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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 414 में से

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पृष्ठ 80

४८ रसगङ्गाधरः
अथ तटादिघटितत्वेऽपि न निश्शेषेत्यादिवाक्यार्थानामसाधारण्यम्,
सलिलार्द्रवसनकरणकप्रोञ्छनादिनापि तत्संभवादिति चेत् ? तर्हि वापी-
स्नानव्यावर्तनेन कः पुरुषार्थः ? एकत्रानैकान्तिकत्वस्येव बहुष्वनैकान्तिकताया
अपि ज्ञाताया अनुमितिप्रतिकूलत्वाद्व्यक्त्यप्रतिकूलत्वाच्च । अपि चात्र हि
तदन्तिकमेव रन्तुं गतासीति व्यङ्ग्यशरीरे तदन्तिकगमनं रमणरूपफलां-

इदानीं नाऽसाधारण्यप्रतिपादनमभिप्रेतमपि तु वापीस्नानमात्रव्यावर्त्तनमित्या-
शङ्कां प्रतिपादयति—अथेति । यद्वा निश्शेषच्युतचन्दनत्वादेर्वापीस्नानजन्यत्वव्या-
वर्त्तनेऽपि नाऽसाधारण्यम्, क्लिन्नवस्त्रप्रोञ्छनादिनाऽपि तथा सम्भवादित्याशङ्कां
प्रस्तौति—अथेति । यथा क्लिन्नवस्त्रप्रोञ्छनादिना सम्भोगेन च समानं निश्शेषच्युत-
चन्दनत्वादि स्तनतटादेस्तथैव वापीस्नानेनापि भवतु मा भूद्वा नाम, उभयोरपि
व्यञ्जकत्वानुपयोगेन तदर्थप्रसाधननैरर्थक्यं स्पष्टमित्याशयेन समाधत्ते प्रतिप्रश्न-
मुखेन-तर्हीत्यादिना । ननु वापीस्नानस्य व्यञ्जकत्वविरोधित्वात्तद्व्यावृत्तेस्तद्विरो-
धिनिराकरणं तन्मुखेन च व्यञ्जनासहकारित्वमित्येवार्थः, क्लिन्नवस्त्रादिप्रोञ्छना-
देश्चानुपस्थितत्वात्तद्व्यावृत्तौ न यतितमित्यत आह—अपि चेत्यादि । व्यङ्ग्यत्वस्य

‘निश्शेष……’ आदि विशेषणवाक्यों के ‘तट’ आदि शब्दों से घटित होने
पर भी उन वाक्यों के अर्थों से वापी-स्नान मात्र की व्यावृत्ति अभीष्ट है; वे
व्यङ्ग्य के असाधारण धर्म हैं ऐसा कहना नहीं, क्योंकि वे तो गीले वस्त्र से
पोंछने आदि से भी सम्भव हैं—यह कहकर भी उक्त मत के दोष का निराकरण नहीं
किया जा सकता, क्योंकि यदि वे विशेषणवाक्यार्थ अन्य कारण से भी सम्भव हैं तो
फिर उन्हें वापी-स्नान मात्र से असम्भव कह कर कौन सा अभीष्ट अर्थ सिद्ध
हो सकता ? अनैकान्तिकता (=व्यभिचार) तो किसी हेतु की एक स्थान में ज्ञात हो
या अनेक में, अनुमान के लिए समान रूप से वह प्रतिकूल है । व्यंजना के लिए तो
वह प्रतिकूल नहीं है। अतः उक्त विशेषणवाक्यार्थों को व्यङ्ग्य से अतिरिक्त गीले वस्त्र
से पोंछने आदि से सम्बद्ध मानने के साथ-साथ यदि वापी-स्नान से भी सम्बद्ध मान
लिया जाय तो भी अभिप्रेत अर्थ के अभिव्यंजन में कोई बाधा नहीं आती । अत एव
व्यंजकों को व्यङ्ग्य के असाधारण धर्म कहने की कोई आवश्यकता नहीं । और
भी, ‘तू रमण के लिए उसी के पास गई थी’ इस व्यंग्यार्थ में दो अंश हैं—‘रमण
(के लिए)’ और ‘उसके पास गई थी’ । दीक्षित के मत में ‘उसके पास गई थी’
इस अंश को व्यग्य कहना असम्भव है । यह अंश तो विपरीत-लक्षणा से हीं प्रतीत
हो जायगा । जब विशेषणवाक्यार्थ की उपपत्ति सम्भोगमात्र से सम्भव है, तब
तो उस अधम नायक के पास जाना ही दूती के लिए आवश्यक है, वापी-स्नान के