रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८ रसगङ्गाधरः
कपिकर्तृक-हनूमद्विषयककोपोपपादकतया गुणीभूतमपि दुर्दैववशतो दास्य-
मनुभवद्राजकलत्रमिव कामपि कमनीयतामावहति । नन्वेवं प्रागुक्तमाक्षेप-
गत मान्द्यमपि नववधूप्रकृतिविरोधादनुपपद्यमानं व्यङ्ग्येनैवोपपाद्यत
इति कथमुत्तमोत्तमता तस्य काव्यस्येति चेत् ? न । यतो ह्यनुदिनसख्यु-
पदेशादिभिरनतिचमत्कारिभिरप्युपपद्यमानं मान्द्यमिदं प्रथमचित्तचुम्बिनीं
विप्रलम्भरतिमप्रकाशयन्न प्रभवति स्वातन्त्र्येण परनिर्वृतिचर्वणागोचरता-
माधातुम् । इत्थमेव निश्शेषच्युतचन्दनमित्यादिपद्ये'ष्वधमत्वादीनि
ऽपेक्षमप्रधानत्वम्, प्रकृते पुनर्वाच्यस्य कोपस्य व्यङ्ग्यातिरिक्तकारणेनानुपपत्तौ भवति
व्यङ्ग्यस्य वाच्याङ्गत्वमिति नानयोः साम्यमित्याशयेनोत्तरति—यत इत्यादिना ।
व्यङ्ग्यविप्रलम्भरत्यपेक्षया न्यूनचमत्कारजनकत्वेन सख्युपदेशादेरनतिचमत्कारि-
त्वमुक्तम् । सहृदयहृदये चमत्कारजनकार्थ एव प्रथमं भासत इति विप्रलम्भरतिरेव
तत्राऽऽक्षेपगतमान्द्यकारणत्वेन प्रथमं विषयीभवतीत्यतः प्रथमचित्तचुम्बिनीमिति-
विशेषणं प्रदत्तं प्रकृते विप्रलम्भरतेः । परा या निर्वृत्तिरानन्दः तस्य या चर्वणा-
आस्वादस्तद्गोचरतां तद्विषयतामित्यर्थः । 'तल्पगताऽपि' इत्यत्रोक्तं न्यायं 'निश्शेष--
कर दिया । यह व्यङ्ग्यार्थ यद्यपि वाच्य कपिनिष्ठ क्रोध का गुणीभूत अवश्य है,
क्योंकि वाच्य क्रोध की इसके विना उपपत्ति न होने से यही उसका उपपादक
(अत एव अप्रधान) है तथापि चमत्कारजनकता तो इसमे उसी प्रकार विद्यमान है
जैसे दुर्भाग्यवश दासी का स्थान प्राप्त करने वाली रानी में सौन्दर्य अक्षुण्ण बना हीं
रहता है । अतः इस पद्य में व्यङ्ग्य के वाच्यसिद्धयङ्गभूत होने पर भी चमत्कारा-
तिशयजनक होने से इसमें उत्तमकाव्यत्व उपपन्न है ।
तो फिर 'तल्पगताऽपि च सुतनुः' इस पूर्वोदाहृत पद्य में भी प्रिय के करकमल को
हँटाने में जो प्रियतमाकी मन्दता कही गई है वह भी नवोढ़ा के स्वभाव से विरुद्ध
होने से स्वतः अनुपपन्न है; ऐसो स्थिति में उक्त व्यङ्ग्यार्थ—संलक्ष्यक्रम रति के
भी वाच्य मन्दता का उपपादक होने उसे कैसे उत्तमोत्तम काव्य (अर्थात् वहाँ
भी व्यङ्ग्य के वाच्यसिद्धयङ्ग होने से उत्तम काव्य क्यों नहीं) कहा गया है ?
यहाँ वाच्य मन्दता तो प्रकरण से अविरुद्ध जो सखियों के उपदेश आदि
हैं ( कि प्रियतम के साथ कठोर व्यवहार कभी नहीं करना चाहिए )
उनसे भी उपपन्न है हीं । अतः वाच्यार्थबोध के पश्चात् सहृदयों को शीघ्र हीं
प्रतीत होने वाला व्यङ्ग्यभूत विप्रलम्भशृंगार वाच्यार्थ का उपपादक न होने से
गुणीभूत नहीं है । किन्तु अतिशय चमत्कार का जनक तो यह है हीं, क्योकि यही
सहृदयों को वाच्यार्थबोध के बाद झट से प्रतीत होता और इसकी प्रतीति के विना