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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 414 में से

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पृष्ठ 86

५४ रसगङ्गाधरः
यत्र व्यङ्ग्यमप्रधानमेव सच्चमत्कारकारणं तद्द्वितीयम् ॥
वाच्यापेक्षया प्रधानीभूतं व्यङ्ग्यान्तरमादाय गुणीभूतं व्यङ्ग्यमादाया-
क्रमप्राप्तमुत्तमकाव्यं लक्षयति—यत्रेत्यादिना ।
अवधारणप्रयोजनमाह—वाच्येत्यादिना । पराभिमतेऽपराङ्गे 'अयं स
रशनोत्कर्षी' इत्यादौ व्यङ्ग्यस्य रत्यात्मकस्य शृङ्गारस्य वाच्यार्थापेक्षया प्रधानत्वेऽपि
व्यङ्ग्यान्तरकरुणापेक्षयाऽप्रधानत्वमिति न तच्छृङ्गारमादाय तत्रोत्तमकाव्यलक्षणा-
ऽतिव्याप्तिरित्याशयः । तेन तस्य = पराभिमताऽपराङ्गस्य ध्वनित्वमेव । यद्यपि
काव्यप्रकाशकारादिमते चमत्कारातिशयजनकस्यैव प्राधान्यं सिध्यति तथापि पण्डित-
राजमते उपपादकत्वस्यैव तत्त्वमित्यावेदितपूर्वम् । अतश्च पराभिमतेऽपराङ्गे
नागेशादिमते वाच्यस्यैव शृङ्गारापेक्षयाऽतिशयचमत्कारवत्त्वेऽपि न तत्र वाच्यस्य
प्राधान्यम्, उपपादकत्वात्तस्य । यत्र पुनर्व्यङ्ग्यस्योपपाद्यत्वेन प्रधानत्वेऽपि चमत्कार-
जनकत्वं वाच्यार्थस्यैव तत्र पण्डितराजमते मध्यमकाव्यत्वमेव । इदन्तु बोध्यम्—
पण्डितराजमते यावन्मात्रं विवक्षितं तन्मात्रेणैव प्राधान्याऽप्राधान्यव्यवस्था,
उपर्युक्त रीति से अप्पय्य दीक्षित का निम्नलिखित कथन भी निरस्त हो
जाता है—
“अधमत्व, अर्थात् नीचता दो कारणों से सम्भव है—जाति से अथवा कर्म से ।
यहाँ नायक की जातिगत नीचता का प्रतिपादन तो विदग्ध नायिका कर नहीं
सकती । साथ हीं, दूतीसम्भोगात्मक अपराध जैसे हीन कर्म से भिन्न किसी पूर्व कुकर्म
के कारण भी वह नायक की नीचता नहीं बतला सकती, क्योंकि वैसे सभी पूर्वकृत
कुकर्मों को तो वह सह चुकी है, अब उनके उद्घाटन का कोई प्रयोजन नहीं है ।
यदि वे कुकर्म नायिका को असह्य होते तो वह नायक के पास अब दूती को भेजती
हीं क्यों ? अतः जाति या प्राचीन कुकर्मों के अधमत्व का प्रयोजक न होने से अन्ततो
गत्वा दूतीसम्भोगस्वरूप कुकर्म या अपराध हीं उस का प्रयोजक सिद्ध होता है ।”
इस कथन के निरस्त हो जाने का कारण यह है कि कोई भी अत्यन्त विदग्ध
नायिका अपनी सखी [दूती] के समक्ष तो उसी के साथ अपने पति के सम्भोग
की बात स्पष्ट रूप में कह नहीं सकती, क्योंकि उसके लिए ऐसा कहना अत्यन्त
गर्हित होगा । वह तो उसके समक्ष व्यक्त रूप में प्राचीन अपराधों को हीं असह्य
बताकर अपना उत्कट आक्रोश चतुराई से अभिव्यक्त करना चाहेगी । अतः दीक्षित
का मत अयुक्त है ॥
जिस काव्य में व्यङ्ग्यार्थ अप्रधान होकर हीं चमत्कारातिशयजनक हो उसे
द्वितीय, अर्थात् उत्तम काव्य कहते हैं ॥
इस लक्षण में व्यङ्ग्यार्थ के विषय में 'अप्रधान होकर हीं' यह अप्रधानता का