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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 414 में से

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पृष्ठ 81

शश्चेति द्वयं घटकम् । तत्र तावत्तदन्तिकं गतासीत्यंशस्य तन्मते व्यङ्ग्यत्वं
दुरुपपादम् । त्वदुक्तरीत्या विशेषणवाक्यार्थानां निश्शेषेत्यादिप्रतिपाद्यानां
वाच्यार्थे वापीस्नाने बाधितत्वाद्वाच्यकक्षागतप्रधानवाक्यार्थीभूतविधिनिषेध-
प्रतिपादकाभ्यां गता न गतेति शब्दाभ्यां विरोधिलक्षणया निषेधस्य विधेश्च
प्रतीतेरुपपत्तेः । नहि मुख्यार्थबाधेनोन्मीलितेऽर्थे व्यक्तिवेद्यतोचिता । यथा
'अहो पूर्णं सरो यत्र लुठन्तः स्नान्ति मानवाः' इत्यत्र कर्तृविशेषणानुपपत्त्य-
धीनोल्लासे पूर्णत्वाभावे ॥
दुरुपपादत्वमेवोपपादयति तदर्थस्य लक्ष्यत्ववर्णनमुखेन—त्वदुक्तरीत्येत्यादिना ।
बाधितत्वादित्यनेन विशेषणवाक्यार्थान्वयबाधं लक्षणामूलमुपदर्शयति । (वापीं
स्नातुमितो) गताऽसीत्यनेन मुख्यार्थान्वयबाधमूलिकया विपरीतलक्षणया न गताऽसीति,
( तस्याऽधमस्यान्तिकं ) न गताऽसीत्यनेन च तथैव लक्षणया गताऽसीति प्रतीतेः
सम्भवान्न तत्र व्यञ्जना, वृत्त्यन्तराऽप्रतिपादितार्थस्यैव व्यञ्जनाविषयत्वादिति
तदन्तिकं गताऽसीत्यंशस्य व्यङ्ग्यत्वानुपपत्तिरिति सन्दर्भार्थः । वाक्ये शक्त्यभावाद्
वाक्यार्थस्य वाच्यत्वाऽभावेऽपि वाच्यतुल्यत्वात्तस्य वाच्यकक्षागतेति विशेषणम् ।
लक्ष्यस्य व्यङ्ग्यत्वाऽभावे दृष्टान्तमाह—यथेति । अत्र लुठन्तः ( = 'इतस्ततः परिवर्त-
मानाः ) इति स्नानक्रियाकर्तृ भूतमानवानां विशेषणस्य पूर्णशब्दवाच्यार्थे विवक्षिते
संगतिर्न भवतीति विपरीतलक्षणया पूर्णशब्दः पूर्णत्वाऽभावं गमयति । स चाऽभावो
लिए नहीं। ऐसी स्थिति में विशेषणवाक्यार्थ की 'तस्याधमस्यान्तिकं न गताऽसि'
इस मुख्यांश के वाच्यार्थ के साथ सङ्गति न होने से '....न गताऽसि' का विपरीत-
लक्षणा से 'गताऽसि' यही संगत अर्थ होगा । इसी तरह विशेषणवाक्यार्थ,
जो सम्भोगमात्रजन्य हैं, की संगति 'वापीं स्नातु' गताऽसि' इस अंश के वाच्यार्थ के
साथ न होने से यह अंश भी विपरीत-लक्षणा द्वारा 'वापीं स्नातु' न गताऽसि'
(वापी में स्नान के लिए नहीं गई थी) का ही प्रतिपादक होगा । इस प्रकार
विपरीत-लक्षणा से अवगत 'तदन्तिकं गताऽसि' इस अर्थ को व्यंग्य मानना सर्वथा
अनुचित होगा, क्योंकि मुख्य वृत्ति (अभिधा) तथा मुख्यार्थबाधमूलक वृत्ति
(लक्षणा) से जो अर्थ प्रतीत नहीं होता उसी की प्रतीति व्यञ्जनावृत्ति द्वारा सर्व-
मान्य है। जैसे—"अहा ! यह सरोवर जल से कितना भरा हुआ है जिससे लोग
इसमें लोटते हुए स्नान कर रहे हैं !" इस वक्तव्य में स्नान करने वाले लोगों के
विशेषणीभूत 'लुठन्तः' इस पद के मुख्यार्थ 'लोटते हुए' के साथ पूर्णशब्द के मुख्यार्थ
के अन्वय का बाध होने से, विपरीत-लक्षणा द्वारा प्रतीयमान पूर्ण शब्द के लक्ष्यार्थ