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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

प्रथमाननम् ४३
कृतो मतं प्रत्याचक्षाणेन व्यभिचारित्वेनासिद्धत्वेन च संदिह्यमानादपि
भीरुत्वं प्रतीयते । तत्र भयकारणस्य निवृत्तेर्भ्रमणं प्रतिपाद्यते । देशविशेषस्य
चाऽनुल्लेखाद् बोद्धव्यवैशिष्ट्येन ग्रामे गोदावरीकच्छकुहरे चाविशेषेण प्राप्तमपि भ्रमणं
ग्रामे विधेयत्वेन गोदावरीकच्छकुहरे च निषेध्यत्वेन प्रतीयते । तत्र च विधिरस्य
वाच्य एवात्र पद्ये, प्रतिपन्नभीरुत्वधार्मिकभ्रमणस्य तद्धेतोर्भयकारणीभूत-
श् Dufनिghost? निवृत्तेः श्वविशेषणत्वेन ग्रामस्य च प्रतिपादितत्वात् । गोदाकच्छकुहरे भ्रमणनि-
षेधश्चाऽवाच्योऽपि तत्र व्यापकीभूतभीरुभ्रमणसाधनस्वभावविरुद्धस्य भयकारणीभूत-
दृप्तसिंहस्योपलब्धेरनुमेयो भवत्येव--अत्र भ्रमणं मा कार्षीः, दृप्तसिंहसत्त्वात् = "गोदा-
कच्छकुहरं त्वत्कर्तृकभ्रमणाऽयोग्यम्, (भयकारणीभूत)सिंहवत्त्वात्" इति । अनर्थ-
संशयाऽभावनिश्चयादेव प्रवृत्तिरिति मते तु 'यत्र यत्र प्रवृत्तिः तत्र तत्रानर्थसंशया-
भावनिश्चयः' इति व्याप्तौ व्यापकीभूतस्यानर्थसंशयाभावनिश्चयस्य विरुद्धो यो गृह-
श्वमारकगोदावरीकच्छकुहरस्थदृप्तसिंहकर्तृ कोऽनर्थसंशयस्तस्य सद्भावादपि तत्र
भ्रमणनिषेधोऽनुमेयः । अयमेव द्वितीयः प्रकारः प्रकाशादावुपन्यस्तः शब्दान्तरेण ।
जिसके बारे में व्यभिचार तथा असिद्धि नामक हेत्वाभास सन्दिग्ध भी हो उस ज्ञापक
से भी अभिव्यञ्जन होता है, अनुमिति नहीं । उक्त पद्य किसी अभिसारिका की एक
भीरु धार्मिक के प्रति उक्ति है । अपने अभिसरण में उस धार्मिक की उपस्थिति के
प्रतिबन्धक होने से वह उस धार्मिक से प्रकारान्तर से यही बताना चाहती कि वह
स्थान उसके भ्रमण के लिए योग्य नहीं है । अतः उसे वहाँ से हँट जाना चाहिए ।
यहाँ व्यञ्जना विरोधी महिम भट्ट का यही मत है कि पद्य के प्रतिपाद्य 'गोदावरीतट
तुम्हारे भ्रमण के योग्य नहीं है' का बोध अनुमान प्रमाण से हीं हो जाने से
व्यञ्जना वृत्ति की कोई आवश्यकता नहीं । उनके मत का सारांश यह है—
“गाँव के कुत्ते की हत्या का भ्रमण के कारण के रूप में निर्देश से उस धार्मिक
की भीरुता स्पष्ट है । पद्य में भ्रमण का क्षेत्र निर्दिष्ट नहीं है, अतः ग्राम तथा
गोदावरीतट इन दोनों ही स्थानों में सामान्य रूप से प्राप्त भ्रमण का भयकारणी-
भूत कुत्ते के मार दिये जाने के कारण ग्राम में विधान और भयकारणीभूत दृप्त सिंह
के उपलब्ध होने से गोदावरीतट पर निषेध ये दोनों हीं इस पद्य से अवगत होते ।
इनमें ग्राम में भ्रमण का विधान तो शब्दवाच्य है—यह सुनिश्चित है । गोदातट
पर भ्रमण का निषेध वाच्य नहीं, अपितु अनुमेय है । तात्पर्य यह है कि भयकारणी-
भूत कुत्ते के वध का भ्रमण के हेतु के रूप में निर्देश से यह निश्चित है कि भीरु
धार्मिक का भ्रमण वहीं सम्भव है जहाँ भयकारण की उपलब्धि न हो । इस प्रकार

४४ रसगङ्गाधरः
लिङ्गाद्व्यञ्जनमभ्युपगतम् । इत्थमेव च ध्वनिकृतापि प्रथमोद्योते । एवं च
व्यञ्जकानां साधारण्यं प्रतिपादयतां प्रामाणिकानां ग्रन्थैः सहाऽसाधारण्यं
प्रतिपादयतस्तव ग्रन्थस्य विरोधः स्फुटः ।
अत्र ग्रामगोदावरीकच्छकुहरयोर्भ्रमणविधिनिषेधस्वरूपार्थयोर्वाच्यत्वाऽनुमेयत्वा-
भ्यां वाक्याद् 'भ्रम धार्मिक' इत्यादेरवगमेऽपि निषेध एव बाध्यबाधकभावनिश्चय-
कृता वाक्यार्थस्य विश्रान्तिः, द्वयोर्विधिनिषेधार्थयोः परस्परविरुद्धयोरेकाश्रयत्वा-
सम्भवेन तयोः समुच्चयाऽभावात्, विकल्पेन प्रतिपाद्यत्वे वचनाऽनर्थक्यात्, परस्पर-
विरुद्धत्वेनाऽङ्गाङ्गिभावाऽभावाच्चेति महिमभट्टाशयः । वयं त्ववगच्छामः—ग्रामे भ्रमण-
विधेर्वाच्यत्वे गोदाकच्छकुहरे च भ्रमणनिषेधस्यानुमेयत्वे विधिनिषेधयोर्भिन्नाश्रयत्वेन
विरोधो न भवत्येव । अतो गोदावरीकच्छकुहरे स मा भ्रमीदित्येतावन्मात्रस्य पुंश्च-
ल्यभिप्रेतत्वेन ग्रामे भ्रमेन्मा वा भ्रमीरित्यस्य च सर्वथैव तदभिप्रायाऽविषयत्वेन
'यत्परः शब्दः स शब्दार्थः' इति न्यायेनैव निषेधे वाक्यार्थविश्रान्तिर्लभ्यत इति ।
व्यक्तिम् = व्यञ्जनाम् । लिङ्गात् = ज्ञापकात्, तत्त्वेनाभिमताद्वा । सोऽयं विशेषोऽनु-
मानाद् व्यञ्जनाया भेदं प्रमाणयति । अनुमितिर्हि अव्यभिचारिणो (व्याप्यत्वेन
निर्णीतात्) पक्षधर्मतया च निर्णीताल्लिङ्गाद् भवति, न तु तथात्वेन सन्दिह्यमाना-
दपि । यथोक्तम्—
यावच्चाऽव्यतिरेकित्वं शतांशेनाऽपि शङ्क्यते ।
विपक्षस्य कुतस्तावद्धेतोर्गमनिकाबल्म् ॥ इति ॥
भ्रमण (की योग्यता) का साधक जो भयकारणोपलब्ध्यभाव उसके स्वभाव से विरुद्ध
भयकारणीभूतदृप्तसिंहोपलब्धि होने से गोदातट पर उसके भ्रमण (की योग्यता) के
निषेध (=अभाव) की अनुमिति होती है । किन्तु जो लोग किसी भी व्यक्ति की
प्रवृत्ति वहीं मानते जहाँ किसी प्रकार के अनर्थ के सन्देह का न होना सुनिश्चित हो
उनके अनुसार गोदातट पर (भ्रमणात्मक) प्रवृत्ति के व्यापक अनर्थसंशयाभावनिश्चय
के विरुद्ध दृप्तसिंहनिमित्तक अनर्थ का संशय होने से वहाँ उस भीरु धार्मिक की
भ्रमणात्मक प्रवृत्ति के अभाव की अनुमिति हो जाती है । इसी द्वितीय प्रकार का
(सामान्यरूप मे तो नहीं अपितु विशेष रूप मे) काव्यप्रकाश मे निर्देश किया गया
है । इस प्रकार हेतु भयकारणनिवृत्ति और उसके वाच्य साध्य भ्रमण के बीच सहान-
वस्थानस्वरूप विरोध का निश्चय हो जाने से प्रकृत पद्य का तात्पर्यार्थ भ्रमणनिषेध
हीं होता, केवल भ्रमण का विधान अथवा विधान और निषेध दोनों नहीं, क्योंकि
समानविषयक विधि और निषेध के परस्पर-विरुद्ध होने से उन दोनों का समुच्चय
या अङ्गाङ्गिभाव असम्भव है । यदि 'घूमो' या 'मत घूमो' यह विकल्प अभिप्रेत
होता तब तो पुंश्चली के कथन की कोई आवश्यकता हीं न रह जाती ।

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प्रथमाननम् ४५
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अन्व्यतिरेकित्वम् = अव्यभिचारित्वम्, तस्य संशयोऽव्यभिचारसंशयो व्यभिचार-
संशयैककोटिकः । विपक्षस्य = विपक्षे । गमनिकावलम् = अनुमापकत्वम् । व्यञ्जनं
पुनस्तथात्वेन सन्दिह्यमानादपि लिङ्गाद् भवत्येव । प्रकृते च गुर्वाज्ञादिना भीरुधार्मि-
कस्य सिंहसत्त्वेऽपि भ्रमणसम्भवाद्धेतोः भ्रमणाभावस्वरूपसाध्याभाव(भ्रमण)वत्यपि
गोदाकच्छकुहरात्मके पक्षे वृत्तित्वसंशयाद् व्यभिचारसंशयः स्फुटः । पुंश्चलीवाक्य-
स्याऽप्रमाणत्वेन तद्वचनेन तत्र दृप्तसिंहसत्त्वाऽनिर्णयात् पक्षधर्मताऽपि सन्दिग्धैवेति
भवत्यसिद्धत्वसंशयोऽप्यत्र । धार्मिकस्य पापजनकश्वस्पर्शाद् बिभ्यतोऽपि यदि वीरत्वम्
तर्हि सिंहस्य तद्भयकारणत्वाऽभाव इति सिंहवत्त्वस्य हेतोऽभ्रं मणाभावाभावस्वरूप-
साध्याभावव्याप्तिसंशयाद्व

