रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 78, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ें४६ रसगङ्गाधरः
किं च यदिदं निःशेषेत्याद्यवान्तरवाक्यार्थानां वापीस्नानव्यावृत्तिद्वारेण
णेन सामर्थ्यात् प्रतीतिपथमवतरति' इति । प्रकृतमुपसंहरति—एवं चेति । प्रामा-
णिकानामिति । काव्यप्रकाशकारमतस्य भृशं निराकरणात् ध्वन्यालोकाभिमतस्याऽपि
क्वचित्स्वयमनादृतत्वात् कथं तेषां प्रामाणिकत्वमिति चिन्त्यम्, अंशतोऽविरोधस्तु
दीक्षितेनाऽपि समानः, तथाऽपि दीक्षितेन तेषां प्रामाण्यमभ्युपगतमेवेत्यत एतदुक्तम् ।
'तव ग्रन्थस्य विरोधः स्फुटः' इत्यन्तेन ग्रन्थेन प्राचीनसकलग्रन्थविरुद्धत्वं चित्र-
मीमांसाकृत उपपाद्योपपत्तिविरोधमुपपादयति—किञ्चेत्यादिना । अयमाशयः—
यथाऽपूर्ववाक्यस्थले शब्दप्रामाण्यस्याऽवश्यस्वीकर्तव्यतयाऽन्यत्रापि शब्दप्रयोगे तत
एवार्थाऽधिगतिरिति तान्त्रिकप्रसिद्धिस्तथैव व्यभिचरितलिङ्गादिस्थले व्यञ्जनाया
अवश्यस्वीकरणीयत्वेन यत्राऽपि काव्ये लिङ्गस्याऽव्यभिचरितत्वं तत्रापि व्यञ्जनयै-
में सिंह है यह निश्चय नहीं हो सकता । इस प्रकार पक्षधर्मताज्ञानस्वरूप 'सिद्धि'
के अभाव में हेतु के 'असिद्ध' हेत्वाभास होने का भी संशय है हीं । साथ हीं, यह भी
संभव है कि वह धार्मिक वीर हो, किन्तु कुत्ते से इस लिए डरता हो कि उसके स्पर्श
से शरीरादि मे अपवित्रता आ जाएगी । ऐसी स्थिति में उस धार्मिक का सिंहयुक्त
स्थान पर भ्रमण हो हीं सकता है। वीर पुरुष तो सिंहादियुक्त स्थान पर भी ज्ञानपूर्वक
घूमते। इस प्रकार साध्याभाव ( = भ्रमणाभावाभाव = भ्रमण) के साथ सिंहोपलब्धि-
स्वरूप हेतु की व्याप्ति के सन्दिग्ध होने से यहाँ विरोधनामक हेत्वाभास का भी
संशय है । अनुमान सद्धेतु से होता, निश्चित या सन्दिग्ध हेत्वाभास से नहीं ।
अतः सिंहोपलब्धि से भ्रमणाभाव का अनुमान नहीं हो सकता । यह तो व्यञ्जना-
मात्र से गम्यमान है । इस लिए अनुमान प्रमाण से व्यञ्जना को गतार्थ नहीं किया
जा सकता ।
काव्यप्रकाश के उपर्युक्त सन्दर्भों से स्पष्ट है कि व्यञ्जनास्थल में ज्ञापक का
असाधारण (व्यङ्ग्यार्थमात्र से सम्बद्ध) होना अपेक्षित नहीं है । ध्वन्यालोक के प्रथम
उद्योत में भी यही बात कही गई है । अतः अप्पय्य दीक्षित का असाधारण्य-
प्रतिपादन के लिए किया गया प्रयास पूर्वोक्त प्रमाणिक आचार्यों के ग्रन्थों (में निर्णीत
सिद्धान्त) से विरुद्ध है जहाँ व्यञ्जकों को व्यङ्ग्य तथा उससे भिन्न अर्थोंके साथ समान
रूप से सम्बद्ध कहा गया है । अतः दीक्षित का प्रयास अनुचित है ।
अप्पय्य दीक्षित का उक्त प्रयास उपपत्तिविरुद्ध भी है । 'निःशेषच्युतचन्दनं स्तन-
तटम्' आदि विशेषणीभूत वाक्य के अर्थों को वे वापीस्नान से असम्भव बतलाते हुए
केवल व्यङ्ग्यार्थ के असाधारण कार्य के रूप में क्यों सिद्ध करना चाहते ? व्यङ्ग्यार्थ