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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 75, कुल 414 में से

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पृष्ठ 75

प्रथमाननम् ४३
कृतो मतं प्रत्याचक्षाणेन व्यभिचारित्वेनासिद्धत्वेन च संदिह्यमानादपि
भीरुत्वं प्रतीयते । तत्र भयकारणस्य निवृत्तेर्भ्रमणं प्रतिपाद्यते । देशविशेषस्य
चाऽनुल्लेखाद् बोद्धव्यवैशिष्ट्येन ग्रामे गोदावरीकच्छकुहरे चाविशेषेण प्राप्तमपि भ्रमणं
ग्रामे विधेयत्वेन गोदावरीकच्छकुहरे च निषेध्यत्वेन प्रतीयते । तत्र च विधिरस्य
वाच्य एवात्र पद्ये, प्रतिपन्नभीरुत्वधार्मिकभ्रमणस्य तद्धेतोर्भयकारणीभूत-
श् Dufनिghost? निवृत्तेः श्वविशेषणत्वेन ग्रामस्य च प्रतिपादितत्वात् । गोदाकच्छकुहरे भ्रमणनि-
षेधश्चाऽवाच्योऽपि तत्र व्यापकीभूतभीरुभ्रमणसाधनस्वभावविरुद्धस्य भयकारणीभूत-
दृप्तसिंहस्योपलब्धेरनुमेयो भवत्येव--अत्र भ्रमणं मा कार्षीः, दृप्तसिंहसत्त्वात् = "गोदा-
कच्छकुहरं त्वत्कर्तृकभ्रमणाऽयोग्यम्, (भयकारणीभूत)सिंहवत्त्वात्" इति । अनर्थ-
संशयाऽभावनिश्चयादेव प्रवृत्तिरिति मते तु 'यत्र यत्र प्रवृत्तिः तत्र तत्रानर्थसंशया-
भावनिश्चयः' इति व्याप्तौ व्यापकीभूतस्यानर्थसंशयाभावनिश्चयस्य विरुद्धो यो गृह-
श्वमारकगोदावरीकच्छकुहरस्थदृप्तसिंहकर्तृ कोऽनर्थसंशयस्तस्य सद्भावादपि तत्र
भ्रमणनिषेधोऽनुमेयः । अयमेव द्वितीयः प्रकारः प्रकाशादावुपन्यस्तः शब्दान्तरेण ।
जिसके बारे में व्यभिचार तथा असिद्धि नामक हेत्वाभास सन्दिग्ध भी हो उस ज्ञापक
से भी अभिव्यञ्जन होता है, अनुमिति नहीं । उक्त पद्य किसी अभिसारिका की एक
भीरु धार्मिक के प्रति उक्ति है । अपने अभिसरण में उस धार्मिक की उपस्थिति के
प्रतिबन्धक होने से वह उस धार्मिक से प्रकारान्तर से यही बताना चाहती कि वह
स्थान उसके भ्रमण के लिए योग्य नहीं है । अतः उसे वहाँ से हँट जाना चाहिए ।
यहाँ व्यञ्जना विरोधी महिम भट्ट का यही मत है कि पद्य के प्रतिपाद्य 'गोदावरीतट
तुम्हारे भ्रमण के योग्य नहीं है' का बोध अनुमान प्रमाण से हीं हो जाने से
व्यञ्जना वृत्ति की कोई आवश्यकता नहीं । उनके मत का सारांश यह है—
“गाँव के कुत्ते की हत्या का भ्रमण के कारण के रूप में निर्देश से उस धार्मिक
की भीरुता स्पष्ट है । पद्य में भ्रमण का क्षेत्र निर्दिष्ट नहीं है, अतः ग्राम तथा
गोदावरीतट इन दोनों ही स्थानों में सामान्य रूप से प्राप्त भ्रमण का भयकारणी-
भूत कुत्ते के मार दिये जाने के कारण ग्राम में विधान और भयकारणीभूत दृप्त सिंह
के उपलब्ध होने से गोदावरीतट पर निषेध ये दोनों हीं इस पद्य से अवगत होते ।
इनमें ग्राम में भ्रमण का विधान तो शब्दवाच्य है—यह सुनिश्चित है । गोदातट
पर भ्रमण का निषेध वाच्य नहीं, अपितु अनुमेय है । तात्पर्य यह है कि भयकारणी-
भूत कुत्ते के वध का भ्रमण के हेतु के रूप में निर्देश से यह निश्चित है कि भीरु
धार्मिक का भ्रमण वहीं सम्भव है जहाँ भयकारण की उपलब्धि न हो । इस प्रकार