४६ रसगङ्गाधरः
किं च यदिदं निःशेषेत्याद्यवान्तरवाक्यार्थानां वापीस्नानव्यावृत्तिद्वारेण
णेन सामर्थ्यात् प्रतीतिपथमवतरति' इति । प्रकृतमुपसंहरति—एवं चेति । प्रामा-
णिकानामिति । काव्यप्रकाशकारमतस्य भृशं निराकरणात् ध्वन्यालोकाभिमतस्याऽपि
क्वचित्स्वयमनादृतत्वात् कथं तेषां प्रामाणिकत्वमिति चिन्त्यम्, अंशतोऽविरोधस्तु
दीक्षितेनाऽपि समानः, तथाऽपि दीक्षितेन तेषां प्रामाण्यमभ्युपगतमेवेत्यत एतदुक्तम् ।
'तव ग्रन्थस्य विरोधः स्फुटः' इत्यन्तेन ग्रन्थेन प्राचीनसकलग्रन्थविरुद्धत्वं चित्र-
मीमांसाकृत उपपाद्योपपत्तिविरोधमुपपादयति—किञ्चेत्यादिना । अयमाशयः—
यथाऽपूर्ववाक्यस्थले शब्दप्रामाण्यस्याऽवश्यस्वीकर्तव्यतयाऽन्यत्रापि शब्दप्रयोगे तत
एवार्थाऽधिगतिरिति तान्त्रिकप्रसिद्धिस्तथैव व्यभिचरितलिङ्गादिस्थले व्यञ्जनाया
अवश्यस्वीकरणीयत्वेन यत्राऽपि काव्ये लिङ्गस्याऽव्यभिचरितत्वं तत्रापि व्यञ्जनयै-
में सिंह है यह निश्चय नहीं हो सकता । इस प्रकार पक्षधर्मताज्ञानस्वरूप 'सिद्धि'
के अभाव में हेतु के 'असिद्ध' हेत्वाभास होने का भी संशय है हीं । साथ हीं, यह भी
संभव है कि वह धार्मिक वीर हो, किन्तु कुत्ते से इस लिए डरता हो कि उसके स्पर्श
से शरीरादि मे अपवित्रता आ जाएगी । ऐसी स्थिति में उस धार्मिक का सिंहयुक्त
स्थान पर भ्रमण हो हीं सकता है। वीर पुरुष तो सिंहादियुक्त स्थान पर भी ज्ञानपूर्वक
घूमते। इस प्रकार साध्याभाव ( = भ्रमणाभावाभाव = भ्रमण) के साथ सिंहोपलब्धि-
स्वरूप हेतु की व्याप्ति के सन्दिग्ध होने से यहाँ विरोधनामक हेत्वाभास का भी
संशय है । अनुमान सद्धेतु से होता, निश्चित या सन्दिग्ध हेत्वाभास से नहीं ।
अतः सिंहोपलब्धि से भ्रमणाभाव का अनुमान नहीं हो सकता । यह तो व्यञ्जना-
मात्र से गम्यमान है । इस लिए अनुमान प्रमाण से व्यञ्जना को गतार्थ नहीं किया
जा सकता ।
काव्यप्रकाश के उपर्युक्त सन्दर्भों से स्पष्ट है कि व्यञ्जनास्थल में ज्ञापक का
असाधारण (व्यङ्ग्यार्थमात्र से सम्बद्ध) होना अपेक्षित नहीं है । ध्वन्यालोक के प्रथम
उद्योत में भी यही बात कही गई है । अतः अप्पय्य दीक्षित का असाधारण्य-
प्रतिपादन के लिए किया गया प्रयास पूर्वोक्त प्रमाणिक आचार्यों के ग्रन्थों (में निर्णीत
सिद्धान्त) से विरुद्ध है जहाँ व्यञ्जकों को व्यङ्ग्य तथा उससे भिन्न अर्थोंके साथ समान
रूप से सम्बद्ध कहा गया है । अतः दीक्षित का प्रयास अनुचित है ।
अप्पय्य दीक्षित का उक्त प्रयास उपपत्तिविरुद्ध भी है । 'निःशेषच्युतचन्दनं स्तन-
तटम्' आदि विशेषणीभूत वाक्य के अर्थों को वे वापीस्नान से असम्भव बतलाते हुए
केवल व्यङ्ग्यार्थ के असाधारण कार्य के रूप में क्यों सिद्ध करना चाहते ? व्यङ्ग्यार्थ

प्रथमाननम् ४७
व्यङ्ग्यासाधारण्यं संपाद्यते तत्किमर्थमिति पृच्छामः ? व्यङ्ग्यस्य व्यञ्जना-
र्थमिति चेत् ? न, व्यञ्जकगताऽसाधारण्यस्य व्यञ्जनाऽनुपायत्वात् ।
ओणिण्हं दोब्बल्लं चिंता अलसंतणं सणीससिअम् ।
मह मंदभाइणीए केरं सहि तुह वि परिभवइ ॥
इत्यादौ साधारणानामेवौन्निद्र्यादीना वक्त्रादिवैशिष्ट्यवशादर्थविशेषव्यञ्ज-
कताया अभ्युपगतेः । प्रत्युताऽसाधारण्यस्य व्याप्त्यपरपर्यायस्यानुमानानु-
कूलतया व्यक्तिप्रतिकूलत्वाच्च ।

  • वार्थऽवसायो न गुरुतरेणानुमानेनेति कथमत्र निःशेषच्युतचन्दनमित्यादौ दीक्षितस्य
    असाधारण्यप्रतिपादनं व्यर्थम्, युक्तिसिद्धत्वात्तस्येत्यत उपपत्तिविरुद्धत्वं तस्य प्रदर्शयति
    प्रकृतेन सन्दर्भेण । तथा च व्यञ्जनास्थले सर्वत्रैव साधारण्यं लिङ्गस्य, न क्वचिद-
    साधारण्यमिति स्वयमेव वक्ष्यति । व्यङ्ग्यस्य = तदन्तिकमेव रन्तुं गतासीत्यस्यार्थस्य ।
    'ओणिण्हम्......' इत्यस्य संस्कृतच्छाया—
    औन्निद्र्यं दौर्बल्यं चिन्ताऽलसत्वं सनिःश्वसितम् ।
    मम मन्दभागिन्याः कृते सखि त्वामपि परिभवति ॥ इति ॥
    साधारणानाम् = उत्कटसंभोगवियोगादिजन्यत्वाद्बिशेषाणाम् । अर्थविशेषः = उत्कट-
    सम्भोगः । असाधारण्यस्य = अव्यभिचरितत्वस्य । व्यक्तिः = व्यञ्जना ।
    के स्पष्ट अभिव्यंजन के लिए तो ऐसा करना उचित नही है, क्योंकि अभिव्यंजन
    के साधकों के लिए व्यंग्यार्थ के असाधारण धर्म होने की कोई आवश्यकता
    तो हैं नहीं। इसी लिए—
    “अरी सखी ! मुझ अभागिन के चलते जागरण, दुर्बलता, चिन्ता, आलस्य और
    दीर्धनिश्श्वास ये सब दोष तुझे भी पीड़ित कर रहे हैं ॥”
    नायिका द्वारा उसके पति के साथ छिपकर सम्भोग कर आने वाली दूती के
    प्रति कहे गये इस पद्य में सम्भोग एवम् उत्कट वियोग आदि में समान रूप से होने
    वाले जागरण आदि को वक्त्री नायिका तथा बोद्धव्य दूती के प्रभाव से 'दूती के
    सम्भोग' का व्यंजक सभी मानते । इसलिए व्यंजक साधकों के लिए व्यङ्ग्यार्थ का
    असाधारण धर्म होना आवश्यक नहीं है। व्यंजक यदि व्यङ्ग्य का असाधारण
    धर्म हो तब तो दोनों के बीच व्याप्ति सम्बन्ध सिद्ध हो जाएगा, क्योंकि दो पदार्थों
    का असाधारण्य (= अव्यभिचरित होना) हीं तो व्याप्ति है । ऐसी स्थिति में असा-
    धारणय अनुमान ले लिए हीं अनुकूल होगा, व्यंजना के लिए तो यह सर्वथा प्रतिकूल
    होगा । अतः व्यंजनावादी दीक्षित का ऐसा मानना असंगत है ।

४८ रसगङ्गाधरः
अथ तटादिघटितत्वेऽपि न निश्शेषेत्यादिवाक्यार्थानामसाधारण्यम्,
सलिलार्द्रवसनकरणकप्रोञ्छनादिनापि तत्संभवादिति चेत् ? तर्हि वापी-
स्नानव्यावर्तनेन कः पुरुषार्थः ? एकत्रानैकान्तिकत्वस्येव बहुष्वनैकान्तिकताया
अपि ज्ञाताया अनुमितिप्रतिकूलत्वाद्व्यक्त्यप्रतिकूलत्वाच्च । अपि चात्र हि
तदन्तिकमेव रन्तुं गतासीति व्यङ्ग्यशरीरे तदन्तिकगमनं रमणरूपफलां-

इदानीं नाऽसाधारण्यप्रतिपादनमभिप्रेतमपि तु वापीस्नानमात्रव्यावर्त्तनमित्या-
शङ्कां प्रतिपादयति—अथेति । यद्वा निश्शेषच्युतचन्दनत्वादेर्वापीस्नानजन्यत्वव्या-
वर्त्तनेऽपि नाऽसाधारण्यम्, क्लिन्नवस्त्रप्रोञ्छनादिनाऽपि तथा सम्भवादित्याशङ्कां
प्रस्तौति—अथेति । यथा क्लिन्नवस्त्रप्रोञ्छनादिना सम्भोगेन च समानं निश्शेषच्युत-
चन्दनत्वादि स्तनतटादेस्तथैव वापीस्नानेनापि भवतु मा भूद्वा नाम, उभयोरपि
व्यञ्जकत्वानुपयोगेन तदर्थप्रसाधननैरर्थक्यं स्पष्टमित्याशयेन समाधत्ते प्रतिप्रश्न-
मुखेन-तर्हीत्यादिना । ननु वापीस्नानस्य व्यञ्जकत्वविरोधित्वात्तद्व्यावृत्तेस्तद्विरो-
धिनिराकरणं तन्मुखेन च व्यञ्जनासहकारित्वमित्येवार्थः, क्लिन्नवस्त्रादिप्रोञ्छना-
देश्चानुपस्थितत्वात्तद्व्यावृत्तौ न यतितमित्यत आह—अपि चेत्यादि । व्यङ्ग्यत्वस्य

