रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् ५५
तिव्याप्तिवारणायावधारणम्। तेन तस्य ध्वनित्वमेव। लीनव्यङ्ग्यवाच्य-
न त्वविवक्षितयत्किञ्चिदादाय। अत एव 'निश्शेषच्युतचन्दनम्' इत्यादौ दूतीसम्भोगेन
विप्रलम्भशृङ्गारस्य व्यङ्ग्यत्वेऽपि न दूतीसम्भोगस्य प्राधान्यं हीयते, विप्रलम्भस्या-
ऽविवक्षितत्वात्। इतरथोत्समोत्तमत्वस्य निर्विषयत्वापत्तिः। एवकारव्यावर्त्यस्या-
ऽपराङ्गस्य ध्वनित्ववर्णनेन चान्तरालिकव्यङ्ग्यमादाय पण्डितराजमते नोत्तमत्वादि-
व्यवहार इत्यपि सूच्यते। अतः 'अयं स रशनोत्कर्षी' इत्यादौ यच्छृङ्गारमादाय
गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वमुक्तं पूर्वं तन्मतान्तराऽभिप्रायेण। पण्डितराजमते तु पार्यन्तिक-
व्यङ्ग्यं करुणमादायैव व्यवस्थेति तस्योत्तमोत्तमत्वमेवेति। अथवोत्समोत्तमकाव्ये
व्यङ्ग्यस्य प्रधानत्वेऽवधारणाभावात् पार्यन्तिकव्यङ्ग्यापेक्षयाऽप्रधानत्वेऽपि वाच्या-
पेक्षया शृङ्गारस्य रत्यात्मकस्य प्राधान्येन बहूनां प्रकाशटीकाराणां मते चमत्का-
रित्वेन च तमादायैव ध्वनित्वमस्य निर्वाह्यम्। 'उअ णिच्चलणिप्पन्दा' इत्यादेरपि
प्रकृतैवकारव्यावर्त्यत्वमस्त्येव। अत ईदृशस्याप्युत्तमोत्तमत्वं निव्यूढम्। लीन-
व्यङ्ग्य इत्यादि। लीनमस्फुटं व्यङ्ग्यं यत्र तादृशे वाच्यचित्र इत्यर्थः। यद्वा
अवधारण किया गया है जिससे यह स्पष्ट है कि उसे सर्वथा अप्रधान हीं होना
चाहिए, किसी की भी अपेक्षा प्रधान नहीं। इसी लिए जहां एक व्यङ्ग्यार्थ अन्य
व्यङ्ग्यार्थ की अपेक्षा अप्रधान हो उसे उत्तम काव्य नहीं कहां जा सकता। वह तो
अन्तिम चमत्कारजनक व्यङ्ग्यार्थ के आधार पर उत्तमोत्तम काव्य ही होगा जिसे
ध्वनिकाव्य भी कहा जाता है। अतः उक्त अवधारण के बिना उसमें उत्तम काव्य के
लक्षण की अतिव्याप्ति अपरिहार्य हो जाती, क्योंकि वहाँ भी पूर्व व्यङ्ग्यार्थ . अन्तिम
व्यङ्ग्यार्थ की अपेक्षा अप्रधान है हीं। इस तरह के ध्वनिकाव्य का एक उदाहरण
काव्यप्रकाश आदि में दिया हुआ 'अपराङ्ग' का उदाहरण है-
अयं स रशनोत्कर्षी पीनस्तनविमर्दनः।
नाभ्यूरुजघनस्पर्शी नीवीविस्रंसनः करः ॥
भूरिश्रवा की कटी हुई बांह को देखकर विलाप करती हुई उसकी पत्नी की यह
उक्ति है। इसमे पूर्वकालिक रशनाकर्षण आदि शृंगार-विलासों से व्यङ्ग्य शृंगार
(= रति) प्रधानीभूत करुण की अपेक्षा गुणीभूत होकर भी वाच्यार्थ की अपेक्षा
प्रधान है। अतः शृंगारस्वरूप व्यङ्ग्य को लेकर इसे उत्तम काव्य नहीं कहा जा
सकता। यह तो करुणस्वरूप मुख्य व्यङ्ग्य के आधार पर ध्वनिकाव्य हीं है।
पण्डितराज के मत मे अन्त्य व्यङ्ग्य के आधार पर हीं उत्तमोत्तमत्वादि की व्यवस्था
होती है, आन्तरालिक व्यङ्ग्य के आधार पर नहीं। यह विषय संस्कृत टीका में
स्पष्ट किया गया है। इसी अवधारण से 'उअ णिच्चलणिप्पन्दा' आदि ध्वनिकाव्य