सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 245, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्त्ता २५१
'कबीर का सिद्धांत और रहस्यवाद' नामक निबन्ध महत्त्वपूर्ण है ।
(६) वीणा—'वीणा' के फरवरी सन् १९३८ के अंक में डॉ० बड़थ्वाल का
'कबीर के कुल का निर्णय' और जून सन् १९४३ के अंक मे डॉ० रामकुमार वर्मा का
'कबीर का शुद्ध पाठ' नामक निबन्ध पठनीय है ।
इन पत्र-पत्रिकाओं के अतिरिक्त 'साहित्य सन्देश' 'हिन्दी अनुशीलन' आदि में
भी कबीर सम्बन्धी अनेक लेख प्रकाशित होते रहे है ।
सन्त मत के प्रारम्भकर्त्ता के रूप में नामदेव के प्रति संकेत
ऊपर के उद्धरणों में एक ओर जहां कबीर को संत मत के प्रवर्तक के रूप में
स्वीकार किया गया है वहां उनमें शंकाएं भी की गई है । उपरिलिखित विद्वानों ने,
जिनके मत ऊपर उद्धृत किये गये है, कबीर को संत मत का प्रवर्तक मानते हुए भी
नामदेव की ओर उसका प्रारम्भ कर्त्ता होने का संकेत किया है। फिर भी संत मत के
प्रवर्तक के रूप में संत नामदेव को स्वीकार करने के लिए वे तैयार नही है ।
निम्नलिखित विद्वानों की रचनाओ से इस बात का संकेत मिलता है कि नामदेव
कबीर से पहले हो गये थे और उनकी हिंदी रचनाओं में निगुंण पंथ की सारी प्रवृत्तियां
पाई जाती है—
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार नामदेव निगुंण पंथ के प्रारम्भ कर्त्ता है ।¹
डॉ० मोहनसिंह का विचार है कि कबीर के विचार तथा वर्णन शैली दोनो पर
नामदेव की छाप है ।²
संत साहित्य के मर्मज्ञ आचार्य परशुराम चतुर्वेदी लिखते है कि नामदेव उत्तर
भारत के संतों के पथ प्रदर्शक थे ।³
१. 'नामदेव की रचना के आधार पर यह कहा जा सकता है कि 'निर्गुण पन्थ' के
लिए मार्ग निकालने वाले नाथ पंथ के जोगी और भक्त नामदेव थे ।'
—हिंदी साहित्य का इतिहास, पृ० ७२ ।
२. 'यदि ध्यानपूर्वक एवं सूक्ष्म रूप से नामदेव की रचनाओ का अध्ययन किया जाय
तो जान पड़ेगा कि कबीर साहब ने अपनी भावना-दृष्टि एवं वर्णन शैली दोनों में
ही नामदेव का स्पष्ट अनुसरण किया है ।'
—कबीर ॲण्ड दी भक्ति मुव्हमेंट, पृ० ४८ ।
३. 'इतना हम निःसंकोच भाव के साथ कह सकते हैं कि उत्तरी भारत के संत भी
नामदेव के ऋणी हैं और उनके लिए (तथा महाराष्ट्र के अनेक संतो के लिए भी)
संत नामदेव ने एक पथ-प्रदर्शक का काम किया है ।'
—उत्तरी भारत की संत परम्परा, पृ० १०७ ।