‘निश्शेष……’ आदि विशेषणवाक्यों के ‘तट’ आदि शब्दों से घटित होने
पर भी उन वाक्यों के अर्थों से वापी-स्नान मात्र की व्यावृत्ति अभीष्ट है; वे
व्यङ्ग्य के असाधारण धर्म हैं ऐसा कहना नहीं, क्योंकि वे तो गीले वस्त्र से
पोंछने आदि से भी सम्भव हैं—यह कहकर भी उक्त मत के दोष का निराकरण नहीं
किया जा सकता, क्योंकि यदि वे विशेषणवाक्यार्थ अन्य कारण से भी सम्भव हैं तो
फिर उन्हें वापी-स्नान मात्र से असम्भव कह कर कौन सा अभीष्ट अर्थ सिद्ध
हो सकता ? अनैकान्तिकता (=व्यभिचार) तो किसी हेतु की एक स्थान में ज्ञात हो
या अनेक में, अनुमान के लिए समान रूप से वह प्रतिकूल है । व्यंजना के लिए तो
वह प्रतिकूल नहीं है। अतः उक्त विशेषणवाक्यार्थों को व्यङ्ग्य से अतिरिक्त गीले वस्त्र
से पोंछने आदि से सम्बद्ध मानने के साथ-साथ यदि वापी-स्नान से भी सम्बद्ध मान
लिया जाय तो भी अभिप्रेत अर्थ के अभिव्यंजन में कोई बाधा नहीं आती । अत एव
व्यंजकों को व्यङ्ग्य के असाधारण धर्म कहने की कोई आवश्यकता नहीं । और
भी, ‘तू रमण के लिए उसी के पास गई थी’ इस व्यंग्यार्थ में दो अंश हैं—‘रमण
(के लिए)’ और ‘उसके पास गई थी’ । दीक्षित के मत में ‘उसके पास गई थी’
इस अंश को व्यग्य कहना असम्भव है । यह अंश तो विपरीत-लक्षणा से हीं प्रतीत
हो जायगा । जब विशेषणवाक्यार्थ की उपपत्ति सम्भोगमात्र से सम्भव है, तब
तो उस अधम नायक के पास जाना ही दूती के लिए आवश्यक है, वापी-स्नान के

शश्चेति द्वयं घटकम् । तत्र तावत्तदन्तिकं गतासीत्यंशस्य तन्मते व्यङ्ग्यत्वं
दुरुपपादम् । त्वदुक्तरीत्या विशेषणवाक्यार्थानां निश्शेषेत्यादिप्रतिपाद्यानां
वाच्यार्थे वापीस्नाने बाधितत्वाद्वाच्यकक्षागतप्रधानवाक्यार्थीभूतविधिनिषेध-
प्रतिपादकाभ्यां गता न गतेति शब्दाभ्यां विरोधिलक्षणया निषेधस्य विधेश्च
प्रतीतेरुपपत्तेः । नहि मुख्यार्थबाधेनोन्मीलितेऽर्थे व्यक्तिवेद्यतोचिता । यथा
'अहो पूर्णं सरो यत्र लुठन्तः स्नान्ति मानवाः' इत्यत्र कर्तृविशेषणानुपपत्त्य-
धीनोल्लासे पूर्णत्वाभावे ॥
दुरुपपादत्वमेवोपपादयति तदर्थस्य लक्ष्यत्ववर्णनमुखेन—त्वदुक्तरीत्येत्यादिना ।
बाधितत्वादित्यनेन विशेषणवाक्यार्थान्वयबाधं लक्षणामूलमुपदर्शयति । (वापीं
स्नातुमितो) गताऽसीत्यनेन मुख्यार्थान्वयबाधमूलिकया विपरीतलक्षणया न गताऽसीति,
( तस्याऽधमस्यान्तिकं ) न गताऽसीत्यनेन च तथैव लक्षणया गताऽसीति प्रतीतेः
सम्भवान्न तत्र व्यञ्जना, वृत्त्यन्तराऽप्रतिपादितार्थस्यैव व्यञ्जनाविषयत्वादिति
तदन्तिकं गताऽसीत्यंशस्य व्यङ्ग्यत्वानुपपत्तिरिति सन्दर्भार्थः । वाक्ये शक्त्यभावाद्
वाक्यार्थस्य वाच्यत्वाऽभावेऽपि वाच्यतुल्यत्वात्तस्य वाच्यकक्षागतेति विशेषणम् ।
लक्ष्यस्य व्यङ्ग्यत्वाऽभावे दृष्टान्तमाह—यथेति । अत्र लुठन्तः ( = 'इतस्ततः परिवर्त-
मानाः ) इति स्नानक्रियाकर्तृ भूतमानवानां विशेषणस्य पूर्णशब्दवाच्यार्थे विवक्षिते
संगतिर्न भवतीति विपरीतलक्षणया पूर्णशब्दः पूर्णत्वाऽभावं गमयति । स चाऽभावो
लिए नहीं। ऐसी स्थिति में विशेषणवाक्यार्थ की 'तस्याधमस्यान्तिकं न गताऽसि'
इस मुख्यांश के वाच्यार्थ के साथ सङ्गति न होने से '....न गताऽसि' का विपरीत-
लक्षणा से 'गताऽसि' यही संगत अर्थ होगा । इसी तरह विशेषणवाक्यार्थ,
जो सम्भोगमात्रजन्य हैं, की संगति 'वापीं स्नातु' गताऽसि' इस अंश के वाच्यार्थ के
साथ न होने से यह अंश भी विपरीत-लक्षणा द्वारा 'वापीं स्नातु' न गताऽसि'
(वापी में स्नान के लिए नहीं गई थी) का ही प्रतिपादक होगा । इस प्रकार
विपरीत-लक्षणा से अवगत 'तदन्तिकं गताऽसि' इस अर्थ को व्यंग्य मानना सर्वथा
अनुचित होगा, क्योंकि मुख्य वृत्ति (अभिधा) तथा मुख्यार्थबाधमूलक वृत्ति
(लक्षणा) से जो अर्थ प्रतीत नहीं होता उसी की प्रतीति व्यञ्जनावृत्ति द्वारा सर्व-
मान्य है। जैसे—"अहा ! यह सरोवर जल से कितना भरा हुआ है जिससे लोग
इसमें लोटते हुए स्नान कर रहे हैं !" इस वक्तव्य में स्नान करने वाले लोगों के
विशेषणीभूत 'लुठन्तः' इस पद के मुख्यार्थ 'लोटते हुए' के साथ पूर्णशब्द के मुख्यार्थ
के अन्वय का बाध होने से, विपरीत-लक्षणा द्वारा प्रतीयमान पूर्ण शब्द के लक्ष्यार्थ

५० रसगङ्गाधरः
अथ तदन्तिकगमनस्य लक्षणावेद्यत्वेऽपि रमणस्य फलांशस्य लक्ष्यशक्ति-
मूलध्वननवेद्यत्वमव्याहतमेवेति चेत् ? 'अधमत्वमप्रकृष्टत्वम्, तच्च जात्या
कर्मणा वा भवति । तत्र जात्यापकर्षं नोत्तमनायिका नायकस्य वक्ति'
इत्यादिना संदर्भेण भवतैवार्थापत्तिवेद्यतायाः स्फुटं वचनात् । अन्यलभ्यस्य
लक्ष्यत्वाद् यथा न व्यङ्ग्यस्तथा प्रकृते तदन्तिकगमनरूपार्थोऽपीत्याशयः । कर्तृ-
विशेषणस्यानुपपत्तावधीन उल्लासः प्रत्ययो यस्य पूर्णत्वाऽभावरय तस्मिन्नित्यक्षरार्थः ।
अस्तु तर्हि रमणमात्रस्य व्यङ्ग्यत्वम्, विश्वनाथादिभिरूरीकृतं च तदेवेत्या-
शङ्कते—अथेति । लक्ष्यशक्तीत्यादि । लक्ष्यं तदन्तिकगमनम्, तस्य च या शक्तिः
सामर्थ्यं तन्मूलं यद्ध्वननं व्यञ्जना तद्वेद्यत्वं रमणस्येति । केवलविशेषणवाक्या-
र्थात्सम्भोगाऽसाधारणात् संभोगस्य व्यङ्ग्यत्वेऽपि तन्नायकसम्भोगस्याऽव्यङ्ग्यत्वात्
तदन्तिकगमनं लक्ष्यमेव विशेषणवाक्यार्थोपबृंहितं रमणं व्यनक्ति प्रकृत इति तात्पर्यम् ।
प्रमाणन्तरानधिगतार्थस्यैव व्यङ्ग्यत्वम् इति नयेनार्थापत्त्याऽनुमानेन वा प्रतिपन्नस्य
रमणस्याप्यव्यङ्ग्यत्वमेति न युक्तस्तन्मात्रस्यापि व्यङ्ग्यत्वपक्ष इत्याह —अधमत्व-
मित्यारभ्य अस्वीकृतेः इत्यन्तेन । प्राचीनः सर्व एवापराधः सोढ एवोत्तमनायिकया,
अन्यथा तदन्तिकं दूतीप्रेषणानुपपत्तेः, अतः प्राचीनापराधनिमित्तको नाधमपद-
प्रयोगोऽपि तु दूतीसम्भोगरूपापराधप्रयुक्त एवेति भवत्यर्थापत्त्या रमणबोधः, दूती-
सम्भोगस्वरूपापराधं विनाऽधमपदप्रयोगानुपपत्तेरित्याशयो दीक्षितग्रन्थस्य ।
'अपूर्ण' को कोई भी व्यंग्य नहीं मानता । इस प्रकार 'तदन्तिकं गताऽसि' इस अंश
की व्यंग्यता की अनुपपत्ति से भी अप्पय्य दीक्षित का असाधारण्योपपादनप्रयास
असंगत सिद्ध हो जाता ।
अच्छा तो 'तदन्तिकगमन' को लक्ष्य हीं मान लिया जाय और इसमें विशेषण-
वाक्यार्थो की सहायता से परिस्फुट जो सम्भोग-प्रत्यायक सामर्थ्य है उससे सम्भोग-
मात्र को, जो तदन्तिकगमन का फल है—व्यंग्य मानने में क्या बाधा है ? बाधा
यही है कि सम्भोग को इस पक्ष में व्यंग्य कहना सम्भव न हो सकेगा । अप्पय्य
दीक्षित ने स्वयं कहा है "उत्तम नायिका नायक के जातिगत अपकर्ष [हीनता] का
स्थापन तो कर नहीं सकती, क्योंकि जब दोनों के बीच दाम्पत्यसम्बन्ध बन ही गया
तो अब अपने नायक के जातिगत अपकर्ष का स्थापन नायिका के लिए अनुचित एवं
निन्दनीय होगा—इससे नायिका की उत्तमत्व विनष्ट हो जाएगा.........।" इससे
स्पष्ट है कि उनके अनुसार दूतीसम्भोगादि से भिन्न किसी अपराध के चलते नायक
का अधमत्व उपपन्न न होने से दूतीसंभोगादि की कल्पना की जाती है । इससे जय

