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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 414 में से

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पृष्ठ 83

प्रथमाननम् ५१
च शब्दार्थताया अस्वीकृतेः । अन्यच्च, यथाकथंचिदङ्गीकुरु वाऽत्र व्यञ्जना-
व्यापारं तथापि न तवेष्टसिद्धिः, वाच्यानां निःशेषच्युतचन्दनस्तनतट-
त्वादीनामधमत्वस्य च त्वदुक्तरीत्या प्रकारान्तरेणानुपपद्यमानतया दूती-
संभोगमात्रनिष्पाद्यत्वेन गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वप्रसङ्गात् । एवं चोपपत्तिविरो-
धोऽपि स्फुटतर एव । तस्माद्वाच्यार्थसाधारण्यमेवोचितमतिविदग्धनायिका-
निरूपितानां विशेषणवाक्यार्थानाम् ।
तथा हि—'अयि बान्धवजनस्याज्ञातपीडागमे स्वार्थपरायणे स्नानकाला-
ननु प्राचीनापराधाऽतिरिक्तोत्कटापराधत्वेन रमणस्योपपादकत्वादर्थापत्तिविषय-
त्वेऽपि रमणत्वेन तद्विषयत्वात् पर्यायोक्तप्रकरणस्थरीत्या रमणस्य व्यङ्ग्यत्वं
नाऽनुपपन्नमित्यत आह—अन्यच्चेत्यादि । यथाकथञ्चित् = उपपादकतावच्छेद-
कातिरिक्तेन रमणत्वेन रूपेण । इष्टसिद्धिः = ध्वनिकाव्यत्वोपपत्तिः । गुणीभूत-
व्यङ्ग्यत्वं चात्र वाच्यसिद्धयङ्गत्त्वरूपमभिप्रेतम् । वाच्यार्थः == वापीस्नानारूपार्थः ।
निरूपितानाम् = प्रतिपादितानाम् ।
सम्प्रति वापीस्नानसाधारण्येन विशेषणवाक्यार्थं व्याचक्षाणो यथाऽत्र व्यङ्ग्यार्थ-
प्रतीतिस्तथा निरूपयति—तथा हीत्यादिना । सम्भोगस्य व्यङ्ग्यत्वसंरक्षणयाऽ-
दूतीसंभोग की अर्थापत्तिप्रमाणविषयता सिद्ध है तो फिर उसे व्यंग्य कहना सम्भव
नहीं, क्योंकि शब्द किसी भी वृत्ति द्वारा उसी अर्थ का प्रतिपादक होता जो उस
प्रकरण में अन्य प्रकार से प्रतीत न होता हो । अतः यदि सम्भोग अर्थापत्तिवेद्य है
तो उसे व्यंग्य मानना सम्भव नहीं ।
यदि प्राचीन अपराधों से भिन्न किसी उत्कट अपराध के रूप में सम्भोग को
अर्थापत्ति का और सम्भोगत्वेन रूपेण सम्भोग को, पर्यायोक्त्यलङ्कारप्रकरण में वर्णन
किये जाने वाले प्रकार से, व्यङ्ग्य मान भी लिया जाय तो भी अप्पय्य दीक्षित का
मत समर्थित नहीं होता । उन्होंने उक्त पद्य को ध्वनिकाव्य माना है ।
किन्तु उनकी उपपादनविधि से तो इसे ‘वाच्यसिद्ध्यङ्ग’ नामक गुणीभूतव्यङ्ग्य
काव्य होना चाहिए, ध्वनिकाव्य नहीं । कारण यह है कि उनके द्वारा वर्णित
विशेषणवाक्यार्थों एव अधमपदार्थ की उपपत्ति सम्भोग के विना न होने से सम्भोग-
स्वरूप व्यङ्ग्यार्थ तो वाच्यार्थ का साधक हो जाता है । इस प्रकार उपपत्तिविरुद्ध
होने से भी अप्पय्य दीक्षित का मत असंगत है । अतः विदग्धा नायिका द्वारा उक्त
‘निःशेषच्युतचन्दनं स्तनतटम्’ आदि विशेषणवाक्यों के अर्थों को व्यङ्ग्य सम्भोग
तथा वाच्य वापी-स्नान इन दोनों के समान रूप से हीं कार्य मानना चाहिए ।
अतः उपर्युक्त पद्य का अर्थ इस प्रकार करना चाहिए—"अरी सखी ! तूँ
६ र०