश डालकर कबीर के जीवन वृत्त और कबीर पंथ
का ही खोजपूर्ण विवेचन प्रस्तुत किया है ।
(६) दि निर्गुंण स्कूल ऑफ हिंदी पोएट्री—रचना काल सन् १६३६ ई० ।
लेखक डॉ० पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल । इस पुस्तक का परिचय हिंदी के आलोचनात्मक
ग्रन्थो में दिया जा चुका है ।
पत्र-पत्रिकाएं
इन ग्रन्थों के अतिरिक्त कबीर पर समय-समय पर विद्वत्तापूर्ण लेख लिखे गये
हैं । ये प्राय निम्नलिखित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं—
(१) नागरी प्रचारिणी—इस पत्रिका के चौदहवें भाग में पंडित चन्द्रबली पाण्डेय
का 'कबीर का जीवन वृत्त' नामक निबन्ध छपा है और भाग १६ में डॉ० पीताम्बरदत्त
बड़थ्वाल ने कबीर का जीवन वृत्त प्रस्तुत किया है । इसी भाग में सूर्यकिरण पारीक का
'राजस्थानी हिंदी और कबीर' शीर्षक निबंध भी प्रकाशित हुआ है ।
(२) हिन्दुस्तानी—'हिन्दुस्तानी' भाग दो (अप्रैल १६३२) में डॉ० रामप्रसाद
त्रिपाठी का 'कबीर जी का समय' शीर्षक निबन्ध विशेष महत्त्वपूर्ण है जिसमें कबीर का
समय निश्चित करने का प्रयास किया गया है ।
इसी त्रैमासिक पत्रिका के भाग २३ अंक १ (जनवरी मार्च १६६२) में
डॉ० राजनारायण मौर्य का 'हिन्दी साहित्य में संत मत के आदि प्रवर्तक : संत नामदेव'
शीर्षक विद्वत्तापूर्ण लेख छपा है ।
(३) सम्मेलन पत्रिका—'सम्मेलन पत्रिका' भाग ५३, संख्या—१, २ (पौष-
ज्येष्ठ शक १८८६) में राममूर्ति त्रिपाठी का 'निर्गुंण मत के प्रवर्तक नामदेव या कबीर'
शीर्षक लेख प्रकाशित हुआ है । उनके अनुसार निर्गुंण सम्प्रदाय के प्रवर्तन का श्रेय
कबीर को ही दिया जाना चाहिए ।
(४) कल्याण—'कल्याण' के 'योगांक' में आचार्य क्षितिमोहन सेन का 'कबीर
का योग वर्णन' नामक निबन्ध कबीर पर योगिक प्रभाव सिद्ध करने की दिशा में एक
स्तुत्य प्रयास है ।
(५) परिषद् निबन्धावली—इस पत्रिका के भाग २ में डॉ० सोमनाथ गुप्त का