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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 242, कुल 332 में से

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पृष्ठ 242

२४८ नामदेव की हिन्दी कविता
व्यवस्थित, पाण्डित्यपूर्ण और अनुसंधानात्मक विवेचन किया गया है। अब तक निर्गुण
विचार धारा और उसके मूल स्रोतों का अध्ययन उपेक्षित रहा। डॉ० त्रिगुणायत ने
प्रस्तुत ग्रंथ द्वारा इस अभाव की पूर्ति की है। इनके अनुसार निर्गुण काव्य धारा के
प्रवर्त्तक कबीर हैं।१
(६) हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास- डॉ० रामकुमार वर्मा का यह
इतिहास सन् १९३८ ई० में प्रकाशित हुआ। इसमें साहित्य की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को
अपनी विशेष दृष्टि से देखने का प्रयत्न किया गया है। डॉ० वर्मा ने कबीर को संत मत
का प्रचारक माना है।२
(१०) हिंदी काव्य में निर्गुण सम्प्रदाय-डॉ० पीतांबरदत्त बड़थ्वाल । रचना-
काल सन् १९३६ ई०। इस पुस्तक की मूल प्रति डॉक्टरेट की उपाधि के निमित्त
थीसिस के रूप में लिखी गई थी। इसमें निर्गुण कवियों का व्यवस्थित अध्ययन प्रस्तुत
किया गया है। पुस्तक अपने ढंग की अकेली है। मेरे विचार से निर्गुण काव्य के
सम्बन्ध में यह सर्वाधिक प्रामाणिक और अधिकारपूर्ण रचना है। इसके महत्त्व को
समझकर ही आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने सन् १६५० ई० (संवत् २००७) में मूल
अंग्रेजी पुस्तक का हिंदी अनुवाद प्रकाशित कराया है।
यद्यपि इसके पूर्व भी हिन्दी साहित्य के इतिहास ग्रन्थो और दूसरो रचनाओ में
निर्गुण साहित्य के बारे में चर्चा की गई है किन्तु जिस गम्भीरता और प्रामाणिकता के
साथ डॉ० बड़थ्वाल ने निर्गुण साहित्य पर लिखा है उतनी गंभीरता और प्रामाणिकता
अन्यत्र नहीं है। डॉ० बड़थ्वाल के पूर्व तक निर्गुण काव्य धारा के प्रवर्त्तक संत कबीर
माने जाते रहे। यद्यपि आज भी निर्गुण काव्य धारा के प्रवर्त्तक रूप में कबीर को ही
मान्यता है किन्तु सम्भवतः डॉ० बड़थ्वाल पहले विद्वान् थे जिन्होंने निर्गुण काव्य धारा के
प्रवर्त्तक के रूप में नामदेव की ओर संकेत किया है।३ डॉ० बड़थ्वाल के बाद भी कबीर

१. निर्गुण काव्य धारा के प्रमुख प्रवर्त्तक संत कबीर माने जाते हैं।'
—हिन्दी की निर्गुण काव्य धारा और उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि, पृ० १४।
२. 'इस मत ( संत मत ) के प्रचारक कबीर थे। उन्होंने उसको एक विशिष्ट रूप
दिया।'
— हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास, पृ० ६३
३. 'निर्गुण संत विचार धारा को कबीर के द्वारा पूर्णता प्राप्त हुई।'
—हिन्दी काव्य में निर्गुण सम्प्रदाय, पृ० १४।