सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 241, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २४७
ने संवत् १९७३ में किया 'हरिऔध' जी ने कबीर को साहित्यिक, सैद्धांतिक और जीवन
संबंधी बातों की चर्चा आलोचनात्मक ढंग से की है।
(३) कबीर ग्रंथावली—इसका संपादन डॉ० श्याम सुंदरदास ने संवत् १९८५
में किया। वे रामानंद को कबीर का मानस गुरु मानते हैं। उन्होंने कबीर के प्रेमतत्त्व
पर सूफियों का प्रभाव स्वीकार किया है। साथ ही यह भी कहा है कि उनमें भारतीयता
का पुट भी कम नहीं है। वे नामदेव के महत्व को स्वीकार करते हुए भी कबीर को
निर्गुण धारा का प्रवर्तक मानते हैं।१
(४) 'मिश्र बंधु 'विनोद'—मिश्र बंधुओं द्वारा लिखित 'मिश्र बंधु विनोद' सन्
१९१३ ई० (सं० १९७०) में प्रकाशित हुआ जिसमें कबीर के सम्बन्ध में विस्तृत
विवेचन किया गया है।
(५) हिंदी साहित्य का इतिहास—आचार्य शुक्ल का यह अद्वितीय ग्रन्थ सन्
१९२९ (संवत् १९८६) में प्रकाशित हुआ। वे मानते हैं कि निर्गुण पंथ के प्रवर्तक
कबीर ही थे।२
(६) कबीर—सन् १९४१ (संवत् १९९८) में डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी का
'कबीर' नामक ग्रन्थ प्रकाशित हुआ। कबीर साहित्य पर पड़े हुए विभिन्न प्रभावों और
कबीर के दार्शनिक विचारों पर प्रकाश डालना ही उनका प्रमुख लक्ष्य रहा है।
(७) उत्तरी भारत की सन्त परम्परा—संत साहित्य के मर्मज्ञ आचार्य पं०
परशुराम चतुर्वेदी का यह ग्रन्थ संवत् २००७ में प्रकाशित हुआ। इसमें लगभग २००
पृष्ठों में कबीर के जीवन, साहित्य, सिद्धांत और साधना के सम्बन्ध में स्वतन्त्र रूप से
विचार किया गया है। संत मत एवं इससे संबंधित पंथों का विशेष ज्ञान प्राप्त करने के
लिए इसका अध्ययन महत्त्वपूर्ण है।
(८) हिंदी की निर्गुण काव्य धारा और उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि—डॉ०
गोविंद त्रिगुणायत का यह आगरा युनिवर्सिटी द्वारा डी० लिट्० की उपाधि के लिए
स्वीकृत शोध प्रबन्ध है। इसका प्रथम संस्करण सं० १९६१ ई० में प्रकाशित हुआ।
इस ग्रन्थ में हिंदी की निर्गुण काव्यधारा और उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि का सांग,
१. 'कबीर इस निर्गुण भक्ति प्रवाह के प्रवर्तक हैं परंतु भक्त नामदेव इनसे भी पहले
हो गये थे; ये पहले सगुणोपासक थे परंतु आगे चलकर इनका झुकाव निर्गुण
भक्ति की ओर हो गया।'
—कबीर ग्रंथावली—भूमिका, पृष्ठ १५।
२. 'जहाँ तक पता चलता है निर्गुण मार्ग के निर्दिष्ट प्रवर्तक कबीर ही थे।'
—हिंदी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ ७२।