प्रथमाननम् ५१
च शब्दार्थताया अस्वीकृतेः । अन्यच्च, यथाकथंचिदङ्गीकुरु वाऽत्र व्यञ्जना-
व्यापारं तथापि न तवेष्टसिद्धिः, वाच्यानां निःशेषच्युतचन्दनस्तनतट-
त्वादीनामधमत्वस्य च त्वदुक्तरीत्या प्रकारान्तरेणानुपपद्यमानतया दूती-
संभोगमात्रनिष्पाद्यत्वेन गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वप्रसङ्गात् । एवं चोपपत्तिविरो-
धोऽपि स्फुटतर एव । तस्माद्वाच्यार्थसाधारण्यमेवोचितमतिविदग्धनायिका-
निरूपितानां विशेषणवाक्यार्थानाम् ।
तथा हि—'अयि बान्धवजनस्याज्ञातपीडागमे स्वार्थपरायणे स्नानकाला-
ननु प्राचीनापराधाऽतिरिक्तोत्कटापराधत्वेन रमणस्योपपादकत्वादर्थापत्तिविषय-
त्वेऽपि रमणत्वेन तद्विषयत्वात् पर्यायोक्तप्रकरणस्थरीत्या रमणस्य व्यङ्ग्यत्वं
नाऽनुपपन्नमित्यत आह—अन्यच्चेत्यादि । यथाकथञ्चित् = उपपादकतावच्छेद-
कातिरिक्तेन रमणत्वेन रूपेण । इष्टसिद्धिः = ध्वनिकाव्यत्वोपपत्तिः । गुणीभूत-
व्यङ्ग्यत्वं चात्र वाच्यसिद्धयङ्गत्त्वरूपमभिप्रेतम् । वाच्यार्थः == वापीस्नानारूपार्थः ।
निरूपितानाम् = प्रतिपादितानाम् ।
सम्प्रति वापीस्नानसाधारण्येन विशेषणवाक्यार्थं व्याचक्षाणो यथाऽत्र व्यङ्ग्यार्थ-
प्रतीतिस्तथा निरूपयति—तथा हीत्यादिना । सम्भोगस्य व्यङ्ग्यत्वसंरक्षणयाऽ-
दूतीसंभोग की अर्थापत्तिप्रमाणविषयता सिद्ध है तो फिर उसे व्यंग्य कहना सम्भव
नहीं, क्योंकि शब्द किसी भी वृत्ति द्वारा उसी अर्थ का प्रतिपादक होता जो उस
प्रकरण में अन्य प्रकार से प्रतीत न होता हो । अतः यदि सम्भोग अर्थापत्तिवेद्य है
तो उसे व्यंग्य मानना सम्भव नहीं ।
यदि प्राचीन अपराधों से भिन्न किसी उत्कट अपराध के रूप में सम्भोग को
अर्थापत्ति का और सम्भोगत्वेन रूपेण सम्भोग को, पर्यायोक्त्यलङ्कारप्रकरण में वर्णन
किये जाने वाले प्रकार से, व्यङ्ग्य मान भी लिया जाय तो भी अप्पय्य दीक्षित का
मत समर्थित नहीं होता । उन्होंने उक्त पद्य को ध्वनिकाव्य माना है ।
किन्तु उनकी उपपादनविधि से तो इसे ‘वाच्यसिद्ध्यङ्ग’ नामक गुणीभूतव्यङ्ग्य
काव्य होना चाहिए, ध्वनिकाव्य नहीं । कारण यह है कि उनके द्वारा वर्णित
विशेषणवाक्यार्थों एव अधमपदार्थ की उपपत्ति सम्भोग के विना न होने से सम्भोग-
स्वरूप व्यङ्ग्यार्थ तो वाच्यार्थ का साधक हो जाता है । इस प्रकार उपपत्तिविरुद्ध
होने से भी अप्पय्य दीक्षित का मत असंगत है । अतः विदग्धा नायिका द्वारा उक्त
‘निःशेषच्युतचन्दनं स्तनतटम्’ आदि विशेषणवाक्यों के अर्थों को व्यङ्ग्य सम्भोग
तथा वाच्य वापी-स्नान इन दोनों के समान रूप से हीं कार्य मानना चाहिए ।
अतः उपर्युक्त पद्य का अर्थ इस प्रकार करना चाहिए—"अरी सखी ! तूँ
६ र०

५२ रसगङ्गाधरः
तिक्रमभयवशेन नदीमदीयप्रियोरन्तिकमगत्वैव वापीं स्नातुमितो ममान्ति-
काद्गतासि, न पुनस्तस्य परवेदनानभिज्ञतया दुःखदातृत्वेनाऽधमस्यान्तिकम् ।
यतो निःशेषच्युतचन्दनं स्तनयोस्तटमेव नोरःस्थलम्, वापीगतबहुलयुवजन-
त्रपापारवश्यादंसद्वयलग्नाग्रस्वस्तिकीकृतभुजलतायुगलेन तटस्यैवोन्नततया
मुहुरामर्शात् । एवं त्वरया सम्यगक्षालनेनोत्तरोष्ठो न निर्मृष्टरागोऽधरस्तु
तदपेक्षया गण्डूषजल-रदनशोधनाङ्गुल्यादीनामधिकसंमर्दमावहतीति तथा ।
किं च सम्यगक्षालनेन नेत्रे जलमात्रसंसर्गाद्दूरमुपरिभाग एवानञ्जने ।
शीतवशात्तानवाच्च तव तनुः पुलकितेति ।' एवं तस्या विदग्धाया गूढ-
तात्पर्यवोक्तिरुचिता, अन्यथा वैदग्ध्यभङ्गापत्तेः । एवं साधारणेषु
वाक्यार्थेषु मुख्यार्थे बाधाभावात्तात्पर्यार्थस्य झटित्यनाकलनात्कुतोऽत्र लक्षणा-
धमतवमन्यथोपपादयति—परवेदनेत्यादिना । वेदना = वियोगनिमित्तं दुःखम् ।
निःशेषच्युतचन्दनत्वादेः स्तनतटादिगतस्य वापीस्नानसाधारण्यमुपपादयति—वापी-
गतेत्यादिना । अंशद्वयलग्नेत्यादिप्रतिपादिता वाप्यादिस्नानमुद्रा रमणीषु प्रसिद्धा ।
आमर्शात् = भूयोभूयो जलस्पर्शात् । तथा = निर्मृष्टरागः । शीतवशादपि कठोरस्य
बलवतः शरीरस्य पुलकितत्वं कदाचिन्न भवेदिति तत्र हेत्वन्तरत्वेन तानवं कोमल-
त्वमप्युपात्तम्—तानवाच्चेति । गूढतात्पर्या = गूढमीषदगूढं तात्पर्यं व्यङ्ग्यं यस्याः
सा तथा । साधारणेषु = वापीस्नानसाधारणेषु । झटिति = वक्त्रादिवैशिष्ट्यावगतेः
अपनी सखी की पीड़ा को नहीं समझती । तूँ तो स्वार्थसिद्धि में हीं लगी हुई है ।
इसी लिए तो स्नान-वेला कहीं बीत न जाय इस डर से दूरवर्त्ती नदी में स्नान करने
नहीं गई बल्कि पास की वापी [तालाब] में ही स्नान करने यहाँ से चली गई ।
दूसरों की पीड़ा को न समझने के कारण दुःख देने वाले मेरे उस अधम पति के
पास तो गई हीं नहीं । तभी तो तेरे स्तनों के ऊपरी हिस्से से हीं चन्दन पूरी तरह
घुल पाया है, तेरे वक्षःस्थल से नहीं, क्योंकि उस वापी में स्नान करते हुए बहुत-से
युवकों से लज्जित होने से तूँने बार-बार अपने दोनों हाथों को स्वस्तिक मुद्रा में
कन्धों पर रखकर अपने उन्नत स्तनों के ऊपरी हिस्सों को हीं छिपाया होगा ।
इसी तरह तेरे ऊपरी होंठ की लाली भी घुल न सकी, क्योंकि तूँने लज्जा के कारण
जल्दी-जल्दी स्नान करके उसे पूरी तरह धुलाया न होगा । हाँ, तेरे अधर की लाली
तो पूरी तरह सही में घुल गई है, क्योंकि स्नान करने के पहले बार-बार कुल्ला
करने और दांत साफ करने से तेरे अधर पर तेरी अङ्गुलियों से खूब रगड़ पड़ी
होगी । और भी, अच्छी तरह स्नान [या सफाई] न करने से तेरी आँखों के
ऊपरी हिस्से का हीं अंजन कुछ कुछ घुल पाया है । ठंड और सुकुमार होने से
तेरे शरीर पर अब भी रोमाञ्च है ।"

