सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 235, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २४१
अधिकतर संज्ञाओ का रूप दोनों वचनों में एक ही है किंतु तिर्यक् रूपों में बहुवचन का
निर्देश स्पष्ट रूप से प्राप्त होता है । जैसे—
वन्दहि, आंखिन, स्रवनहि आदि ।
करण कारक के रूपों में भी इसी प्रकार का संकेत है । जैसे—
भुवंगहि, भँवरहि, नैनौ, लोगनि, संवनि आदि ।
कुछ स्थानों पर बहुवचन प्रकट करने के लिए अनेकता सूचक शब्दो का प्रयोग
है । यथा—
अन्धा लोग, योगी जन आदि ।
अ, उ, ऊ, ओ ओर औ से अंत होने वाली संज्ञाएँ प्रायः पुल्लिंग हे तथा आ,
इ, ई से अन्त होने वाली संज्ञाएँ स्त्रीलिंग । इसमें कुछ अपवाद भी है ।
पुल्लिंग से स्त्रीलिंग बनाने के लिए इ या ई प्रत्यय जोड़े गये हैं । जैसे—
बेटा—पु० बेटी—स्त्री०
देव—पु० देवी—स्त्री०
भृङ्ग—पु० भृङ्गी—स्त्री०
कही-कही 'नी' प्रत्यय भी मिलता है—
जैसे नट—पु० नटनी—स्त्री०
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