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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 414 में से

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पृष्ठ 84

५२ रसगङ्गाधरः
तिक्रमभयवशेन नदीमदीयप्रियोरन्तिकमगत्वैव वापीं स्नातुमितो ममान्ति-
काद्गतासि, न पुनस्तस्य परवेदनानभिज्ञतया दुःखदातृत्वेनाऽधमस्यान्तिकम् ।
यतो निःशेषच्युतचन्दनं स्तनयोस्तटमेव नोरःस्थलम्, वापीगतबहुलयुवजन-
त्रपापारवश्यादंसद्वयलग्नाग्रस्वस्तिकीकृतभुजलतायुगलेन तटस्यैवोन्नततया
मुहुरामर्शात् । एवं त्वरया सम्यगक्षालनेनोत्तरोष्ठो न निर्मृष्टरागोऽधरस्तु
तदपेक्षया गण्डूषजल-रदनशोधनाङ्गुल्यादीनामधिकसंमर्दमावहतीति तथा ।
किं च सम्यगक्षालनेन नेत्रे जलमात्रसंसर्गाद्दूरमुपरिभाग एवानञ्जने ।
शीतवशात्तानवाच्च तव तनुः पुलकितेति ।' एवं तस्या विदग्धाया गूढ-
तात्पर्यवोक्तिरुचिता, अन्यथा वैदग्ध्यभङ्गापत्तेः । एवं साधारणेषु
वाक्यार्थेषु मुख्यार्थे बाधाभावात्तात्पर्यार्थस्य झटित्यनाकलनात्कुतोऽत्र लक्षणा-
धमतवमन्यथोपपादयति—परवेदनेत्यादिना । वेदना = वियोगनिमित्तं दुःखम् ।
निःशेषच्युतचन्दनत्वादेः स्तनतटादिगतस्य वापीस्नानसाधारण्यमुपपादयति—वापी-
गतेत्यादिना । अंशद्वयलग्नेत्यादिप्रतिपादिता वाप्यादिस्नानमुद्रा रमणीषु प्रसिद्धा ।
आमर्शात् = भूयोभूयो जलस्पर्शात् । तथा = निर्मृष्टरागः । शीतवशादपि कठोरस्य
बलवतः शरीरस्य पुलकितत्वं कदाचिन्न भवेदिति तत्र हेत्वन्तरत्वेन तानवं कोमल-
त्वमप्युपात्तम्—तानवाच्चेति । गूढतात्पर्या = गूढमीषदगूढं तात्पर्यं व्यङ्ग्यं यस्याः
सा तथा । साधारणेषु = वापीस्नानसाधारणेषु । झटिति = वक्त्रादिवैशिष्ट्यावगतेः
अपनी सखी की पीड़ा को नहीं समझती । तूँ तो स्वार्थसिद्धि में हीं लगी हुई है ।
इसी लिए तो स्नान-वेला कहीं बीत न जाय इस डर से दूरवर्त्ती नदी में स्नान करने
नहीं गई बल्कि पास की वापी [तालाब] में ही स्नान करने यहाँ से चली गई ।
दूसरों की पीड़ा को न समझने के कारण दुःख देने वाले मेरे उस अधम पति के
पास तो गई हीं नहीं । तभी तो तेरे स्तनों के ऊपरी हिस्से से हीं चन्दन पूरी तरह
घुल पाया है, तेरे वक्षःस्थल से नहीं, क्योंकि उस वापी में स्नान करते हुए बहुत-से
युवकों से लज्जित होने से तूँने बार-बार अपने दोनों हाथों को स्वस्तिक मुद्रा में
कन्धों पर रखकर अपने उन्नत स्तनों के ऊपरी हिस्सों को हीं छिपाया होगा ।
इसी तरह तेरे ऊपरी होंठ की लाली भी घुल न सकी, क्योंकि तूँने लज्जा के कारण
जल्दी-जल्दी स्नान करके उसे पूरी तरह धुलाया न होगा । हाँ, तेरे अधर की लाली
तो पूरी तरह सही में घुल गई है, क्योंकि स्नान करने के पहले बार-बार कुल्ला
करने और दांत साफ करने से तेरे अधर पर तेरी अङ्गुलियों से खूब रगड़ पड़ी
होगी । और भी, अच्छी तरह स्नान [या सफाई] न करने से तेरी आँखों के
ऊपरी हिस्से का हीं अंजन कुछ कुछ घुल पाया है । ठंड और सुकुमार होने से
तेरे शरीर पर अब भी रोमाञ्च है ।"