प्रथमाननम् ५३
वकाशः ? अनन्तरं च वाच्यार्थप्रतिपत्तेर्वक्तृबोद्धव्यनायकादी-. वैशिष्ट्यस्य
प्रतीतौ सत्यामधमपदेन स्वप्रवृत्तिप्रयोजको दुःखदातृत्वरूपो धर्मः साधा-
रणात्मा वाच्यार्थदशायामपराधान्तरनिमित्तकदुःखदातृत्वरूपेण स्थितो
व्यञ्जनाव्यापारेण दूतीसंभोगनिमित्तकदुःखदातृत्वाकारेण पर्यवस्यतीत्या-
लंकारिकसिद्धान्तनिष्कर्षः । एतेन 'अधमत्वमपकृष्टत्वम्, तच्च जात्या
कर्मणा वा भवति । तत्र जात्याऽपकर्षं नोत्तमनायिका नायकस्य वक्ति ।
नापि स्वापराधपर्यवसायिदूतीसंभोगादिहीनकर्मातिरिक्तेन कर्मणा । तादृशं
च दूतीसंप्रेषणात्प्राचीनं सोढमेवेति नोद्घाटनार्हमितीतरव्यावृत्त्या संभोग-
रूपमेव पर्यवस्यति' इति यदुक्तम् तदपि निरस्तम् । विदग्धोत्तमनायि-
कायाः सखीसमक्षं तदुपभोगरूपस्य स्वनायकापराधस्य स्फुटं प्रकाशयितु-
मतितमामनौचित्येन प्राचीनानामेव सोढानामप्यपराधानामसह्यतया दूतीं
प्रति प्रतिपिपादयिषितत्वादिति दिक् ॥
पूर्वम् । लक्षणाऽवकाश इति । एतेन तदन्तिकमेव गताऽसीत्यस्य लक्ष्यत्वं वदन्तो
निराकृताः । स्वप्रवृत्तिः = अधमपदस्य प्रवृत्तिः प्रयोगः । अपराधान्तरमत्र स्वरमणी-
वियोगवेदनाऽनभिज्ञता । तथा च वियोगवेदनाऽनभिज्ञतानिमित्तकदुःखदातृत्वेनाऽ-
धमत्वं वाच्यम् इत्यर्थः । अनौचित्येनेति । नानानिमित्तकस्याप्यधमत्वस्य विशेषण-
वाक्यार्थमहिम्ना दूतीसम्भोगनिमित्तकदुःखदातृत्वनिमित्तकत्वेन रूपेण नियन्त्रित-
त्वाद्व्यङ्ग्यस्य वाच्यत्वापत्तिरपि दूषणान्तरं दीक्षितमते बोध्यम् । अयमेव
दिगर्थोऽत्र ॥
एक विदग्ध नायिका द्वारा ऐसा हीं वक्तव्य देना उचित है जिसका तात्पर्य
पूरी तरह स्पष्ट या नितान्त अस्पष्ट न हो । नहीं तो उसकी विदग्धता हीं नष्ट हो
जायेगी । इस प्रकार विशेषणवाक्यार्थों के सम्भोग एवं वापी-स्नान इन दोनों से
समानरूप से सम्बद्ध होने के कारण उनका अन्वय वाच्य वापी-स्नान के साथ आपा-
ततः हो हीं रहा है । तात्पर्यार्थ का बोध तो वक्तृबोद्धव्य आदि के वैशिष्ट्य का अवगम
होने से पूर्व हो नहीं सकता । अतः वाच्यार्थ के बोध के समय तात्पर्यानुपपत्तिस्वरूप
लक्षणा-बीज भी नहीं है । अतः लक्षणा से 'सम्भोग के लिए नायक के पास जाने'
की प्रतीति का कोई प्रश्न हीं नहीं उठता । पहले तो वाच्यार्थ के आधार पर हीं
वाक्यार्थबोध हो जाता । किन्तु जब वक्तृ-बोद्धव्य-वैशिष्ट्य की प्रतीति हो जाती तब
'मेरी प्रचण्ड विरहवेदना को न समझने के कारण नीच' यह अधम पद का वाच्यार्थ
हीं व्यञ्जनाव्यापार द्वारा 'प्राचीन अपराधों से अतिरिक्त किसी उत्कट अपराध
करने,' अर्थात् 'दूतीसम्भोग स्वरूप अपराध द्वारा दुःख देने से नीच' इस रूप में
प्रतिफलित हो जाता है ।

५४ रसगङ्गाधरः
यत्र व्यङ्ग्यमप्रधानमेव सच्चमत्कारकारणं तद्द्वितीयम् ॥
वाच्यापेक्षया प्रधानीभूतं व्यङ्ग्यान्तरमादाय गुणीभूतं व्यङ्ग्यमादाया-
क्रमप्राप्तमुत्तमकाव्यं लक्षयति—यत्रेत्यादिना ।
अवधारणप्रयोजनमाह—वाच्येत्यादिना । पराभिमतेऽपराङ्गे 'अयं स
रशनोत्कर्षी' इत्यादौ व्यङ्ग्यस्य रत्यात्मकस्य शृङ्गारस्य वाच्यार्थापेक्षया प्रधानत्वेऽपि
व्यङ्ग्यान्तरकरुणापेक्षयाऽप्रधानत्वमिति न तच्छृङ्गारमादाय तत्रोत्तमकाव्यलक्षणा-
ऽतिव्याप्तिरित्याशयः । तेन तस्य = पराभिमताऽपराङ्गस्य ध्वनित्वमेव । यद्यपि
काव्यप्रकाशकारादिमते चमत्कारातिशयजनकस्यैव प्राधान्यं सिध्यति तथापि पण्डित-
राजमते उपपादकत्वस्यैव तत्त्वमित्यावेदितपूर्वम् । अतश्च पराभिमतेऽपराङ्गे
नागेशादिमते वाच्यस्यैव शृङ्गारापेक्षयाऽतिशयचमत्कारवत्त्वेऽपि न तत्र वाच्यस्य
प्राधान्यम्, उपपादकत्वात्तस्य । यत्र पुनर्व्यङ्ग्यस्योपपाद्यत्वेन प्रधानत्वेऽपि चमत्कार-
जनकत्वं वाच्यार्थस्यैव तत्र पण्डितराजमते मध्यमकाव्यत्वमेव । इदन्तु बोध्यम्—
पण्डितराजमते यावन्मात्रं विवक्षितं तन्मात्रेणैव प्राधान्याऽप्राधान्यव्यवस्था,
उपर्युक्त रीति से अप्पय्य दीक्षित का निम्नलिखित कथन भी निरस्त हो
जाता है—
“अधमत्व, अर्थात् नीचता दो कारणों से सम्भव है—जाति से अथवा कर्म से ।
यहाँ नायक की जातिगत नीचता का प्रतिपादन तो विदग्ध नायिका कर नहीं
सकती । साथ हीं, दूतीसम्भोगात्मक अपराध जैसे हीन कर्म से भिन्न किसी पूर्व कुकर्म
के कारण भी वह नायक की नीचता नहीं बतला सकती, क्योंकि वैसे सभी पूर्वकृत
कुकर्मों को तो वह सह चुकी है, अब उनके उद्घाटन का कोई प्रयोजन नहीं है ।
यदि वे कुकर्म नायिका को असह्य होते तो वह नायक के पास अब दूती को भेजती
हीं क्यों ? अतः जाति या प्राचीन कुकर्मों के अधमत्व का प्रयोजक न होने से अन्ततो
गत्वा दूतीसम्भोगस्वरूप कुकर्म या अपराध हीं उस का प्रयोजक सिद्ध होता है ।”
इस कथन के निरस्त हो जाने का कारण यह है कि कोई भी अत्यन्त विदग्ध
नायिका अपनी सखी [दूती] के समक्ष तो उसी के साथ अपने पति के सम्भोग
की बात स्पष्ट रूप में कह नहीं सकती, क्योंकि उसके लिए ऐसा कहना अत्यन्त
गर्हित होगा । वह तो उसके समक्ष व्यक्त रूप में प्राचीन अपराधों को हीं असह्य
बताकर अपना उत्कट आक्रोश चतुराई से अभिव्यक्त करना चाहेगी । अतः दीक्षित
का मत अयुक्त है ॥
जिस काव्य में व्यङ्ग्यार्थ अप्रधान होकर हीं चमत्कारातिशयजनक हो उसे
द्वितीय, अर्थात् उत्तम काव्य कहते हैं ॥
इस लक्षण में व्यङ्ग्यार्थ के विषय में 'अप्रधान होकर हीं' यह अप्रधानता का

प्रथमाननम् ५५
तिव्याप्तिवारणायावधारणम्। तेन तस्य ध्वनित्वमेव। लीनव्यङ्ग्यवाच्य-
न त्वविवक्षितयत्किञ्चिदादाय। अत एव 'निश्शेषच्युतचन्दनम्' इत्यादौ दूतीसम्भोगेन
विप्रलम्भशृङ्गारस्य व्यङ्ग्यत्वेऽपि न दूतीसम्भोगस्य प्राधान्यं हीयते, विप्रलम्भस्या-
ऽविवक्षितत्वात्। इतरथोत्समोत्तमत्वस्य निर्विषयत्वापत्तिः। एवकारव्यावर्त्यस्या-
ऽपराङ्गस्य ध्वनित्ववर्णनेन चान्तरालिकव्यङ्ग्यमादाय पण्डितराजमते नोत्तमत्वादि-
व्यवहार इत्यपि सूच्यते। अतः 'अयं स रशनोत्कर्षी' इत्यादौ यच्छृङ्गारमादाय
गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वमुक्तं पूर्वं तन्मतान्तराऽभिप्रायेण। पण्डितराजमते तु पार्यन्तिक-
व्यङ्ग्यं करुणमादायैव व्यवस्थेति तस्योत्तमोत्तमत्वमेवेति। अथवोत्समोत्तमकाव्ये
व्यङ्ग्यस्य प्रधानत्वेऽवधारणाभावात् पार्यन्तिकव्यङ्ग्यापेक्षयाऽप्रधानत्वेऽपि वाच्या-
पेक्षया शृङ्गारस्य रत्यात्मकस्य प्राधान्येन बहूनां प्रकाशटीकाराणां मते चमत्का-
रित्वेन च तमादायैव ध्वनित्वमस्य निर्वाह्यम्। 'उअ णिच्चलणिप्पन्दा' इत्यादेरपि
प्रकृतैवकारव्यावर्त्यत्वमस्त्येव। अत ईदृशस्याप्युत्तमोत्तमत्वं निव्यूढम्। लीन-
व्यङ्ग्य इत्यादि। लीनमस्फुटं व्यङ्ग्यं यत्र तादृशे वाच्यचित्र इत्यर्थः। यद्वा
अवधारण किया गया है जिससे यह स्पष्ट है कि उसे सर्वथा अप्रधान हीं होना
चाहिए, किसी की भी अपेक्षा प्रधान नहीं। इसी लिए जहां एक व्यङ्ग्यार्थ अन्य
व्यङ्ग्यार्थ की अपेक्षा अप्रधान हो उसे उत्तम काव्य नहीं कहां जा सकता। वह तो
अन्तिम चमत्कारजनक व्यङ्ग्यार्थ के आधार पर उत्तमोत्तम काव्य ही होगा जिसे
ध्वनिकाव्य भी कहा जाता है। अतः उक्त अवधारण के बिना उसमें उत्तम काव्य के
लक्षण की अतिव्याप्ति अपरिहार्य हो जाती, क्योंकि वहाँ भी पूर्व व्यङ्ग्यार्थ . अन्तिम
व्यङ्ग्यार्थ की अपेक्षा अप्रधान है हीं। इस तरह के ध्वनिकाव्य का एक उदाहरण
काव्यप्रकाश आदि में दिया हुआ 'अपराङ्ग' का उदाहरण है-
अयं स रशनोत्कर्षी पीनस्तनविमर्दनः।
नाभ्यूरुजघनस्पर्शी नीवीविस्रंसनः करः ॥
भूरिश्रवा की कटी हुई बांह को देखकर विलाप करती हुई उसकी पत्नी की यह
उक्ति है। इसमे पूर्वकालिक रशनाकर्षण आदि शृंगार-विलासों से व्यङ्ग्य शृंगार
(= रति) प्रधानीभूत करुण की अपेक्षा गुणीभूत होकर भी वाच्यार्थ की अपेक्षा
प्रधान है। अतः शृंगारस्वरूप व्यङ्ग्य को लेकर इसे उत्तम काव्य नहीं कहा जा
सकता। यह तो करुणस्वरूप मुख्य व्यङ्ग्य के आधार पर ध्वनिकाव्य हीं है।
पण्डितराज के मत मे अन्त्य व्यङ्ग्य के आधार पर हीं उत्तमोत्तमत्वादि की व्यवस्था
होती है, आन्तरालिक व्यङ्ग्य के आधार पर नहीं। यह विषय संस्कृत टीका में
स्पष्ट किया गया है। इसी अवधारण से 'उअ णिच्चलणिप्पन्दा' आदि ध्वनिकाव्य

