रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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हुए होता है। निर्दोष दूध मीठा होता है और उसमें मलाई पड़
जाती है। इस प्रकार दूध की परीक्षा करने पर यदि वह दूषित
प्रमाणित हो तो उसे औषधियों द्वारा शुद्ध करने की चेष्टा करनी
चाहिए और जब तक वह पूर्ण रीति से शुद्ध न हो जाय तब तक
बालक को स्तन-पान न करावे। किसी अच्छी शुद्ध दूध वाली दाई
का दूध पीने का प्रबन्ध कर दे। दाई ऐसी ही होनी चाहिए जिसकी
गोद में उतने ही दिनों का बालक हो, जितने दिन के बच्चे को दूध
पिलाना हो। दस-पाँच दिन न्यूनाधिक की तो बात दूसरी है, पर
अधिक दिनों का अन्तर रहना ठीक नहीं। कारण यह कि ज्यों-ज्यों
दिन बीतता जाता है त्यों-त्यों दूध गाढ़ा होता जाता है। इस लिए
यदि बच्चा दो महीने का हो और दूध पिलाने वाली दाई को छः
सात महीने प्रसविणी हुए हो गये हों तो उसका दूध पिलाने से
बच्चा बीमार पड़ जाता है; क्योंकि उतना गाढ़ा दूध पचाने की शक्ति
उसमें नहीं रहती। ईश्वर की बड़ी ही विचित्र लीला है। वह बच्चे
के बलाबल के अनुसार ही माता के स्तनों में गाढ़ा पतला दूध पैदा
करते हैं। जब बच्चा जन्म लेता है, तब माता का दूध बहुत ही
पतला होता है, फिर ज्यों-ज्यों उसमें ताकत आती जाती है और
पाचनशक्ति बढ़ती जाती है, त्यों-त्यों दूध भी गाढ़ा होता जाता है।
इस लिए इस बात पर ध्यान देना बड़ा ही आवश्यक है। किन्तु
इतना करने से सब काम समाप्त नहीं हो जाता। जब बच्चे का
दूध पीना छुड़ा दिया जाय, तब माता का कर्त्तव्य है कि वह प्रति