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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 414 में से

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पृष्ठ 79

प्रथमाननम् ४७
व्यङ्ग्यासाधारण्यं संपाद्यते तत्किमर्थमिति पृच्छामः ? व्यङ्ग्यस्य व्यञ्जना-
र्थमिति चेत् ? न, व्यञ्जकगताऽसाधारण्यस्य व्यञ्जनाऽनुपायत्वात् ।
ओणिण्हं दोब्बल्लं चिंता अलसंतणं सणीससिअम् ।
मह मंदभाइणीए केरं सहि तुह वि परिभवइ ॥
इत्यादौ साधारणानामेवौन्निद्र्यादीना वक्त्रादिवैशिष्ट्यवशादर्थविशेषव्यञ्ज-
कताया अभ्युपगतेः । प्रत्युताऽसाधारण्यस्य व्याप्त्यपरपर्यायस्यानुमानानु-
कूलतया व्यक्तिप्रतिकूलत्वाच्च ।

  • वार्थऽवसायो न गुरुतरेणानुमानेनेति कथमत्र निःशेषच्युतचन्दनमित्यादौ दीक्षितस्य
    असाधारण्यप्रतिपादनं व्यर्थम्, युक्तिसिद्धत्वात्तस्येत्यत उपपत्तिविरुद्धत्वं तस्य प्रदर्शयति
    प्रकृतेन सन्दर्भेण । तथा च व्यञ्जनास्थले सर्वत्रैव साधारण्यं लिङ्गस्य, न क्वचिद-
    साधारण्यमिति स्वयमेव वक्ष्यति । व्यङ्ग्यस्य = तदन्तिकमेव रन्तुं गतासीत्यस्यार्थस्य ।
    'ओणिण्हम्......' इत्यस्य संस्कृतच्छाया—
    औन्निद्र्यं दौर्बल्यं चिन्ताऽलसत्वं सनिःश्वसितम् ।
    मम मन्दभागिन्याः कृते सखि त्वामपि परिभवति ॥ इति ॥
    साधारणानाम् = उत्कटसंभोगवियोगादिजन्यत्वाद्बिशेषाणाम् । अर्थविशेषः = उत्कट-
    सम्भोगः । असाधारण्यस्य = अव्यभिचरितत्वस्य । व्यक्तिः = व्यञ्जना ।
    के स्पष्ट अभिव्यंजन के लिए तो ऐसा करना उचित नही है, क्योंकि अभिव्यंजन
    के साधकों के लिए व्यंग्यार्थ के असाधारण धर्म होने की कोई आवश्यकता
    तो हैं नहीं। इसी लिए—
    “अरी सखी ! मुझ अभागिन के चलते जागरण, दुर्बलता, चिन्ता, आलस्य और
    दीर्धनिश्श्वास ये सब दोष तुझे भी पीड़ित कर रहे हैं ॥”
    नायिका द्वारा उसके पति के साथ छिपकर सम्भोग कर आने वाली दूती के
    प्रति कहे गये इस पद्य में सम्भोग एवम् उत्कट वियोग आदि में समान रूप से होने
    वाले जागरण आदि को वक्त्री नायिका तथा बोद्धव्य दूती के प्रभाव से 'दूती के
    सम्भोग' का व्यंजक सभी मानते । इसलिए व्यंजक साधकों के लिए व्यङ्ग्यार्थ का
    असाधारण धर्म होना आवश्यक नहीं है। व्यंजक यदि व्यङ्ग्य का असाधारण
    धर्म हो तब तो दोनों के बीच व्याप्ति सम्बन्ध सिद्ध हो जाएगा, क्योंकि दो पदार्थों
    का असाधारण्य (= अव्यभिचरित होना) हीं तो व्याप्ति है । ऐसी स्थिति में असा-
    धारणय अनुमान ले लिए हीं अनुकूल होगा, व्यंजना के लिए तो यह सर्वथा प्रतिकूल
    होगा । अतः व्यंजनावादी दीक्षित का ऐसा मानना असंगत है ।