५६ रसगङ्गाधरः

अस्फुटव्यङ्ग्ये वाच्यचित्रे चेति । व्यङ्ग्यस्याऽस्फुटत्वादेव च तत्र चमत्काराऽभावः ।
काव्यप्रकाशोक्तं गुणीभूतव्यङ्ग्यमेवात्रोत्तमं काव्यमिति टीकाकाराः ।
वयन्त्ववगच्छामः—पण्डितराजलक्षणे व्यङ्ग्यस्याऽप्रधानत्वेऽपि वाच्यार्थापेक्षयाऽति-
शयचमत्कारित्वं यत्र तस्यैवोत्तमत्वमभिप्रेतम् । अत एव समप्राधान्ये मध्यमकाव्य-
त्वोक्तिरपि संगच्छते । प्रकाशादौ पुनरतिशयचमत्कारजनकत्वं व्यङ्ग्यस्य गुणीभूत-
व्यङ्ग्येषु न सम्भवत्येव । अत उभयोस्तमःप्रकाशवद्भेदः । किञ्चाऽसुन्दरव्यङ्ग्यादौ
चमत्कारो नास्त्येव व्यङ्ग्यस्येति कथं तस्योत्तमत्वं पण्डितराजमते ? अतो यत्र
प्रकाशाद्यभिमतगुणीभूतेषु व्यङ्ग्यस्य सहृदयावर्जकत्वं प्रतीतिबलादायातं प्रधानत्वं तु
वक्तृतातपर्यमुख्यविषयत्वाभावेन न विद्यते तेषामेवात्रोत्तमत्वमिति । अयं च भेदो
वस्तुतः प्रधानत्वस्वरूपविषयभेदाश्रयः । प्रधानत्वं पण्डितराजमत उपपादकत्वाऽस-
मानाधिकरणमुपपाद्यत्वं वक्तृतातपर्यमुख्यविशेष्यतारूपं वैवक्षिकमिति पूर्वमस्माभि-
रुक्तमेव ! तथा च पण्डितराजाभिमतप्राधान्याभावादुत्तमे व्यङ्ग्यस्यैतन्मतेऽपि
गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वं सुघटम् । परं यद् गुणीभूतव्यङ्ग्यशब्देन प्रकाशादिष्वभिप्रेतं न
तदत्र, शब्दसाम्यं नार्थसाम्यमिति विवेकः । अधिकं विज्ञैर्विवेचनीयम् ।
एतावता पण्डितराजाभिमतगुणीभूतव्यङ्ग्यशब्दार्थनिर्णयाद् यद् गुणीभूत-
व्यङ्ग्यं काव्यप्रकाशे 'अतादृशि गुणीभूतव्यङ्ग्यं व्यङ्ग्ये तु मध्यमम्' इति लक्षितम्
तन्निरस्तं वेदितव्यम्, तस्याऽशब्दार्थत्वात् । किञ्च तदीयाधमकाव्ये अर्थचित्रे
व्यङ्ग्यस्य वाच्यापेक्षयाऽतिशयित्वाभावात्तदीयगुणीभूतव्यङ्ग्यलक्षणस्याऽतिव्याप्ति-
रपीत्यतोऽपि हेयं तल्लक्षणम् । यत्पुनस्तट्टीकाकारैरेतदतिव्याप्तिवारणायैतल्लक्षणे
में भी अतिव्याप्ति का निराकरण समझना चाहिए । जिस वाच्यचित्र ¹⁶काव्य में
व्यङ्ग्यार्थ रहकर भी अत्यन्त अस्पष्ट रहने से चमत्कारजनक नहीं होता उसमें
उत्तमकाव्य के लक्षण की अतिव्याप्ति को रोकने के लिए व्यङ्ग्यार्थ को 'चमत्कार-
जनक' कहा गया है । इसी काव्य को वास्तविक 'गुणीभूतव्यङ्ग्य' समझना चाहिए ।
जो आचार्य अतिशयचमत्कारजनक अर्थ को हीं प्रधान मानते तथा काव्य के तीन हीं
भेद—उत्तम, मध्यम और अधम स्वीकार करते उनके मत में पण्डितराजसम्मत
उत्तम काव्य भी ध्वनिकाव्य हीं है ।
काव्यप्रकाशकार ने व्यङ्ग्यार्थ के वाच्यार्थ से अल्पचमत्कारजनक होने पर
काव्य को 'गुणीभूतव्यङ्ग्य' कहा है । किन्तु वाच्यचित्र काव्य में इस लक्षण की
अतिव्याप्ति स्पष्ट है, क्योंकि उसमें व्यङ्ग्यार्थ वाच्यार्थ से अधिक चमत्कार को
उत्पन्न न करने से उनके मत में गुणीभूत है हीं । उनके कुछ टीकाकार इस अतिव्याप्ति

प्रथमाननम् ५७
चित्रातिप्रसङ्गवारणाय चमत्कारेत्यादि । यत्तु 'अतादृशि गुणीभूत-
व्यङ्ग्यम्' इत्यादिकाव्यप्रकाशगतलक्षणे चित्रान्यत्वं टीकाकारैर्दत्तम्, तन्न ।
पर्यायोक्तिसमासोक्त्यादिप्रधानकाव्येष्वव्याप्त्यापत्तेः । तेषां गुणीभूतव्यङ्ग्य-
तायाश्चित्रतायाश्च सर्वालंकारिकसंमतत्वात् ।
उदाहरणम्—
राघवविरहज्वालासंतापितसह्यशैलशिखरेषु ।
शिशिरे सुखं शयानाः कपयः कुप्यन्ति पवनतनयाय ॥ इति ।
अत्र जानकीकुशलावेदनेन राघवः शिशिरीकृत इति व्यङ्ग्यमाकस्मिक-
चित्रान्यत्वे सतीति विशेषणं प्रक्षिप्तं तदप्यसमञ्जसमित्याह—तन्नेत्यादिना ।
एतत्तु प्रतीयते यदत्रत्यो गङ्गाधरग्रन्थः शब्दसाम्याल्लेखकेनांशतोऽपरामृष्टः । मूलं
त्वित्थं सम्भाव्यते—"यत्तु 'अतादृशि गुणीभूतव्यङ्ग्यम्' इति काव्यप्रकाशगतं लक्षणं
तदयुक्तम्, अर्थचित्रेऽतिव्याप्तेः । यत्तु लक्षणे चित्रान्यत्वं .........।" इति ।
राघवविरहेत्यादिपद्ये सह्य इति शैलनाम । पदार्थः स्पष्टः । व्यङ्ग्यम् =
जानकीकुशलावेदनम् । आकस्मिकेत्यस्यानुक्तहेतुकेत्यर्थः । कामपि = वाच्यार्थाति-
शायिनीम् । अत्र च व्यङ्ग्यस्यातिशयचमत्कारित्वेऽपि कुप्यन्तीतिपदवाच्यकोप-
साधकतया अप्राधान्यमिति भवत्युत्तमत्वमस्येति सन्दर्भार्थः ।
प्रागुक्तम् = 'तल्पगताऽपि च सुतनुः' इत्यत्र वर्णितम् । व्यङ्ग्येनैव =
रत्याख्यस्थायिनैव । अतश्च तस्याप्युत्तमत्वं युक्तं न तूत्तमोत्तमत्वमित्याशङ्कार्थः ।
तत्र वाच्यस्य व्यङ्ग्यातिरिक्तनाप्युपपत्तौ सहृदयाह्लादजनकस्य व्यङ्ग्यस्य न वाच्या-
का निराकरण करने के लिए इस लक्षण में 'चित्रान्यत्वे सति' (अर्थात् उसे चित्र
काव्य से भिन्न भी होना चाहिए) यह विशेषण जोड़ते, परन्तु इससे भी निर्वाह नहीं
होता, क्योंकि तब तो पर्यायोक्ति आदि अलङ्कारों से हीं प्रधान रूप मे घटित काव्य
को, जिसे सब आचार्य गुणीभूतव्यङ्ग्य होने के साथ-साथ चित्र काव्य भी मानते,
गुणीभूतव्यङ्ग्य काव्य कहना सम्भव न हो सकेगा । अतः उक्त विशेषण जोड़ने पर
भी उनका लक्षण अव्याप्तिदोषग्रस्त होगा । अत एव यह लक्षण असंगत है।
उत्तम काव्य का उदाहरण यह है—
"रामचन्द्र के जानकीविरहाग्नि की ज्वालाओं से सन्तप्त सह्य-नामक पर्वत के
शिखरों पर शिशिर ऋतु में आराम से सोये हुए बन्दर पवनपुत्र हनूमान् (जिन्होंने
जानकी की सूचना देकर रामचन्द्र के विरहाग्नि को घटा दिया) पर क्रुद्ध हो उठे।।"
इस पद्य में बन्दरों द्वारा हनूमान् पर किए गए क्रोध का कारण, जो वाच्यार्थ से
स्पष्ट न हो रहा था, यह व्यङ्ग्यार्थ है कि उसने (हनूमान् ने) जानकी का कुशल-
समाचार रामचन्द्र को बतला कर उनके विरहानल के ताप को शान्त (शीतल)

५८ रसगङ्गाधरः
कपिकर्तृक-हनूमद्विषयककोपोपपादकतया गुणीभूतमपि दुर्दैववशतो दास्य-
मनुभवद्राजकलत्रमिव कामपि कमनीयतामावहति । नन्वेवं प्रागुक्तमाक्षेप-
गत मान्द्यमपि नववधूप्रकृतिविरोधादनुपपद्यमानं व्यङ्ग्येनैवोपपाद्यत
इति कथमुत्तमोत्तमता तस्य काव्यस्येति चेत् ? न । यतो ह्यनुदिनसख्यु-
पदेशादिभिरनतिचमत्कारिभिरप्युपपद्यमानं मान्द्यमिदं प्रथमचित्तचुम्बिनीं
विप्रलम्भरतिमप्रकाशयन्न प्रभवति स्वातन्त्र्येण परनिर्वृतिचर्वणागोचरता-
माधातुम् । इत्थमेव निश्शेषच्युतचन्दनमित्यादिपद्ये'ष्वधमत्वादीनि
ऽपेक्षमप्रधानत्वम्, प्रकृते पुनर्वाच्यस्य कोपस्य व्यङ्ग्यातिरिक्तकारणेनानुपपत्तौ भवति
व्यङ्ग्यस्य वाच्याङ्गत्वमिति नानयोः साम्यमित्याशयेनोत्तरति—यत इत्यादिना ।
व्यङ्ग्यविप्रलम्भरत्यपेक्षया न्यूनचमत्कारजनकत्वेन सख्युपदेशादेरनतिचमत्कारि-
त्वमुक्तम् । सहृदयहृदये चमत्कारजनकार्थ एव प्रथमं भासत इति विप्रलम्भरतिरेव
तत्राऽऽक्षेपगतमान्द्यकारणत्वेन प्रथमं विषयीभवतीत्यतः प्रथमचित्तचुम्बिनीमिति-
विशेषणं प्रदत्तं प्रकृते विप्रलम्भरतेः । परा या निर्वृत्तिरानन्दः तस्य या चर्वणा-
आस्वादस्तद्गोचरतां तद्विषयतामित्यर्थः । 'तल्पगताऽपि' इत्यत्रोक्तं न्यायं 'निश्शेष--
कर दिया । यह व्यङ्ग्यार्थ यद्यपि वाच्य कपिनिष्ठ क्रोध का गुणीभूत अवश्य है,
क्योंकि वाच्य क्रोध की इसके विना उपपत्ति न होने से यही उसका उपपादक
(अत एव अप्रधान) है तथापि चमत्कारजनकता तो इसमे उसी प्रकार विद्यमान है
जैसे दुर्भाग्यवश दासी का स्थान प्राप्त करने वाली रानी में सौन्दर्य अक्षुण्ण बना हीं
रहता है । अतः इस पद्य में व्यङ्ग्य के वाच्यसिद्धयङ्गभूत होने पर भी चमत्कारा-
तिशयजनक होने से इसमें उत्तमकाव्यत्व उपपन्न है ।
तो फिर 'तल्पगताऽपि च सुतनुः' इस पूर्वोदाहृत पद्य में भी प्रिय के करकमल को
हँटाने में जो प्रियतमाकी मन्दता कही गई है वह भी नवोढ़ा के स्वभाव से विरुद्ध
होने से स्वतः अनुपपन्न है; ऐसो स्थिति में उक्त व्यङ्ग्यार्थ—संलक्ष्यक्रम रति के
भी वाच्य मन्दता का उपपादक होने उसे कैसे उत्तमोत्तम काव्य (अर्थात् वहाँ
भी व्यङ्ग्य के वाच्यसिद्धयङ्ग होने से उत्तम काव्य क्यों नहीं) कहा गया है ?
यहाँ वाच्य मन्दता तो प्रकरण से अविरुद्ध जो सखियों के उपदेश आदि
हैं ( कि प्रियतम के साथ कठोर व्यवहार कभी नहीं करना चाहिए )
उनसे भी उपपन्न है हीं । अतः वाच्यार्थबोध के पश्चात् सहृदयों को शीघ्र हीं
प्रतीत होने वाला व्यङ्ग्यभूत विप्रलम्भशृंगार वाच्यार्थ का उपपादक न होने से
गुणीभूत नहीं है । किन्तु अतिशय चमत्कार का जनक तो यह है हीं, क्योकि यही
सहृदयों को वाच्यार्थबोध के बाद झट से प्रतीत होता और इसकी प्रतीति के विना

प्रथमाननम् ५९
वाच्यानि व्यङ्ग्यातिरिक्तेनार्थेनापाततो निष्पन्नशरीराणि व्यञ्जकानीति न
तत्रापि गुणीभावः शङ्कनीयः । अनयोर्भेदयोरनपह्नवनीयचमत्कारयोरपि
च्युतचन्दनम्' इत्यत्रापि योजयति—इत्थमेवेत्यादिना । व्यङ्ग्यातिरिक्तार्थेन =
परवेदनाभिज्ञतारूपेणार्थेन । आपातत इति व्यङ्ग्यातिरिक्तार्थस्याधमत्वोपपादकत्वं
वक्तृतात्पर्याऽविषयीभूतमित्याशयेनोक्तम् । उत्तमोत्तमयोर्व्यङ्ग्यस्य चमत्काराति-
शयवत्त्वेऽपि को भेद इत्याह—अनयोरित्यादिना ।
अत्रेदं चिन्त्यम्—वक्तृतात्पर्यविषयीभूतस्यैव व्यङ्ग्यस्य प्राधान्याऽप्राधान्यनिरू-
पणं प्रकृतोपयोगि न वेति । तत्रान्त्यः पक्षो न शोभते, एवं हि सति 'निश्शेषच्युतचन्द-
नम्' इत्यादावपि दूतीसंभोगस्वरूपस्य व्यङ्ग्यस्य विप्रलम्भशृङ्गारात्मकव्यङ्ग्यान्त-
राङ्गत्वेनाऽप्राधान्यादुत्तमोत्तमत्वव्याघातः । अतो वक्तृतात्पर्यविषयीभूतव्यङ्ग्यस्यैव
यथायथं प्राधान्याऽप्राधान्यनिरूपणं करणीयम् । तात्पर्यनिर्णयश्च प्रकरणादिना
प्रसिद्ध एव । अतश्च गतोऽस्तमर्क इत्यादेरपि व्यङ्ग्यः स एवार्थो यो वक्तृबोद्ध-
व्यानुरूपः । अन्ये त्वर्था बोद्ध्व्यान्तरबोधविषयास्तद्व्यञ्जकवाक्यसाम्यप्रयुक्तप्रकृत-
वाक्याऽभेदभ्रमेण । कारणस्य भ्रान्तत्वेऽपि फलस्य भ्रान्तत्वं न नियतम् । यद्वाऽर्थान्तर-
बोधोऽनुमानेनैव सुकरः । तदेवं वक्तृतात्पर्यविषयीभूतस्यैव व्यङ्ग्यस्य काव्यार्थ-
पर्यालोचनायां परिग्रहे सिद्धे यथा 'निश्शेषच्युतचन्दनम्' इत्यादौ दूतीसम्भोगस्यै-
वान्ततोऽधमत्वहेतुत्वं व्यवस्थितं तथैव 'राघवविरह......' इत्यादिपद्येऽपि जानकी-
कुशलावेदनस्यैवान्ततो वक्तृतात्पर्यविषयतया वाच्यकोपहेतुत्वम् । ततश्च यद्यपि जानकी-
कुशलावेदनमिव दूतीसम्भोगादेरप्यधमत्वहेतुत्वेनाधमत्वोपपादकत्वमेव न तु तदुपपाद्य-
त्वमिति तत्रापि पूर्वोक्तोपपादकत्वाऽसमानाधिकरणोपपाद्यत्वं प्राधान्यं न सम्भवति
तथाऽपि 'बान्धवजनस्याज्ञातपीडागमे' इत्यनेनापाततः प्रतीयमानेन प्रकरणाद्यविरुद्धेन
विरहवेदनानभिज्ञत्वरूपेणार्थान्तरेणाधमत्वप्रतीत्या वाक्यार्थविश्रान्तेः पश्चाद् वक्त्रादि-
वैशिष्ट्येन प्रतीतस्य दूतीसम्भोगस्याधमत्वज्ञाप्यत्वादुपपाद्यत्वमक्षतम् । एवमेव
'तल्पगताऽपि च सुतनुः' इत्यत्रापि योज्यम् । 'राघवविरहज्वाला' इत्यादौ तु
कोपस्य यद्यपि विलम्बातिशयादिनाप्युपपत्तिः सम्भवति तथापि तस्य प्रकरणादि-
विरुद्धत्वेन न कोपोपपादकत्वं येन जानकीकुशलावेदनस्य दूतीसम्भोगादिवदुपपाद्यत्वं
परमानन्द का अनुभव भी हो नहीं सकता । अतः इसे उत्तमोत्तम काव्य माना गया
है, उत्तम काव्य नहीं । इसी प्रकार 'निश्शेषच्युतचन्दनम्' आदि पद्य में भी नायक
का अधमत्व और स्तनतट का पूरी तरह चन्दनरहित हो जाना आदि वाच्यार्थ के
प्रकरणाद्यविरुद्ध वियोगवेदनानभिज्ञता और गीले वस्त्र से पोंछने आदि से हीं उपपन्न
हो जाने से वहाँ भी अधमत्वादि दूतीसम्भोगादि के व्यञ्जक हीं हैं, न कि उनके
उपपादक । अतः उक्त पद्य में भी व्यङ्ग्य को वाच्यसिद्धि का अङ्ग—गुणीभूत

६० रसगङ्गाधरः
प्राधान्याऽप्राधान्याभ्यामस्ति कश्चित्सहृदयवेद्यो विशेषः ।
यत्तु चित्रमीमांसाकृतोक्तम्—
“प्रहरविरतौ मध्ये वाऽह्नस्ततोऽपि परेण वा
किमुत सकले याते वाऽह्नि प्रिय त्वमिहैष्यसि ।
इति दिनशतप्राप्यं देशं प्रियस्य यियासतो
हरति गमनं बालाऽऽलापैः सबाष्पगलज्जलैः ॥ इति ॥
स्यात्, अपि तु प्रकरणाऽविरुद्धेन जानकीकुशलावेदनेनैव वाच्यकोपोपपत्तौ सत्यां
वाक्यार्थविश्रान्तिरिति न तस्य कोपोपपादनेति न प्राधान्यमपीति नात्र ध्वनित्वम्,
अपि तु वाच्यसिद्ध्यङ्गत्वमेव । । तथा च यत्र काव्ये वाच्यस्य प्रकरणाद्य-
विरुद्धेन व्यङ्ग्यातिरिक्तेनार्थेनोपपत्त्या वाक्यार्थविश्रान्तिरनन्तरं च वक्त्रादि-
वैशिष्ट्यादर्थान्तरव्यक्तिस्स ध्वनेर्विषयः, यत्र पुनर्वाच्यस्य प्रकरणाद्यविरुद्धव्यङ्ग्याति-
रिक्तार्थनिमित्तोपपाद्यत्वाऽभावस्स सति व्यङ्ग्यस्य चमत्कारित्वे द्वितीयस्योत्तमकाव्य-
लक्षणस्य विषय इति सारम् । तदिदमुक्तम्—अस्ति कश्चित् सहृदयवेद्यो विशेष
इति ।
प्रहरविरतावित्यादि । अतिदूरं जिगमिषुं प्रियं दिनमात्रमपि तद्वियोग-
सहनाऽसमर्था प्रियतमा कथयति—हे प्रिय ! ‘अह्नो दिवसस्य प्रहरमात्रापगमे सति
(प्रहरानन्तरमेव), मध्ये = द्वितीयप्रहरे, ततोऽपि परेण = तृतीये प्रहरे वा, किमुत
सकलेऽह्नि याते = व्यतीते वा त्वम् इह = मत्सकाशमेष्यसि ?’ इति इत्येवंविधैः
सबाष्पगलज्जलैरालापैर्बाला दिनशतप्राप्यमसंख्यदिनप्राप्यमतिदूरदेशं यियासतो गन्तु-
मिच्छतः प्रियतमस्य गमनं हरति = निवारयति—इति पद्यार्थः ।

नहीं माना जा सकता । अत एव यह भी उत्तमोत्तम काव्य है । उत्तमोत्तम और
उत्तम भेदों में व्यङ्ग्यार्थ के वाच्यार्थ की अपेक्षा अतिशयचमत्कारजनक होने से
साम्य होने पर भी दोनों में यही अन्तर है कि प्रथम में व्यङ्ग्यार्थ प्रधान होता
जब कि द्वितीय में अप्रधान । यह सूक्ष्म अन्तर केवल सहृदय समझ सकते हैं,
जनसामान्य नहीं ।
चित्रमीमांसाकार ने गुणीभूतव्यङ्ग्य का यह उदाहरण दिया है—
“किसी नवोढ़ा नायिका का प्रियतम इतना दूर जाना चाहता है कि वहाँ
पहुंचने में हीं महीनों लग जायेंगे । उस समय शीघ्रभावी दीर्घ विरह को सहने में
असमर्थ उस झरझराती आँखों वाली नवोढ़ा ने रुंधे गले से अपने प्रियतम से ‘क्या
तुम एक पहर बीतते हीं मेरे पास लौट आओगे या दूसरे पहर या तीसरे पहर मे
या उसके बीत जाने के बाद हीं, शाम में ? ये हृदयस्पर्शी प्रश्न पूछ कर
उसकी यात्रा स्थगित कर दी ॥”

प्रथमाननम् ६१
अत्र सकलमहः परमावधिस्ततः परं प्राणान्धारयितुं न शक्नोमीति
व्यङ्ग्यं प्रियगमननिवारणरूपवाच्यसिद्ध्यङ्गमतो गुणीभूतव्यङ्ग्यम्" इति
तन्न । सबाष्पगलज्जलानां प्रहरविरतावित्याद्यालापानामेव प्रियगमननिवा-
रणरूपवाच्यसिद्ध्यङ्गतया व्यङ्ग्यस्य गुणीभावाभावात् । आलापैरिति तृती-
यया प्रकृत्यर्थस्थ हरणक्रियाकरणतायाः स्फुटं प्रतिपत्तेः । न च व्यङ्ग्य-
स्यापि वाच्यसिद्ध्यङ्गताऽत्र संभवतीति तथोक्तमिति वाच्यम्, निःशेषच्युत-
चन्दनमित्यादौवाधमत्वरूपवाच्यसिद्ध्यङ्गताया दूतीसंभोगादौ संभ-
वाद्गुणीभावापत्तेः । अस्तु वा ततः परं प्राणान्धारयितुं न शक्नोमीति
अत्र वाच्यैरालापैरेव वाच्यान्तरस्य प्रियगमननिवारणस्योपपत्तौ वाक्यार्थ-
विश्रान्तेः पश्चात् प्रतीयमानं 'सकलमहः परमावधिस्ततः परं प्राणान् धारयितुं न
शक्नोमि' इति व्यङ्ग्यं न वाच्यसिद्ध्यङ्गमिति न तदादाय गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वोपपादन-
मुचितं दीक्षितस्येत्याशयेन निरस्यति तन्मतम्—तन्नेत्यादिना । प्रकृत्यर्थस्य =
आलापात्मकस्य । व्यङ्ग्यस्यापीत्यत्रापिना आलापानामपि संग्रहः । यथा आलापा
गमननिवारणसमर्थास्तथैव व्यङ्ग्यमपि तत्समर्थमिति भावः । ननु प्रकृतानामालापानां
प्रेमाऽतिशयप्रकाशनमेव फलम्, तथा च कथं गमननिवारणहेतुत्वमित्यतः प्रकारान्त-
रेण तन्मतं खण्डयति—अस्तु वेत्यादिना । तथा च व्यङ्ग्यभेदेन यद्यपि 'प्रहर-
यहाँ 'दिन भर तो मैं तुम्हारे बिना जीवित रह सकती, पर उसके बाद नहीं'
यही व्यङ्ग्य अर्थ है । यह यात्रानिवारणस्वरूप वाच्यार्थ का उपपादक होने से
उसका अङ्ग—अप्रधान है । अतः यह 'गुणीभूतव्यङ्ग्य' है । यही अप्पय्य दीक्षित का
मन्तव्य है । किन्तु यह उचित नहीं है, क्योंकि यात्रानिवारणस्वरूप वाच्यार्थ का उप-
पादक तो 'क्या तुम एक पहर बीतते हीं मेरे पास लौट आओगे' इत्यादि वाच्यार्थ
हीं हैं । अतः यहाँ व्यङ्ग्यार्थ वाच्यार्थोपपादक न होने से गुणीभूत नहीं । 'आलापैः'
इस पद में करणार्थक तृतीया विभक्ति से हीं यह स्पष्ट हो जाता कि आलाप यहाँ
निवारण का करण है । उक्त व्यङ्ग्य के भी यात्रानिवारणात्मक वाच्यार्थ का उप-
पादक हो सकने से उसे वाच्यसिद्ध्यङ्ग मान कर 'गुणीभूत' कहना भी उचित नहीं
हैं, क्योंकि तब तो उन्होंने जो 'निःशेषच्युतचन्दनम्' आदि पद्य को ध्वनिकाव्य कहा
है वह भी सम्भव न हो सकेगा । कारण यह है कि वहाँ भी दूतीसंभोगादि
वाच्यार्थ अधमत्वादि के एक उपपादक हैं, अतः उन्हें भी गुणीभूत कहना होगा ।
यदि उक्त प्रश्नों को नायक के प्रति नायका के प्रगाढ़ प्रेम का प्रतिपादक मान
लिया जाय तो उपर्युक्त व्यङ्ग्य वाच्यसिद्ध्यङ्ग हो सकता है परन्तु उक्त पद्य को
तो गुणीभूतव्यङ्ग्य काव्य कहना उस परिस्थिति में भी सम्भव नहीं है, क्योंकि

६२ रसगङ्गाधरः
व्यङ्ग्यस्य वाच्यसिद्धयङ्गतया गुणीभावस्तथापि नायकादेर्विभावस्य बाष्पा-
देरनुभावस्य चित्तावेगादेश्च संचारिणः संयोगादभिव्यज्यमानेन विप्रल-
म्भेन ध्वनित्वं को निवारयेत् ॥
यत्र व्यङ्ग्यचमत्काराऽसमानाधिकरणो वाच्यचमत्कारस्तत्तृतीयम् ॥
विरतौ' इत्यादेरुभयं गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वं ध्वनित्वं च तथापि वक्तृतात्पर्यविषयीभूत-
पार्यन्तिकव्यङ्ग्यप्राधान्याऽप्राधान्यनिमित्तक एव ध्वनित्वोत्तमत्वादिव्यवहार इति
ध्वनित्वमेवास्योचितमिति पण्डितराजाकूतम् ।
प्रकारोऽयं गुणीभूतव्यङ्ग्योऽपि ध्वनिरूपताम् ।
धत्ते रसादितात्पर्यपर्यालोचनया पुनः ॥
इति स्वीकुर्वन्तः प्राञ्चस्तु यथासम्भवं पार्यन्तिकमान्तरालिकं च व्यङ्ग्यमादाय
ध्वनित्वादिव्यवहारं मन्यन्ताम् । किन्तु सम्पूर्णवाक्यार्थपर्यालोचनायां पार्यन्तिकव्यङ्ग्य-
मादायैव ध्वनित्वादिव्यवहारौचित्यमभिप्रयन्ति गङ्गाधरकृतः । 'ग्रामतरुणम्'
इत्यादौ च पार्यन्तिकव्यङ्ग्यं विप्रलम्भात्मकमादाय ध्वनित्वं भवत्येव । ध्वन्यालोकस्य
तृतीये 'पत्युः शिरश्चन्द्रकलामनेन' इत्यादौ ध्वनित्वं समुदाहरता वृत्तिकृता स्पष्टी-
कृतोऽयमर्थः । यदि च 'ग्रामतरुणम्' इत्यादौ गुणीभूतव्यङ्ग्यतैव स्वीकर्त्तव्या तर्हि
विप्रलम्भाभासस्याऽविवक्षितत्वमेव कल्प्यम् येन स्वयंकृतसङ्केताऽपि सा न तत्र
गतेत्यस्यैव पार्यन्तिकत्वमुपपद्येत । मर्मप्रकाशोक्तिस्तूद्योतोक्तिविरुद्धेत्युपेक्ष्यैवेत्यलम् ॥
यत्रेत्यादि । यत्र = काव्ये । असमानाधिकरण इति । वाच्यचमत्कारापेक्षयो-
त्कृष्टव्यङ्ग्यचमत्कारो हि सहृदयहृदये प्रायेण भासत इत्युत्कृष्टव्यङ्ग्यचमत्कार-
यहां विप्रलम्भशृङ्गारध्वनि अनिवार्य है । जब विभाव नायिकादि, अनुभाव
बाष्प आदि इसमें निर्दिष्ट हैं और चित्तावेगादि सञ्चारिभाव भी व्यङ्ग्य हैं हीं
तब इनके संसर्ग से अभिव्यज्यमान विप्रलम्भशृंगारध्वनि का निवारण कौन कर
सकता ? अतः इस पद्य को 'गुणीभूतव्यङ्ग्य' का उदाहरण नहीं माना
जा सकता ॥
जिस काव्य में व्यङ्ग्यार्थ के चमत्कार के अधिकरण में वाच्यार्थ का
चमत्कार न हो उसे तृतीय, अर्थात् मध्यम काव्य कहते ॥
वाच्यार्थ को व्यङ्ग्यचमत्कार का असमानाधिकरण कहने का तात्पर्य यह है—
वाच्यार्थ की अपेक्षा अतिशयचमत्कारजनक व्यङ्ग्यार्थ हीं सहृदयों की आत्मा में
स्थान प्राप्त करता है, अल्पचमत्कारजनक अथवा चमत्काराजनक व्यङ्ग्यार्थ नहीं ।